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राजनाथ को गुस्सा क्यों आया ?

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अमूमन सौम्य और सहज अंदाज में अपनी बात कहने के लिए जाने जाते हैं। ऐसा शायद कभी ही मौका आया होगा जब वह अपनी बात कहने के लिए अनावश्यक दबाव बना रहे हो या अपनी वाणी को कठोर करते दिखे हो। भारतीय जनता पार्टी के अधिकतर नेता उनकी इस बात के कायल हैं कि वह कभी गुस्से में अपनी बात नहीं रखते हैं । अधिकतर पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन में या किसी रैली में।

लेकिन राजनीति के इस पुरोधा की कई साल से बनी आ रही उनकी यह छवि अब दरकती दिखाई दे रही है। 2 दिन पहले दिल्ली की एक भाजपा कार्यकारिणी बैठक में वह पहली बार अपनी पार्टी के नेताओं के सामने दूसरे रूप में नजर आए। जिसमें वह ना केवल गुस्सा हुए बल्कि उन्होंने बातों ही बातों में पार्टी के सिरमौर नेताओं को निशाने पर ले लिया ।

उनके इस गुस्सैल रवैये को हालांकि पार्टी के वरिष्ठ नेता पचा नहीं पा रहे है। लेकिन कहा जा रहा है कि यह उनकी वर्षों से दबी आ रही टीस है जो आज अब अंदर ही अंदर दहक रही है। जिससे लगने लगा है कि पार्टी में अपनी नजरअंदाजी को वह अब बखूबी जानते हैं। नेताओं का कहना है कि जिस तरह से भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह का जलवा कायम है उससे उनको अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगी है। भाजपा के कार्यकारिणी की बैठक में जो राजनाथ का गुस्सा बाहर आया उनकी यह वर्षों से दबी भड़ास है।

जानकारी के अनुसार दिल्ली भाजपा की कार्यकारिणी बैठक में राजनाथ ने कहा कि ” पद पर जो कल थे,आज नहीं हैं और जो आज हैं,वे कल नहीं रहेंगे. शौर्य व पराक्रम के साथ संयम भी चाहिये.” पार्टी के प्रदेश कार्यालय से लेकर मुख्यालय तक यही चर्चा है कि राजनाथ ने ये नसीहत आखिर किस नेता के लिए दी है। हालांकि उनका इशारा पार्टी के दो शीर्ष नेताओं की तरफ बताया जा रहा है।

राजनाथ ने बहुत तीखे शब्दों में कहा कि बैठक स्थल का पूरा रास्ता केंद्रीय व प्रदेश भाजपा नेताओं के पोस्टरों, बैनरों व होर्डिंग्स से पटा पड़ा था. इस दिखावे व फिजूलखर्ची कोई जरुरत नहीं है। अपना चेहरा जगह-जगह देखकर आप अपने ईगो यानी अहम को संतुष्ट करते हैं। जबकि इसका जनता में गलत व नकारात्मक संदेश जाता है। पार्टी का दर्शन दिशा भी देता है और दृष्टि भी । लेकिन आप उस तरफ ध्यान नहीं देना चाहते।

राजनाथ सिंह ने जमीनी कार्यकताओं का महत्व समझाते हुए यह भी कहा कि प्रदेश अध्यक्ष व संगठन मंत्री से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है पन्ना प्रमुख। दरअसल,पन्ना प्रमुख एक बूथ की वोटर लिस्ट के चार पन्नों का इंचार्ज होता है जो सीधे उन मतदाताओं के संपर्क में रहता है. लेकिन पद के गरूर में हम जमीनी कार्यकर्ता को भूल जाते हैं, उसकी बात नहीं सुनते हैं।

इसके बाद राजनाथ का रुख दिल्ली के नेताओं की तरफ हुआ। जिसमें उन्होंने उन्हें खूब खरी-खोटी सुनाई। राजनाथ ने कहा कि दिल्ली विधानसभा का चुनाव लगातार हारने में किसी दूसरे का नहीं बल्कि हमारा ही दोष है क्योंकि कहीं तो चूक हुई होगी । उस चूक की पहचान करके अपनी गलतियां सुधारनी होंगी।

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