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हम नहीं सुधरेंगे की तर्ज पर ‘कांग्रेस’

देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस ने बीते करीब एक दशक में अर्श से फर्श तक का सफर तय किया है। राजनीतिक विश्लेषकों की माने ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पार्टी के भीतर से ही कई सदस्यों ने बगावती सुर बोलने शुरू कर दिए थे।गांधी परिवार के सदस्य पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के निशाने पर हैं। पार्टी बुरी तरह से अंतर्कलह में डूबी है।
ऐसे में अगर केरल और असम की सत्ता हासिल नहीं हुई तो पार्टी में अंतर्कलह चरम पर होगा। पार्टी की कमान गांधी परिवार से बाहर के व्यक्ति को देने की मांग फिर उठेगी। राहुल गांधी पर हमले और तेज होंगे। वैसे भी पांच राज्यों के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के लिए पहले ही खतरे की घंटी बजा दी है।

राजनीति में अब नए समीकरण पैदा होंगे

 

पश्चिम बंगाल में अब तृणमूल जीत चुकी है और कांग्रेस को असम और केरल में खास सफलता नहीं मिली,  इससे एक बात निश्चित है वह यह कि विपक्ष की राजनीति में अब नए समीकरण पैदा होंगे।  अगर तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के हाथों सत्ता गंवाई होती तब गैर कांग्रेसी चेहरे की अगुवाई में विपक्ष को एक मंच पर लाने की मुहिम शुरू होती, लेकिन यह अब बीत गयी बात हो गयी है और इस तरह की सभी गुंजाइश खत्म हो गयी है।
कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय सचिव रणदीप सुरजेवाला ने इस पर कहा है कि असम और केरल के चुनाव परिणाम हमारे लिए चिंतन का विषय हैं।इन दोनों ही राज्यों में हमारे कार्यकर्ताओं व नेताओं ने मिलकर धरातल पर कड़ी मेहनत की पर जनता का मत फिर भी हमारे पक्ष में नहीं रहा।

 

 

यह पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों पर कांग्रेस पार्टी का बयान है। रणदीप सुरजेवाला ने आगे कहा कि लोकतंत्र में जनता का मत ही सर्वोपरि होता है। पश्चिमी बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी की जनता ने अगले 5 साल के लिए अपना जनमत दे दिया है। हम इन चुनाव परिणामों को पूरी विनम्रता और जिम्मेदारी से स्वीकार करते हैं।   इस विषय पर कोई दो राय नहीं हो सकती कि चुनाव परिणाम हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं हैं, विशेषकर असम और केरल विधानसभा के चुनाव परिणाम हमारे लिए चुनौतीपूर्ण भी हैं और आशा के विपरीत भी।

चुनाव हारे हैं, पर हिम्मत नहीं हारी है : कांग्रेस

 रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि हम चुनाव हारे हैं, पर न ही हिम्मत हारी, न मनोबल खोया और न ही आगे बढ़ते रहने का संकल्प। कांग्रेस पार्टी इन चुनाव परिणामों का पार्टी मंच पर विधानसभावार विश्लेषण करेगी और जहां जो भी कमियां रही हैं, भविष्य के लिए उन्हें सुधार कर हम और गंभीरता से काम करेंगे।

विभाजनकारी एजेंडे और धनबल व बाहुबल की ताकत को नकारकर बंगाल के भाईचारे को तरजीह दी : सुरजेवाला

 

 

उन्होंने कहा कि पूरे देश और खास तौर से जिन राज्यों में चुनाव हुए वहां की जनता के साथ हमारा रिश्ता केवल राजनैतिक नहीं बल्कि आत्मिक है। हम इस रिश्ते में और अधिक विश्वास और अपनापन पैदा करने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे। दोनों ही राज्यों में हम एक जिम्मेदार विपक्ष के रूप में जनता की समस्याओं को सदन में भी और सदन के बाहर भी पूरी ताकत से उठाएंगे।  हम पश्चिम बंगाल की जनता को बधाई देते हैं, जिसने भाजपा के विभाजनकारी एजेंडे और धनबल व बाहुबल की ताकत को नकारकर बंगाल के भाईचारे को तरजीह दी।

