अगले वर्ष देश में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर बसपा और सपा के बीच की (कुर्बानी साझेदारी) जीत के लिए नहीं अपितु अपनी- अपनी पार्टी के अस्तित्व को बचाने के लिए है। यदि इस बार बसपा- सपा का फार्मूला फेल हो गया तो निश्चित तौर पर इन दोनों दलों के लिए अस्तित्व बचाना मुश्किल हो जायेगा। उपचुनाव में जीत का जोश दोनों ही दलों में हैए देखना शेष है कि यह जोश जीत में कैसे तब्दील होता है।
बसपा नेताओं से चर्चा के दौरान जो बात निकलकर सामने आयी है उसके मुताबिक बसपा प्रमुख को अब अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा सीटें पाने की लालसा नहीं रहेगीए अपितु यूपी में बसपा को पुनर्जीवित करने के लिए पार्टी प्रमुख मायावती हर तरह की कुर्बानी देने को तैयार हैं। यही वजह है कि पार्टी में भारी मतभेद के बावजूद सपा प्रमुख अखिलेश यादव की हर शर्त को वे मानने के लिए वे तैयार हैं। सीटों के बंटवारे को लेकर भी कोई मनमुटाव नहीं है तो दूसरी ओर पार्टी के संयुक्त एजेण्डे पर भी मायावती का कोई ज्यादा जोर नहीं है। सपा के समक्ष पूरी तरह से समर्पण का यह भाव इस बात का प्रतीक है कि मायावती को अब आगामी लोकसभा चुनाव में जीत से ज्यादा जरूरी पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखना है। बात यदि पार्टी प्रमुख मायावती के असल मकसद की करें तो मायावती की नजरें लोकसभा से ज्यादा यूपी के अगले विधानसभा चुनाव पर गड़ी हैं। अन्दरखाने से मिली जानकारी के अनुसार तय यही हुआ है कि लोकसभा चुनाव में सपा की शर्तांे पर बसपा की तरफ से चुप्पी रहेगी तो अगले विधानसभा चुनाव में बसपा की शर्तों का पालन सपा करेगी। यह दीगर बात है कि लगभग चार वर्ष पश्चात गठबंधन की स्थिति क्या रहती है और कौन ज्यादा समय तक वायदे पर टिका रहता है। सभी जानते हैं कि बसपा ऐन वक्त पर यूटर्न लेने में माहिर है। हालांकि यह बात सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी भलीभांति जानते हैं लेकिन मौजूदा स्थिति यह है कि भाजपा की नींव हिलाने के लिए गठबन्धन की शर्तों का पालन करना दोनों की मजबूरी है। रही बात बसपा की आगामी लोकसभा चुनाव में अपनी हैसियत का अंदाजा करवाने की तो उसने अभी से अपनी तैयारियों को एक नए अंदाज में अमली जामा पहनाना शुरु कर दिया है। इस बार बसपा पूरी तरह से अपने दलित एजेंडे को लेकर मैदान में नजर आयेगी और वह भी युवाओं के जोश के साथ। वैसे तो पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को भी चुनाव की पूरी कमान सौंपी जायेगी लेकिन कमान पर मजबूत पकड़ बसपा प्रमुख मायावती की होगी। पिछले लोकसभा चुनाव यवर्ष 2014 में शून्य देखने के बाद वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में मात्र 19 सीटों पर सिमट जाना पार्टी के अस्तित्व को चुनौती थी। पार्टी की ऐसी स्थिति तब हुई थी जब वर्ष 2007 में उसने पूर्ण बहुमत के आधार पर यूपी में शासन किया हो। उस वक्त भी कमान सतीश चंद्र मिश्रा के हाथों में थी और वह भी स्वतंत्र रूप से। हालांकि बसपा प्रमुख मायावती इस बार भी सर्वजन हिताए, सर्वजन सुखाए की थीम पर ही मैदान में नजर आयंेगी लेकिन अधिकतर प्रत्याशियों की शक्लें बदली- बदली सी दिखेंगी। इस बार मायावती अधिकतर सीटों पर युवकों का टिकट देने का मन बना चुकी हैं। इन युवकों में से भी अधिकतर युवक दलित समुदाय से जुडे़ होंगे। खासतौर से छात्र शक्ति पर बसपा की नजरें जमी होंगी।
पार्टी मं युवाओं को ज्यादा से ज्यादा संख्या में जोड़ने के लिए तैयारियों भी अपने चरम पर हैं। बाकायदा जिला स्तर पर सम्मेलन का खाका भी खींचा जा चुका है। बसपा नेताओं के अनुसार मायावती ने सख्त आदेश दिए हैं कि पार्टी में कम से कम 50 प्रतिशत संख्या युवाओं की होनी चाहिए। तैयारियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अभी जिलेवार सम्मेलन किए जाने की तिथि घोषित नहीं की गयी फिर भी कैडर की हर कमेटी में 50 फीसदी युवाओं को जोड़े जाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गयी है। युवाओं की 50 फीसदी कोटा बाकायदा फिक्स कर दिया गया है। इस रणनीति के तहत प्रत्येक जिलों में बूथ सेक्टर और जिला संगठन में आधे पद युवाओं को दिए जाने लगे हैं।
बसपा की यह रणनीति इस बार के लोकसभा चुनाव में क्या गुल खिलायेगी इसका फैसला तो चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद ही हो सकेगा लेकिन बसपा प्रमुख के इस फैसले से इतना तो है कि बसपा में युवाओं की रुचि बढ़ती जा रही है जो कम से कम प्रदेश स्तर की राजनीति के लिए एक शुभ संकेत है। रही बात इस प्रयोग के लाभ की तो इस प्रयोग का लाभ भले ही बसपा को अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में नजर न आए लेकिन यूपी के अगले विधानसभा चुनाव में बसपा के लिए यह प्रयोग लाभप्रद हो सकता है और सच यह भी है कि बसपा की नजरें अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से अधिक वर्ष 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव पर ज्यादा हैं। यदि लोकसभा चुनाव के दौरान बसपा ने अच्छा प्रदर्शन कर दिखाया तो निश्चित तौर पर यूपी के अगले विधानसभा चुनाव में सपा को उसकी सभी शर्तों को मानने की मजबूरी बन जायेगी जिसके आसार अभी से नजर आने लगे हैं।
जब से बसपा और सपा ने मिलकर उप चुनावों में भाजपा को झटका दिया है तब से दोनों की दलों के प्रमुखों में जोश ज्यादा नजर आने लगा है। यदि इसी जोश को होश के साथ दोनों दलों ने चुनावी रणनीति में शामिल कर लिया गया तो निश्चित तौर पर अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को यूपी में अपना पांव जमाए रखना कठिन हो जायेगा।

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