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महफूज रही जम्हूरियत की आवाज

साल 2018 ने कई अहम मोड़ देखे। शुरू में ही सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने प्र्रेस कांफ्रेंस कर सर्वोच्च अदालत की कार्य प्रणाली पर सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने कई अहम फैसले भी दिए। एससी- एसटी एक्ट को लेकर दलितों और सवर्णों का आक्रोश आंदोलन में तब्दील हुआ। उत्तर से लेकर दक्षिण तक किसान आंदोलित हुए। प्राकृतिक आपदाओं और हादसों ने भी खूब डराया। सियासत में बड़ा उलटफेर हुआ। कहीं कांग्रेस तो कहीं भाजपा को नुकसान पहुंचा। गठबंधनों के बनने और बिगड़ने की चर्चाएं रहीं। रक्षा सौदों पर राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोप के बीच खुशी की बात यह रही कि देश ने विज्ञान के क्षेत्र में कुछ खास उपलब्धियां भी हासिल की
सू रज के ढलने की तरह वर्ष 2018 का साल खत्म हो रहा है। नववर्ष की नई सुबह के आगमन का बेसब्री से इंतजार है। यह साल कुछ मीठी, कुछ कड़वी यादें छोड़ विदा लेने वाला है। नए साल में कदम रखने से पहले पीछे की धुंधली होती तस्वीर को उलट-पुलट लेना अच्छा माना जाता है। उससे पिछली गलतियों से सबक मिलता है और बीता समय आगे के लिए लीक भी तैयार करता है।
साल 2018 की शुरूआत यदि कहें तो एक अभूतपूर्व लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण घटना से हुई। शायद आजाद भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के चार जज मीडिया के जरिए जनता के बीच आए। जनवरी 12 को नई दिल्ली के तुगलक रोड पर बंगला नंबर चार में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों जे चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसफ ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नाम सात पेज का पत्र सार्वजनिक किया। जजों ने प्रेस कांफ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए। जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि वे मजबूर होकर मीडिया के सामने आए हैं। जजों ने यह चिंता भी जाहिर की कि देश में अगर न्यायपालिका निष्पक्ष नहीं रहेगी तो लोकतंत्र जीवित नहीं रहेगा। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय जैसी गरिमामयी संस्था जजों का इस तरह के मसलों को सार्वजनिक करना हैरान करता है। हालांकि बाद में मुख्य न्यायाधीश और जजों ने बातचीत कर इस मसले को खत्म कर लिया।
सुप्रीम कोर्ट सिर्फ विवादों में ही नहीं रहा बल्कि उसने कुछ अहम फैसले भी सुनाए। इस लिहाज से वर्ष 2018 ऐतिहासिक रहा। कोर्ट के ये फैसले समानता और सशक्तिकरण की दिशा में नजीर बने। सुप्रीम कोर्ट ने 158 साल पुराने व्यभिचार-रोधी कानून को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने धारा 377 को रद्द करते हुए कहा कि अब समलैंगिकता अपराध नहीं है। इसके अलावा लंबे समय से आधार की वैधानिकता को लेकर छिड़ी बहस पर भी कोर्ट ने विराम लगा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आधार आम आदमी की पहचान है और कोर्ट ने कुछ बदलावों के साथ आधार की संवैधानिकता को बरकरार रखा। कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री पर लगे बैन को हटा दिया। राफेल डील को लेकर लंबे समय से घिरी सरकार को कोर्ट से राहत मिली। सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर को राफेल सौदे पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए मोदी सरकार को क्लीन चिट दे दी।
सियासी घटनाओं की ओर देखें तो 2018 बेहद खास रहा। खासकर कांग्रेस और विपक्षी दलों के लिए, क्योंकि इस साल कांग्रेस और विपक्ष पहले की तुलना में मजबूत हुआ। 2014 के बाद से प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी के सामने विपक्ष लगातार कमजोर हो रहा था। साल के शुरुआती महीनों में ही विपक्षी एकता ने जोर पकड़ा। 