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जलयुद्ध के पथ पर देश

 

वर्ष 2030 तक देश की चालीस फीसदी आबादी पेयजल के गंभीर संकट से जूझने को विवश होगी। ऐसे में हर घर नल से पानी पहुंचाने की मोदी सरकार की योजना के लिए भी बड़ी चुनौती है
दो जून को महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के फूलंबरी तालुका से एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। जिसमें कुछ महिलाएं अपनी बाल्टियों और डिब्बों को भरने के लिए एक पानी टैंकर के पीछे दौड़ रही हैं। टैंकर निर्माणाधीन सड़क पर पानी छिड़क रहा था। यानी टैंकर में पीने लायक पानी नहीं था। फिर भी महिलाएं उसके पीछे-पीछे दौड़ रही थीं। तीन साल पहले एक और तस्वीर महाराष्ट्र से ही आयी थी। तब ट्रेन से लातूर पानी भेजा गया था। इन दोनों तस्वीरों का महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने का यह कतई अर्थ नहीं है कि जल संकट सिर्फ वहीं है, बल्कि अधिकांश राज्यों के लोग जल संकट से जूझ रहे हैं। राजधानी दिल्ली में तो कई कॉलोनियों में पानी टैंकर पहुंचने पर जलयुद्ध जैसी स्थिति बन जाती है। पिछले साल यहां टैंकर से पानी लेने के दौरान आपस में लड़ाई हुई, जिसमें एक की मौत तक हो गई थी।
देश में जल संकट से निपटने के लिए 31 मई को नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘नल से जल योजना’ के तहत 2024 तक हर घर में पीने का पानी पहुंचाने की घोषणा की है। इसकी घोषणा नवगठित केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के कैबिनेट मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने की। आज देश की करीब आधी आबादी यानी 60 करोड़ लोग हर साल पानी की समस्या से लड़ रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार की यह योजना सराहनीय तो है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां हैं। पेयजल मंत्रालय के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए, यह असंभव दिखाई देता है। इस योजना की पहली चुनौती, पानी की
उपलब्धता होगी। क्योंकि सरकार की अनियोजित योजनाएं और लाल फीताशाही के कारण देश के जल संसाधन लगातार बहुत तेजी से घट रहे हैं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक अपने देश में सतह और भूजल सहित कुल जल संसाधन 2,518 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) हैं। इनमें 1,869 सतह जल संसाधन हैं। इनमें से केवल 690 बीसीएम यानी केवल 37 फीसदी पानी ही उपयोग के लायक है। शेष सतह जल संसाधन प्रदूषित हैं। पिछले साल की इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि 400 बीसीएम देश में भूजल है। इसमें से 58 फीसदी भूजल तक यानी केवल 230 बीसीएम भूजल तक ही पहुंच है। यह रिपोर्ट सरकार के नीतिगत थिंक टैंक कहे जाने वाले नीति आयोग की है।
भारत की 40 फीसदी पानी की जरूरत का स्रोत भूजल है। आयोग का कहना है कि यह स्रोत तेजी से कम हो रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल निकालने वाला देश है। वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो अपने देश में पूरी दुनिया का 12 फीसदी भूजल निकाला जाता है। नतीजतन, दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई और हैदराबाद सहित 21 भारतीय शहर 2020 तक भूजल से बाहर निकल जाएंगे। इससे 10 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। नीति आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक देश की 40 फीसदी आबादी को पीने का पानी नहीं मिल पाएगा। ऐसे में ‘हर घर नल से जल योजना’ की सफलता पर शुरुआती दौर में ही सवाल खड़े होने लगे हैं।
नीति आयोग ने ही अपने रिपोर्ट में पानी की कमी के कारण देश पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ की ओर भी इशारा किया है। शुद्ध पेयजल नहीं मिलने के कारण लोगों का अस्वस्थ होना स्वभाविक है। जिन परिवारों को या जिन इलाकों में शुद्ध पेयजल नहीं मिल पाता है, वहां के लोगों में कई तरह की बीमारियां पाई गई हैं। ऐसे में पानी का संकट देश के स्वास्थ्य का बोझ भी बढ़ाएगा। वर्तमान में शुद्ध पेयजल नहीं मिलने के कारण हर साल दो लाख लोगों की मौत होती है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया की कुल आबादी के 16 फीसदी लोग भारत में निवास करते हैं, जबकि पूरे विश्व के कुल शुद्ध जल का केवल 4 फीसदी ही यहां उपलब्ध है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 70 फीसदी पानी दूषित होने के कारण भारत वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में 122 देशों में से 120 वें स्थान पर है। मोदी सरकार के लिए इस सूचकांक में बेहतर करने की भी चुनौती है।