जनता ने भाजपा और एआईएडीएमके के गठबंधन को नकारकर हमारे गठबंधन में विश्वास जताया है

 

उन्होंने आगे कहा कि  बेशक बंगाल के चुनाव परिणाम हमारे लिए चिंतन का विषय हैं लेकिन, हम ममता बनर्जी जी को बधाई देते हैं कि उन्होंने निर्णायक जीत प्राप्त कर भाजपा के नफरत और बंटवारे के एजेंडे के दांत खट्टे किए।  हम असम में भारतीय जनता पार्टी व सर्बानंद सोनोवाल को जीत की मुबारकबाद देते हैं।
हम केरल में एलडीएफ व पिनरई विजयन को भी जीत की शुभकामनाएं देते हैं। हमें उम्मीद है कि वो न केवल अपने चुनावी वादों पर खरा उतरेंगे, बल्कि महामारी के इस माहौल में हर जीवन की रक्षा बाबत अपनी सरकार की पूरी ताकत लगाएंगे। तमिलनाडु में हम द्रमुक गठबंधन के साथ मिलकर चुनाव लड़े। जनता ने भाजपा और एआईएडीएमके के गठबंधन को नकारकर हमारे गठबंधन में विश्वास जताया है।

कांग्रेस की चुनावी जोड़-तोड़

 

सुरजेवाला ने कहा कि इस वक्त चुनावों से भी बड़ी प्राथमिकता देश को कोविड के संकट से उबारने की है। कांग्रेस पार्टी, युवा कांग्रेस और कांग्रेस सेवादल के कार्यकर्ता लोगों की हर संभव सहायता कर रहे हैं। हमारा केंद्र की मोदी सरकार से अनुरोध है कि अब चुनावी जोड़-तोड़ से निकलकर कोविड संक्रमण से अप्रत्याशित तौर से जूझ रही देश की जनता के लिए इलाज, जीवनरक्षक दवाइयां, अस्पताल बेड व ऑक्सीजन के बंदोबस्त पर ध्यान दें और वैक्सीनेशन कार्यक्रम पर एक राष्ट्रीय नीति बनाकर काम करें। यही सच्ची देश सेवा है।
पर कांग्रेस पार्टी की ओर से जारी इस बयान के पीछे असल मुद्दा कि आख़िर देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी का इस चुनाव में इतना ख़राब प्रदर्शन क्यों रहा ,यह बात पूरी ही नहीं हुई।

 

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोरोना काल की विफलताओं के ठोस कारण दिए हैं

बल्कि राहुल गांधी की बात करें तो वह पहले से ज्यादा सक्रियता से देश और विदेश के विभिन्न मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपनी बात कहीं ज्यादा अच्छे तरीके से जनता तक पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं। पिछले दिनों राहुल गांधी का एक विदेशी मीडिया संस्थान को दिया गया साक्षात्कार ,राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय रहा। जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कोरोना काल की विफलताओं के ठोस कारण दिए हैं।

