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अरविंद केजरीवाल के सामने BJP क्यों हार गई दिल्ली विधानसभा चुनाव?

अरविंद केजरीवाल के सामने BJP क्यों हार गई दिल्ली विधानसभा चुनाव?

दिल्ली विधानसभा चुनाव का नतीजा अब सबके सामने है। आम आदमी पार्टी को दिल्ली की जनता ने तीसरी बार दिल्ली की बागडोर संभाले दी। 63 सीटों की भारी बहुमत से आम आदमी पार्टी की तीसरी बार वापली हुई है। वहीं, बीजेपी को मात्र 8 सीट मिले हैं। जबकि कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला है। देखा जाए तो इस महासंग्राम में आम आदमी पार्टी और बीजेपी एक-दूसरे को सीधे टक्कर देते हुए दिखे पर कांग्रेस की सेना मैदान में कहीं नजर नहीं आई। मानो कांग्रेस ने अपने आपको थाली में परोस कर केजरीवाल को दे दिया हो। कांग्रेस ने न कोई प्रचार किया और न ही जनता से रूबरू हुई। आचार संहिता लागू होने के ठीक दो दिन पहले राहुल गांधी और प्रियंका गांधी इक्का-दुक्का रैली करते नज़र आए।

पूर्णिमा जोशी की माने तो दिल्ली चुनाव में कांग्रेस ने अपनी तरफ से मजबूत उम्मीदवार खड़े किए थे। लेकिन पार्टी में जो राष्ट्रीय संकट दिखाई देता है, उससे नेताओं में असमंजस की स्थिति दिखाई देती है। हालांकि, कांग्रेस में क्षेत्रीय नेता हैं जैसे पंजाब में अमरिंदर सिंह, मध्य प्रदेश में कमलनाथ या छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल हों ये लोग काम कर रहे हैं। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में संकट साफ़ दिखाई दिया और इसका फायदा कहीं-न-कहीं बीजेपी को हुआ है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक प्रदीप सिंह इससे इत्तेफाक नहीं रखते, वे कहते हैं, “अगर कांग्रेस लड़ाई में होती तो वो मुस्लिम वोट को बांटती, झुग्गी झोपड़ी का वोट भी ले जाती जो उसका पारंपरिक वोट रहा है लेकिन देखा जा रहा है कि हर चुनाव में कांग्रेस नीचे ही जा रही है। ऐसे में कांग्रेस के मैदान में न होने से उसका फायदा आप को हुआ है और नुकसान बीजेपी को।” चाहे कांग्रेस जिस भी मंशा से प्रचार में अपनी ताकत नहीं लगाई हो लेकिन इसका सीधा फायदा बीजेपी को अधिक हुआ।

दूसरी तरफ बीजेपी की बात करें तो उसके हार के कई कारण रहे। दिल्ली विधानसभा चुनाव के प्रचार की कमान गृहमंत्री अमित शाह ने संभाली थी। स्टार प्रचारकों की एक लंबी फौज लगा दी गई थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से लेकर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दिल्ली की जनता को संबोधित करते नज़र आए। साथ ही स्मृति ईरानी, राजनाथ सिंह, प्रकाश जावडेकर, हरदीप पुरी, अनुराग ठाकुर, संगीत सोम समेत जैसे 249 सांसदों को काम पर लगाया गया। इन सबने मिलकर चुनाव को शाहीन बाग के आसपास केंद्रित कर दिया। रैलियों में सीएए और एनआरसी विरोध-प्रदर्शनों पर जमकर हमला किया। बीजेपी के नेताओं ने एक के बाद एक कई अभद्र टिप्पणी शाहीन बाग और मुसलमानों पर किया।

अरविंद केजरीवाल के सामने BJP क्यों हार गई दिल्ली विधानसभा चुनाव?