भारत में हर आठ या नौ साल में भयंकर सूखा पड़ता है। इसका कारण पर्यावरण की अनदेखी और देश के जंगलों का अवैध कटान है। इसके लिए भी सरकार की नीति ज्यादा जिम्मेदार मानी जाती है। इंडियन इंस्टीट््यूट ऑफ
टेक्नोलॉजी, इंदौर और गुवाहाटी ने संयुक्त रूप से पिछले साल एक पेपर प्रकाशित किया था। उसमें कहा गया है कि पांच में से तीन जिले सूखे के लिए तैयार नहीं हैं। अध्ययन में शामिल किए गए लगभग 634 जिलों में से कम से कम 133 ने लगभग हर साल सूखे का सामना किया है। उनमें से अधिकांश छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र और राजस्थान में हैं। देश में पूरे जल संसाधनों का 80 फीसदी तक कøषि के लिए उपयोग किया जाता है। यहां पीने के पानी के लिए केवल 4 फीसदी खर्च होता है। इसलिए कई विशेषज्ञ सरकार को कई सालों से ड्रिप सिंचाई की सलाह देते आ रहे हैं। लेकिन इस पर किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। मोदी सरकार ने इस ओर जरूर ध्यान दिया है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है। इसमें तेजी लाने की जरूरत है।
दक्षिणी प्रायद्वीप के 31 जलाशयों (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु) में अपनी क्षमता के केवल 11 फीसदी पानी ही बचा है। पश्चिमी क्षेत्र के 27 प्रमुख जलाशयों (गुजरात और महाराष्ट्र भी शामिल हैं) में जल स्तर भंडारण क्षमता का 11 फीसदी शेष रहा है। जलाशयों में पानी की इस कमी की वजह भीषण गर्मी मानी जा रही है। देश के अधिकांश राज्यों में पारा 50 डिग्री सेल्सियस से ऊपर या उसके करीब पहुंच गया है। इसके लिए देश में जंगलों का कम हो रहा क्षेत्रफल भी कारण है। राज्य सरकारों, नौकरशाह और टिम्बर माफिया की मिलीभगत से जंगल पर धड़ल्ले से आरियां चल रही हैं। इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। जब पर्यावरणविद इस पर सवाल या आंदोलन चलाते हैं तो सरकार उसे नजरअंदाज करती रही है, ठीक वैसे ही जैसे गंगा को बचाने के लिए जीडी अग्रवाल जैसे संन्यासी को आंदोलन में अपनी जान देनी पड़ती है।
पीस संस्थान चैरिटेबल ट्रस्ट के कार्यकारी निदेशक और यमुना जी अभियान के प्रमुख मनोज मिश्रा कहते हैं, ‘यदि हम आज से अपनी नदियों को बचाने में जुट जाएं तो भी शुद्ध पानी के संकट पर जीत दर्ज कर लेंगे। इसके लिए नदियों में पानी की सफाई करने के बजाय, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का उपयोग हमारे कचरे को साफ करने के लिए किया जाना चाहिए। फिर उसे गैर-पीने की जरूरतों के लिए पुनः उपयोग करना चाहिए। वर्तमान में 63 फीसदी सीवेज अपशिष्ट जल भारत में नदियों और झीलों में डालकर शुद्ध पानी को प्रदूषित करते हैं।’
दिल्ली में पिछले कई दिनों से पानी की समस्या पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। यहां के मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव में हार के बाद लोगों से क्षेत्र में मिलना शुरू किया तो उन्हें लोगों के गुस्से का सबसे ज्यादा शिकार पानी पर ही होना पड़ा। दिल्ली जैसी स्थिति हर मेट्रो सिटी और बड़े शहर की है। इसलिए जब कुछ विशेषज्ञ यह कहते हैं कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा तो यह सही प्रतीत होता है। फिलहाल अभी भारत में ही कई राज्य पानी के बंटवारे पर एक-दूसरे के खिलाफ तलवार खींच लिए हैं। इन राज्यों के लोगों के बीच भी दूरियां बढ़ी हैं।
ू धरती पर तीन चौथाई पानी होने के बावजूद दुनिया में पीने लायक पानी केवल 3 फीसदी है। इसकी उपलब्धता सुलभ भी नहीं है।
ू दुनिया में सौ करोड़ से अधिक लोगों को पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है।
ू 270 करोड़ लोगों को साल में एक महीने पीने का          पानी नहीं मिलता।
ू साल 2014 में दुनिया के 500 बड़े शहरों में हुई एक जांच के मुताबिक हर चार में से एक नगर
पालिका पानी की समस्या से जूझ रही है।
ू संयुक्त राष्ट्र के अनुसार ‘पानी की कमी’ प्रति व्यक्ति सालाना सप्लाई 1700 क्यूबिक मीटर से कम होने पर मानी जाती है।

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