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कालापानी पर किसकी टेढ़ी चाल

भारतीय प्रट्टाानमंत्री नरेंद्र मोदी दुनियाभर के मुल्कों से संबंट्टा मजबूत करने में जुटे हुए हैं। लेकिन उन्हें यह भी अहसास हो जाना चाहिए कि भारत के दो महत्वपूर्ण पड़ोसी नेपाल और श्रीलंका उससे दूर होते जा रहे हैं। नेपाल के प्रधानमंत्री पहले से चीन समर्थक माने जाते हैं, वहीं अब श्रीलंका में भी चीन समर्थक नंदसेना गोतबाया के राष्ट्रपति बनने के बाद स्थितियां और संजीदा हुई हैं

दिनेश पंत

नेपाल के प्रधनमंत्री केपी ओली द्वारा कालापानी पर दिए गए इस बयान के बाद कि ‘नेपाल सरकार किसी को भी अपनी जमीन पर कब्जा नहीं करने देगी, भारत को चाहिए कि वह अपने सुरक्षा बल कालापानी से हटा ले।’ वर्षों से दबा यह विवादित मामला फिर गर्मा गया है। हालांकि नेपाल के उप प्रधनमंत्री ने इस मामले को आपसी समझ-बूझ से सुलझा लेने की बात कहकर ठंडा करने की कोशिश जरूर की है। लेकिन राजनीतिक जानकार नेपाली प्रधनमंत्री के बयानों के कई निहितार्थ निकालने में जुटे हुए हैं। अटकलें यह भी लगाई जा रही हैं कि इसके पीछे चीन की टेढ़ी चाल भी हो सकती है।
नेपाली प्रधनमंत्री का बयान तब आया जब भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने 31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को नए केन्द्र शासित प्रदेश के गठन के बाद देश का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया। इस नक्शे में कालापानी क्षेत्र को भारतीय क्षेत्र में दिखाया गया। इसके बाद नेपाली प्रधानमंत्री ने अपनी प्रतिक्रिया दी जिससे यह विवाद फिर से चर्चा में आ गया। यह पहली बार नहीं है कि किसी नेपाली शासक ने ऐसा बयान दिया हो। वर्ष 1996 में भी यह विवाद गहराया था जब नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएन-यूएमएल) ने कालापानी पर दावा किया। वर्ष 2009 में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी एमाले के कार्यकर्ताओं ने ‘कालापानी हमारा है’, के नारे लगाकर इस विवाद को गर्माने की कोशिश की। नेपाल के कई वामपंथी कालापानी से लेकर कुटी नदी तक नेपाल का हिस्सा बताते हैं। वर्ष 1998 में भी यह मामला गर्माया था जब माक्र्सवादी लेनिनवादी के समर्थकों ने कालापानी में अवैध कब्जा जमा दिया था। तब तत्कालीन विधायक कृष्ण चन्द्र पुनेठा ने यह सवाल अविभाजित उत्तर प्रदेश विधानसभा में उठाया था। तब जाकर जिला प्रशासन से लेकर गृह मंत्रालय सक्रिय हुआ था। नेपाल में आयोजित होने वाले अधिकतर चुनावों में कालापानी का मुद्दा उठता रहा है। नेपाल बहुत पहले से कालापानी पर अपना दावा करता रहा है। अपने दावे के पीछे वह 1816 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ हुई सुगौली संधि को आधार मानता है। लेकिन वहीं सुगौली संधि के आर्टिकल 5 में वर्णित है कि नेपाल काली नदी के पश्चिम में पड़ने वाले इलाके पर अपना दावा नहीं करेगा। वर्ष 1860 में इस इलाके का सर्वें भी हुआ था। वर्ष 1929 में इसे भारत का हिस्सा घोषित कर दिया गया था।
