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दिल्ली पर दबदबे की जंग

भाजपा की नीति और नीयत पर सवाल उठ रहे हैं कि जो पार्टी कभी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग जोर-शोर से उठाती थी, आज वह उपराज्यपाल को अतिरिक्त अधिकार दिए जाने की वकालत भला क्यों कर रही है? क्या वह जनता की चुनी हुई सरकार पर लगाम लगाकर खुद पिछले दरवाजे से शासन करना चाहती है? जो विधेयक केंद्र सरकार ने संसद में पारित करवाया उसने आम आदमी पार्टी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विपक्ष को भाजपा के खिलाफ हमलावर होने का मौका दे दिया है

 

अतीत में भाजपा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग कर चुकी है। जब केंद्र की सत्ता में कांग्रेस काबिज हुआ करती थी तो उस वक्त भाजपा यह मांग जोर-शोर से उठाती रही, लेकिन अब यह मुद्दा उसके लिए किसी मतलब का नहीं रहा। अब भाजपा उपराज्यपाल के अधिकार बढ़ाए जाने के पक्ष में है। इसके लिए भाजपा की केंद्र सरकार एक बिल लाई है। राष्ट्रीय राजधानी राज्य क्षेत्र शासन (संशोधन) विधेयक 2021 (जीएनसीटीडी) नामक इस बिल को हंगामे के बीच पहले लोकसभा तो फिर राज्यसभा में पारित कर दिया गया है। केंद्र सरकार की दलील है कि ये बिल सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए इन निर्देशों को बढ़ावा देता है, जिसके तहत दिल्ली में राज्य सरकार और उपराज्यपाल की जिम्मेदारियों को बताया गया है। दूसरी तरफ दिल्ली सरकार की आपत्ति है कि बिल में कहा गया है कि ‘राज्य की विधानसभा द्वारा बनाए गए किसी भी कानून में सरकार का मतलब उपराज्यपाल होगा। दिल्ली सरकार का साफ कहना है कि यह एक चुनी हुई सरकार के अधिकारों को छीनने वाला बिल है। जनता के विश्वास के साथ धोखा है।

आम आदमी पार्टी ने केंद्र सरकार की नीयत पर सवाल उठाए हैं कि अगर केजरीवाल सरकार दिल्ली में कोई नया नियम या कानून बनाना चाहती है, तो उस पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ ही एलजी की भी अनुमति जरूरी होगी। इस तरह केंद्र सरकार दिल्ली की केजरीवाल सरकार को एलजी की अनुमति का मोहताज बनाकर उस पर नकेल डालने की तैयारी कर रही है। इस तरह दिल्ली की केजरीवाल सरकार अब ‘आप’ पार्टी की सरकार नहीं कहलाएगी, बल्कि वह उपराज्यपाल की सरकार होगी।

लोकसभा में 22 मार्च को पास हुए नए बिल के अनुसार अब दिल्ली में दिल्ली की जनता द्वारा चुनी हुई सरकार नहीं गृह मंत्रालय के द्वारा नियुक्त अफसर की सरकार होगी। जनता इसे ब्रिटिश राज की उपमा दे रही है। जिस तरह ब्रिटिश राज में लंदन से थोपे गए वायसराय को ही सरकार माना जाता था और तथाकथित मंत्रिमंडल सिर्फ हाथी के दांत की तरह होता था, उसी तरह दिल्ली में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार की स्थिति होगी। इस पर कांग्रेस नेता तारिक अनवर ने कहा कि ये बिल लोकतंत्र पर सीधा हमला है। जिस सरकार को जनता ने चुना है, उसकी शक्तियों को कम करना लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक है। इस बिल को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जानी चाहिए, जबकि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बिल को असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक बताया है। उन्होंने ट्वीट किया, ‘बीजेपी को दिल्ली के लोगों ने खारिज कर दिया है। पहले विधान सभा में सिर्फ आठ सीटें दीं, फिर हाल के नगर निगम उपचुनाव में एक भी सीट नहीं दी।’ केजरीवाल ने आरोप लगाया कि बीजेपी जनता से बदला लेने के लिए चुनी हुई सरकार की शक्तियों को कम करना चाहती है।

 

बिल के जरिए बदलाव

1. कानून के सेक्शन 21 में बदलाव करके कहा गया है कि दिल्ली विधानसभा से पारित किए गए किसी भी कानून में सरकार शब्द का मतलब उपराज्यपाल माना जाएगा।