कई नेताओं ने गांधी परिवार को भी खुलकर कोसना शुरू कर दिया था : सुरजेवाला

असल में देखा जाए तो प्रियंका गांधी और राहुल गांधी दोनों ही अपने प्रशंसकों के बीच लोकप्रियता के सोपानों पर अभी भी हैं। लेकिन पार्टी के भीतर पिछले एक दशक में अंतर्कलह ने काफी नुकसान पहुंचा दिया है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण जी-23 के नेताओं में साफ़ फूट को देखकर समझा जा सकता है।
जम्मू में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पार्टी के खिलाफ बगावत का सुर खुलकर बोलना शुरू कर दिया। जहां जम्मू में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के निशाने पर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद थे। तो वहीं कई नेताओं ने गांधी परिवार को भी खुलकर कोसना शुरू कर दिया था।
यह पहली बार था जब  दिल्ली से जम्मू पहुंचे कांग्रेस आलाकमान के खिलाफ बगावत का सुर उठाने वाले वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ कांग्रेस पार्टी के कार्यकताओ ने प्रदर्शन किया।
कांग्रेस पार्टी आलाकमान के खिलाफ जहर उगल चुके जी 23 के इन नेताओं की अगुवाई कर रहे गुलाम नबी आजाद का भी नाराज कांग्रेसियों ने पुतला फूंका था। इस प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे जम्मू कश्मीर प्रदेश कांग्रेस के सचिव और हाल ही में डीडीसी चुनाव जीतकर आए शहनवाज चौधरी ने आरोप लगाया था कि  गुलाम नबी आजाद बीजेपी की भाषा बोल रहे हैं।

जम्मू में गांधी ग्लोबल फैमिली के बैनर तले जो कांग्रेसी नेता हुए थे जमा

दरअसल जम्मू में गांधी ग्लोबल फैमिली के बैनर तले जो कांग्रेसी नेता जमा हुए थे, जहां उन्होंने कांग्रेस के आलाकमान पर उंगलियां उठाई थीं। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद के साथ वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल, राज बब्बर, मनीष तिवारी, भूपेंद्र हूडा, विवेक तंखा और आनंद शर्मा जुटे थे।
 वहीं पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दो बड़े नेताओं आनंद शर्मा और अधीर रंजन चौधरी के बीच चल रही बयानबाजी पर भी शाहनवाज़ चौधरी ने चुटकी ली थी। उधर एक कांग्रेसी नेता चनवा चौधरी ने आरोप लगाया था कि अगर गुलाम नबी आजाद जम्मू में बीजेपी की भाषा बोल रहे हैं तो वही काम आनंद शर्मा बंगाल में कर रहे हैं ।

आनंद शर्मा ने क्या कहा था?

आनंद शर्मा ने पश्चिम बंगाल में मुस्लिम धर्मगुरु अब्बास सिद्दीकी के नेतृत्व वाले इंडियन सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के साथ पार्टी के गठजोड़ की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में चयनात्मक नहीं हो सकती है। हमें सांप्रदायिकता के हर रूप से लड़ना है।
 शर्मा ने ट्विटर पर कहा था, ‘‘आईएसएफ और ऐसे अन्य दलों के साथ कांग्रेस का गठबंधन पार्टी की मूल विचारधारा, गांधीवाद और नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है… इन मुद्दों पर कांग्रेस कार्य समिति से मंजूरी लेने की जरूरत है।”
इससे पहले शर्मा ने कोलकाता में संयुक्त रैली में भाग लेने के लिए पश्चिम बंगाल कांग्रेस प्रमुख अधीर रंजन चौधरी से स्पष्टीकरण मांगा था, जहां आईएसएफ नेता मौजूद थे।उन्होंने आरोप लगाया था कि उनकी उपस्थिति और समर्थन ‘‘कष्टदायक और शर्मनाक’’ थी।
दरअसल यह सब जब हो रहा था तो देश का एक बड़ा बौद्धिक वर्ग कांग्रेस के आज की परिस्थिति पर मनन कर चुका था। भला यह सम्भव भी तो नहीं कि एक अंदर से बिखर चुकी पार्टी बाहर वोटरों को एक जरूरी और बड़ी संख्या में एकजुट कर सके।
ख़ैर, अब आगे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की राजनीतिक लड़ाई किस तरह कांग्रेस लड़ती है, यह देखने वाला होगा। उत्तराखंड में फिर भी हरीश रावत के नेतृत्व ने कांग्रेस के लिए कुछ फसल तैयार जरूरी कर दी है।

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