परवेश वर्मा ने अपने रैली में कहा कि अगर नहीं रोक गया तो शाहीन बाग़ के लोग घर में घुसकर आपकी बहू बेटियों के साथ बलात्कार करेंगे। वहीं केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने तो अपने समर्थकों से नारे लगवाए- देश के गद्दारों को गोली मारों सालों को। उसके बाद एक बयान आया कि आतंकवादियों को बिरयानी खिलाने के बजाय बुलेट(बंदूक़ की गोली) खिलानी चाहिए। जब इतने से दिल नहीं भरा तो भाजपा के कपिल मिश्रा और तजविंदर बग्गा ने अरविंद केजरीवाल तक को आतंकवादी कह डाला। पूरे चुनाव के दौरान 240 सांसदों के मुंह से सिर्फ शाहीन बाग़, देशद्रोही, पाकिस्तान, आतंकवाद, बिरयानी जैसे ही शब्द निकलें। इतना ही नहीं भाजपा नेताओं की ओर से ये कई बार याद दिलाया गया कि मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत की सीमा सुरक्षित हुई है। उन्होंने बार-बार याद दिलाया कि भारत ने किस तरह पाकिस्तान की बुरी हालत कर दी है और अब वह डर से कांपता है।

अमित शाह के नेता ही नहीं खुद अमित शाह भी विवादास्पद टिप्पणियां करते दिखे। गृहमंत्री अमित शाह ने अपने एक रैली में कहा, “मित्रो, ईवीएम की बटन को इतने गुस्से में दबाना कि करंट शाहीन बाग और बाबरपुर में लगे।” इस तरह के बयानों के जरिए बीजेपी ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने और राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाने की भरपूर कोशिश की। साथ ही कौन कितना भारतीय है, किसके अंदर राष्ट्रवाद की भावना ज़्यादा है और किसमें कम है ये देखने तक को कहा गया। ये तक आरोप लगाया गया कि जो नागरिकता क़ानून का विरोध कर रहे हैं वे नहीं चाहते कि पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता मिले। रैलियों में बार-बार बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या मुसलमानों की बात की गई। बीजेपी से जुड़े नेता लगातार बताते रहे कि किस तरह भारत में बांग्लादेशी घुसपैठिए घुस आए हैं और केंद्र सरकार उन्हें निकालने में किस क़दर जुटी हुई है। बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या कभी एक करोड़, तो कभी दो करोड़ बताई गई। ये भी कहा गया कि जिसे भारत पसंद न हो उसे कहीं और जाने से किसने रोका है और सैकड़ों सालों तक विदेशी शासकों ने भारत के बहुसंख्यक हिंदुओं पर शासन किया, अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। पूरे चुनाव का फ़ोकस इस पर भी किया गया कि सभी देशवासियों को एनआरसी और सीएए जैसे क़ानून की ज़रूरत क्यों है।

प्रचार के दौरान बीजेपी ने शाहीन बाग में हो रहे विरोध प्रदर्शन को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की चुप्पी साधे रहने का भी आरोप लगाया गया। उन्होंने ये भी कहा कि वहां बैठे प्रदर्शनकारियों को चिकन बिरयानी मुहैया करवा रहे हैं। ऐसे में पत्रकारों ने जब बीजेपी के आरोपों पर केजरीवाल से सवाल पूछा था तो उन्होंने कहा कि उनके विरोधी उन्हें एंटी-हिंदू होने का आरोप लगाते है जबकि वो तो हनुमान के कट्टरभक्त हैं। वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं कि बीजेपी दिल्ली में पिछले 22 सालों से सत्ता से बाहर है। उसके बावजूद पार्टी के पास दिल्ली में कोई चेहरा नहीं था और वो प्रचार के लिए भी देर से उतरी है। वो बीजेपी के इस प्रदर्शन पर कहते हैं, ”नरेंद्र मोदी के साल 2014 में सत्ता में आने के बाद शहरी गरीब में बीजेपी का जनाधार बढ़ा है। लेकिन दिल्ली में केजरीवाल के समर्थकों में सेंध नहीं लगा पाई। पहले ये वर्ग कांग्रेस के साथ था। अब ये आप के पास चला गया है। और बीजेपी इसे अपनी ओर मोड़ने में नाकाम रही। आखिरी समय में भाजपा ने अनाधिकृत कलोनियों को रेगुलर किया पर उसका फायदा भी उसे नहीं हुआ।”

अरविंद केजरीवाल के सामने BJP क्यों हार गई दिल्ली विधानसभा चुनाव?