2. इसके अलावा सेक्शन 24 का दायरा बढ़ाया गया है, जिसमें अगर उपराज्यपाल चाहे तो विधानसभा से पारित कानून को मंजूरी देने से मना कर सकता है।

3. सेक्शन 44 में भी बड़ा बदलाव किया गया है, जिसके मुताबिक दिल्ली सरकार या विधानसभा द्वारा लिए गए किसी भी फैसले के क्रियान्वयन के पहले उपराज्यपाल की राय लेना अनिवार्य बनाया गया है।

फिलहाल, सवाल कई हैं। अगर मंत्री परिषद विधानसभा के प्रति जवाबदेह है तो एलजी सरकार कैसे हो सकता है। किसी फैसले पर अगर सरकार अल्पमत में आती है तो मंत्री परिषद हटेगी या एलजी? नया संशोधन विधेयक वर्तमान कानून के सेक्शन में बदलाव करके कहता है कि सरकार के मायने होंगे एलजी। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी जोरों से शुरू हो गई है कि जब दिल्ली में केंद्र सरकार अपना कोई राजनीतिक हस्तक्षेप करने में नाकाम रही तो उसने अब बिल में संविधान के अनुच्छेद 239 ए का सहारा लेकर केजरीवाल सरकार पर चैकीदारी शुरू करने की रणनीति बनाई है।

यहां यह भी बताना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने वर्ष 2018 में अपने फैसले में स्पष्ट कहा था कि लोक व्यवस्था, पुलिस और जमीन को छोड़कर अन्य विषयों पर एलजी की सहमति बाध्यकारी नहीं है, बल्कि एलजी के लिए मंत्रिमंडल की सिफारिशंे बाध्यकारी हंै। इसी के साथ ही कहा जा रहा है कि केंद्र सरकार ने एक और बड़ी गलती की है। वह यह कि बगैर संविधान के प्रावधान 239ए उपबंध 6 को संशोधित किए सरकार की परिभाषा बदलने का प्रस्ताव रखा गया है। यह उपबंध मंत्री परिषद को विधानसभा के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर आधारित है।

गौरतलब है कि अब तक दिल्ली की विधानसभा सिर्फ तीन मामलों में कानून नहीं बना सकती थी, वह हैं पुलिस, शांति व्यवस्था और भूमि मामले। लेकिन अब हर कानून के लिए उसे उप राज्यपाल से सहमति लेनी होगी। राज्यपाल अब किसी भी विधेयक को कानून बनाने से रोक सकता है। चर्चा है सदन में इस बिल के पास होने के बाद अब दिल्ली सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाएगी। इसके साथ ही कानून के जानकारों का यह भी कहना है कि बिल के सदन में पास हो जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में गए तो सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द कर सकता है। आखिर देश में सबसे बड़ी अदालत जनता की अदालत ही होती है। जनता की अदालत में भी केजरीवाल सरकार इस मुद्दे को लेकर जरूर जाएगी। जिसमें केंद्र सरकार पर किसी चुनी हुई सरकार के खिलाफ खड़ी की जा रही एलजी रूपी दीवार को लेकर सवाल तो खड़े होंगे ही।

 

क्या है 1991 का कानून

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम 1991 के अनुसार, केंद्र सरकार के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी उपराज्यपाल पर है। जमीन, पुलिस और प्रशासन उपराज्यपाल के अधीन हैं। लेकिन, अन्य मामलों में उपराज्यपाल चुनी हुई सरकार का निर्णय मानने को बाध्य हैं। नए विधेयक को मंजूरी मिल जाने के बाद दिल्ली सरकार राज्यपाल की स्वीकृति के बगैर कोई निर्णय नहीं कर पाएगी। यानी नए संशोधन बिल 2021 के पारित होने पर 1991 का कानून और 2018 का सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला, जिसमें दोनों संवैधानिक पदों के अधिकारों को स्पष्ट किया गया था, का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की यह आशंका निर्मूल नहीं है कि यदि ऐसा हुआ तो दिल्ली में निर्वाचित सरकार और विधानसभा अनुपयोगी हो जाएंगे। निर्वाचित सरकार होने के बावजूद व्यवहार में केंद्र का ही राज स्थापित होगा।

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