नेपाली प्रधनमंत्री के बयान को चीन के कनेक्शन से जोड़ा जा रहा है। चीनी कनेक्शन यह है कि वह इस मुद्दे को हवा दे रहा है ताकि वह भारत को घेर सके। इस समय चीन नेपाल में रेल लाइन बना रहा है। नेपाल चीन की वन बेल्ट, वन रोड योजना में शामिल है। वहीं दूसरी तरफ नेपाल में एक ऐसा वर्ग उभरा है जो नेपाल की भारत से अपनी निर्भरता को खत्म करना चाहता है। 20 वर्षों बाद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नेपाल की यात्रा की है। नेपाल को 56 विलियन सहयोग राशि का ऐलान भी चीन की तरफ से किया गया है। अभी हाल में चीन ने नेपाल को 3430 करोड़ रुपए की मदद प्रदान की है। माना जाता है कि नेपाली प्रधनमंत्री ओली की कम्युनिस्ट सरकार का झुकाव चीन की ओर है। नेपाली राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी के हाल के बयानों से भी स्पष्ट हो जाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि हम वन चीन पाॅलिसी पर यकीन करते हैं। हमारी जमीन से किसी को चीन विरोधी गतिविधि चलाने की इजाजत नहीं है।
नेपाल ही नहीं श्रीलंका जैसे भारत के मित्र राष्ट्रों को भी भारत से दूर कर चीन उसे घेरने की तैयारी में है। नेपाल-भारत व तिब्बत के ट्राई जंक्शन पर 3600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस इलाके से महाकाली नदी भी गुजरती है। इसका 35 वर्ग किमी. क्षेत्र उत्तराखण्ड के जनपद पिथौरागढ़ में आता है। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद से ही यहां आईटीबीपी तैनात है। नेपाल इसे अपने दारचुला क्षेत्र में मानता है। यह क्षेत्र जनपद पिथौरागढ़ के विकासखंड धारचूला मुख्यालय से 99 किमी दूर है। यहां आईटीबीपी व एसएसबी की चैकियां हैं। यह कैलाश मानसरोवर यात्रा का भी एक पड़ाव रहा है। अब तो भारत ने कालापानी तक सड़क का विस्तार भी कर दिया है।  इन सबके बीच जहां भारत के प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी हजारों मील दूर स्थित राष्ट्रों के बीच संबंधों की मजबूती में अपना समय व देश का धन खर्च कर रहे हैं, तो वहीं पड़ोस में सब कुछ दरक रहा है। पाकिस्तान को छोड़ दें तो दो महत्वपूर्ण पड़ोसी नेपाल व श्रीलंका भारत से दूर होते जा रहे हैं। नेपाल के प्रधनमंत्री ओली तो पहले से ही चीन समर्थक माने जाते रहे हैं, तो वहीं अब श्रीलंका में चीन समर्थक नंदसेना गोतबाया के राष्ट्रपति बन जाने के बाद स्थितियां और संजीदा हो गई हैं।
क्या कहती है सुगौली संधि
सुगौली संधि ईस्ट इंडिया कंपनी व नेपाल के राजा के बीच हुआ एक करार था। 2 दिसम्बर 1815 को ईस्ट इंडिया कंपनी व नेपाल के राजा के बीच एक करार पर हस्ताक्षर हुए। 4 मार्च 1816 को इसका अनुमोदन हुआ। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने नियंत्रण वाले भू-भाग का एक तिहाई हिस्सा गंवा दिया। नेपाल राजा ने संधि से पूर्व 25 सालों में पूर्व में सिक्किम, पश्चिम में कुमाऊं-गढ़वाल, दक्षिण में तराई के अध्कितर क्षेत्र जिसमें उसने कब्जा किया था उसे गंवाने पड़े। हालांकि तराई का कुछ हिस्सा नेपाल को वापस मिला। लेकिन इस संधि की सबसे बड़ी खामी यह रही कि इसके परिसीमन को स्पष्ट नहीं किया गया। जिसके चलते भारत व नेपाल के बीच में इसमें दावे-प्रतिदावे होते रहे हैं। जो विवाद की जड़ बनता रहा है।
बात अपनी-अपनी
भारत व नेपाल भले ही दो राष्ट्र हों, लेकिन उनकी आत्मा एक है। दोनों देश भाई-भाई हैं। छोटे-मोटे विवाद होते रहते हैं। दोनों देश आपसी बातचीत से इसका समाधान कर लेंगे। कालापानी कोई बड़ी समस्या नहीं है। जल्द ही इसका हल निकल आएगा।
उपेन्द्र यादव, उप प्रट्टाानमंत्री नेपाल
भारत का जो भाग है वह भारत का ही रहेगा। नेपाली प्रधानमंत्री का बयान दुर्भाग्यपूर्ण है। आशा है आपसी बातचीत से यह हल निकल जाएगा।
त्रिवेन्द्र सिंह रावत, मुख्यमंत्री, उत्तराखण्ड

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