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इस्तीफा देने से बच क्यों रहे कांग्रेस के बडे नेता ?

“मुझे इस बात का दुख है कि मेरे इस्तीफे के बाद किसी मुख्यमंत्री, महासचिव या प्रदेश अध्यक्षों ने हार की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा नहीं दिया ” । 28 जून को राहुल गांधी के दिल की पीडा इन शब्दों के माध्यम से बाहर आई। तब यूथ कांग्रेस के लोग राहुल गांधी के घर के बाहर एकत्रित हुए थे ।  वे राहुल गांधी से अध्यक्ष पद न छोड़ने की गुहार लगा रहे थे। राहुल गांधी के समर्थन में उनके घर के बाहर जब राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बैठे तो राहुल ने सभी को अपने घर पर आमंत्रित किया और उनसे अपने मन की बात कही ।
इसी दौरान बैठक में यूथ कांग्रेस के एक नेता ने कहा कि सर (राहुल गांधी) ये सामूहिक हार है सबकी जिम्मेदारी बनती है तो सिर्फ इस्तीफा आपका ही क्यों? इस पर राहुल गांधी ने बड़ा मार्मिक जवाब देते हुए कहा, मुझे इसी बात का दुख है कि मेरे इस्तीफे के बाद किसी मुख्यमंत्री, महासचिव या प्रदेश अध्यक्षों ने हार की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा नहीं दिया ।
किन लोगों ने दिया इस्तीफा?

राहुल गांधी के बयान के बाद कांग्रेस में इस्तीफों की झड़ी लग गई । 28 जून को जिन पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया, उनमें बड़े नेताओं में दिल्ली कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश लिलोठिया भी शामिल हैं ।इसके साथ ही हरियाणा प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष सुमित्रा चौहान, तेलंगाना कांग्रेस उपाध्यक्ष पूनम प्रभाकर और एमपी प्रभारी और महासचिव दीपक बावरिया ने भी पद से इस्तीफा दे दिया है । यहा यह भी बताना जरुरी है कि करीब आधा दर्जन राष्ट्रीय महासचिव में से महज़ एक ने ही इस्तीफा दिया है। जबकि बाकि सभी वरिष्ठ पदाधिकारी जोक की तरह सीट से चिपककर किसी तरह अपने पद बचाने में लगे है।

याद रहे कि लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस की हार के बाद पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी इस्तीफा देने पर अड़े हुए हैं । लोकसभा चुनाव में हार की जिम्मेदारी लेने से अब तक बच रहे कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के रुख पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बयान के बाद पार्टी में इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है ।
कांग्रेस महासचिव दीपक बाबरिया समेत ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी के साथ विभिन्न राज्यों के करीब 150 कांग्रेस नेताओं ने अपना इस्तीफा पार्टी अध्यक्ष को भेज दिया है । राहुल के बयान के बाद दूसरी पंक्ति के नेताओं के इस्तीफों की पेशकश ने पार्टी के दिग्गजों पर भी पद छोड़ने का दबाव बना दिया है । लेकिन दो चार वरिष्ठ पदाधिकारियो को छोड दे तो किसी भी बडे नेता ने अपना इस्तीफा नही दिया है। इसे क्या समझा जाए ? यही कि राहुल गांधी की मार्मिक बातों का असर भी ऐसे वरिष्ठ नेताओ पर नही हुआ।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षो की अगर बात करे तो उत्तर प्रदेश के पार्टी अध्यक्ष कमेटी भंग होने के साथ स्वत : ही हटे हुए माने जाएंगे। लेकिन वही दूसरी तरफ उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष पार्टी को दिनो दिन रसातल में ले जाने में लगे है। उनका इस्तीफा देना तो बहुत दूर की बात है फिलहाल उन्होने अपने पद को बचाए रखने के लिए सक्रियता दिखानी शुरू कर दी है। जिसके चलते पहली बार उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने पहली बार कुमाऊँ में अपने जाने का कार्यक्रम बनाया है। जब से वह प्रदेश अध्यक्ष बने है, सिर्फ देहरादून तक ही सिमट कर रह गये है । यहा तक कि लोग उन्हें उत्तराखंड का नही बल्कि देहरादून का अध्यक्ष तक कहने लगे थे। ऐसे ही कई प्रदेश अध्यक्ष है जो सिर्फ नाम के मुखिया बने हुए है। पार्टी आलाकमान इनसे आजिज आ चुके है। पार्टी सूत्रों की माने तो उन्हें हटाए जाने का फरमान कभी भी जारी हो सकता है।

गौरतलब है कि चुनाव परिणाम आने के बाद कयी बार राहुल गांधी अपनी पीडा पार्टी के सामने व्यक्त कर चुके है।  राहुल गांधी सबसे पहले 24 मई को लोकसभा चुनावो के परिणाम आने के बाद पहली बार हुई कार्यसमिति की बैठक में करारी हार का रोना रो चुके है। तब उन्होने अशोक गहलोत कमलनाथ और पी चितंबरम को आडे हाथो लेते हुए यहा तक कह दिया था कि आप लोग अपने बेटो को ही चुनाव लडने तक सिमित होकर रह गए थे।

कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और असम प्रभारी हरीश रावत से जब ‘दि संडे पोस्ट’ ने इस्तीफा प्रकरण पर उनके अगले कदम की बाबत बात जाननी चाही तो उन्होने कहा कि इस मामले पर वह फिलहाल मौन है।

सर्वविदित है कि पिछले एक महीने से राहुल गांधी को मनाने की कोशिशे चल रही है। लेकिन वह बिल्कुल नही मान रहे है। दो दिन पूर्व पार्टी के 52 में से 51 सांसदो ने भी उन्हें मनाने की लाख कोशिश की।  जिसके बाद उनका आक्रोश कुछ इस तरह सामने आया  और बोले कि “एक बात बिल्कुल साफ है कि अब मैं कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष नहीं रहूंगा । आप लोग चिंता मत करिए । मैं कहीं जाने वाला नहीं हूं, यहीं रहूंगा और मजबूती से आप सब की लड़ाई लड़ूंगा । “
राहुल ने कहा, “आज मैं चुनाव हारा हूं. अगर एक अंगुली मैं किसी पर उठाता हूं, तो तीन अंगुलियां मेरी तरफ उठेंगी, लंबा संघर्ष है । जिसको तुरंत सत्ता चाहिए वो बीजेपी में जा सकता है । जो संघर्ष के दौर में मेरे और पार्टी के साथ रहेगा, वही पार्टी का सच्चा सिपाही है ।

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