दिल्ली में मतदान के बाद हुए एग्जिट पोल के नतीजे आने से पहले तक भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी ने ट्वीट किया था, ”सारे दावे फेल होंगे, मेरा ट्वीट संभाल कर रखिएगा और दिल्ली में बीजेपी 48 सीट जीतकर सरकार बनाएगी। कृपया ईवीएम को दोष देना का अभी से बहाना न ढूंढें। हालांकि, नतीजे आने के बाद मनोज तिवारी ने संवाददाता सम्मेलन में अरविंद केजरीवाल को बधाई दी और कहा कि जनादेश को वो सिर माथे लेते हैं। उन्होंने कहा, ”पार्टी हार की समीक्षा करेगी। लेकिन इस बात का संतोष हैं कि पार्टी का वोट प्रतिशत 38 फीसदी हुआ है।” लेकिन बीजेपी का दहाई का आँकड़ा भी न छू पाना, ये जाहिर करता है कि दिल्ली में हुए विकास के काम बीजेपी के दावों पर हावी नहीं हुए।

इसपर वरिष्ठ पत्रकार पूर्णिमा जोशी मानती हैं, “अरविंद केजरीवाल ने काम किए हैं और उनकी साख भी अच्छी थी। उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में काफी काम किया है। लेकिन उसके बावजूद बीजेपी ने आप को कड़ी टक्कर दी है।” वो आगे कहती हैं, ”इसमें कोई शक नहीं है कि केजरीवाल ने अच्छा काम किया है और बीजेपी ने ये चुनाव बिना किसी मुख्यमंत्री के चेहरे और केजरीवाल की प्रो-इनकम्बेंसी के खिलाफ़ लड़ा। हालांकि, बीजेपी ने आखिरी समय में प्रचार किया और कारपेट बॉम्बिंग की। बीजेपी हार मानने वाली पार्टियों में से नहीं है और उन्होंने आखिरी समय तक चुनाव लड़ा है और अपनी नंबर टैली को सुधारा है। शाहीन बाग और इससे जुड़े मुद्दों पर बीजेपी के काडर ने उन्हें वोट किया है।

बीजेपी की हार का ठीकरा पार्टी के नवनियुक्त अध्यक्ष जेपी नड्डा के मत्थे भी मढ़ सकते हैं। जेपी नड्डा को 20 जनवरी को पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था। लोगों का कहना है कि वे अभी नये हैं और लोग उन्हें कम ही जानते हैं। इस पर पूर्णिमा जोशी कहती हैं, “नड्डा को अमित शाह का दायां हाथ माना जाता है और वो विवादों से परे रहन वाले नेता हैं। बहुत शांत रहते हैं और वो अमित शाह के लिए कोई चुनौती भी नहीं हैं।” वो बताती हैं कि नड्डा को अध्यक्ष पद भले ही हो लेकिन पार्टी अमित शाह ही चला रहे हैं। हालांकि, इस बात को हम नकार नहीं सकते कि वोट मोदी के नाम पर मिलती है। पार्टी के नाम पर नहीं। इसका उदाहरण है राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब और झारखंड में हुए चुनाव और वहां की हार। पार्टी अपनी हार पर मंथन करें। मुख्यमंत्री केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अपने किए हुए काम की चर्चा करने के साथ-साथ अपने एजेंडों के बारे में बताया। रोज़गार, पीने के साफ़ पानी, बेहतर सड़कें और मूलभूत सुविधाओं में बुनियादी बदलाव लाने की बात की। ज़्यादा विदेशी निवेश, ग़रीबों के लिए घर और उनके बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के बात की जिसके कारण दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को जीत दिलाई।

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