2014 के बाद से ऐसा माना जा रहा था कि देश में एक दल को बहुमत का दौर चल पड़ा है। लेकिन अप्रासंगिक हो गई कई छोटी पार्टियां साल के आखिरी महीनों तक प्रासंगिक बनकर उभरीं। विपक्षी एकता की मुहिम को फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा उपचुनाव में बीजेपी की हार से बल मिला। उपचुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस ने मिलकर भाजपा से दोनों प्रतिष्ठित सीटें झटक लीं। विपक्ष के लिए तब दो सीटों से ज्यादा अहम भाजपा को हराना था। इस जीत ने विपक्ष को भाजपा से लड़ने का फॉर्मूला दे दिया। नए साल में इसी फॉर्मूले पर आम चुनावों के लिए गठबंधन की बिसात बिछने लगी। इसके अलावा कांग्रेस ने प्रधानमंत्री मोदी को उनके ही गृह राज्य गुजरात में संघर्ष करने को मजबूर कर दिया तो वहीं कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भाजपा बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस ने भाजपा को सरकार बनाने नहीं दी। ठीक गोवा के तर्ज पर कर्नाटक में सरकार का गठन हुआ।
हाल में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों के बाद विपक्ष बीजेपी की घेराबंदी का ताना-बाना बुनने में जुट गया है। तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में जीत दर्ज कर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने भाजपा को बड़ा झटका दिया। आम चुनाव से कुछ माह पहले भाजपा के लिए यह बहुत बड़ा झटका था। उस झटके का ही नतीजा रहा कि मोदी- शाह एनडीए के छोटे दलों के सामने झुकने को मजबूर हुए। इसका लाभ सर्वप्रथम एनडीए के घटक दल लोजपा ने उठाया और बिहार में उम्मीद से ज्यादा सीटें झटक ली। अब एनडीए के अन्य घटक दल भी भाजपा के सामने सीना तानकर सौदा करने को तैयार हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उसने त्रिपुरा में वाम सरकार को उखाड़ फेंका पूर्वोत्तर के कई राज्यों में अपनी या गठबंधन की सरकारें बनाई।
बीत रहे साल में कुल 13 लोकसभा सीटों पर उपचुनाव हुए, जिनमें से नौ सीटें 2014 में भाजपा के कब्जे में थीं। सात पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। यानी कमजोर विपक्ष मजबूत और मजबूत एनडीए कमजोर होता दिख रहा है। उसके दो अहम घटक टीडीपी और रालोसपा उसे छोड़कर चले गए। सबसे पुराने घटक शिवसेना ने अलग चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया। अकाली दल ने भी समय-समय पर आंखें दिखाई। हालांकि नए साल में भारतीय राजनीति अभी और कई करवटें लेगी।
बीते साल हॉलीवुड अभिनेत्री एलिसा मिलानो ने कार्यस्थल पर महिलाओं के शोषण और दमन के खिलाफ मीटू कैंपेन शुरू किया था। भारत में मीटू की चर्चा अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने अभिनेता नाना पाटेकर पर आरोप लगाकर की। बॉलीवुड के बाद मीटू का असर राजनीति और खेल सहित समाज के तमाम हिस्सों तक पहुंचा। केंद्र सरकार में राज्यमंत्री रहे एमजे अकबर पर  पत्रकार प्रिया रमानी सहित कई महिलाओं ने आरोप लगाया। जिसके बाद अकबर को इस्तीफा देना पड़ा। मीटू कैंपेन ने भारतीय राजनीति में भी काफी हलचल मचाई। कई नेता इसके समर्थन में आए। एमजे अकबर का इस्तीफा इस कैंपेन की सबसे बड़ी कामयाबी मानी गई।
इस साल देश में कुछ बड़े आंदोलन भी हुए। इससे बदलाव भी देखने को मिला। देश के अन्नदाता (किसान) कई बार सड़कों पर उतरे। कभी दिल्ली तो कभी महाराष्ट्र में किसानों ने अपनी आवाज बुलंद की। तमिलनाडु के किसानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अलग-अलग अंदाज में कई बार विरोध प्रदर्शन किए। किसानों मुंबई और दिल्ली तक पैदल मार्च भी किया। एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में दलित संगठनों ने भारत बंद बुलाया। उस बंद में 9 लोगों की मौत हो गई। कई अन्य घायल भी हुए थे। इस दौरान कई शहरों में आगजनी और हिंसा की घटनाएं भी हुईं। इस आंदोलन के बाद मोदी सरकार ने एससी- एसटी एक्ट में संशोधन कर उसे मूल स्वरूप में बहाल कर दिया। इसके बाद सवर्ण समुदाय के संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया और भारत बंद बुलाया। इस दौरान भी कई जगहों पर हिंसक घटनाएं हुईं। उधर, महाराष्ट्र में मराठा समुदाय के लोगों ने आरक्षण की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन किया। इसके बाद सरकार ने महाराष्ट्र विधानसभा में मराठा आरक्षण बिल पास कर दिया। बिल के मुताबिक, राज्य की 32 ़4 फीसदी मराठा आबादी को 16 फीसदी आरक्षण मिलेगा। दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के तूतीकोरिन में वेदांता समूह के स्टरलाइट कॉपर प्लांट को बंद कराने को लेकर भी बड़ा आंदोलन हुआ। मई में हुए प्रदर्शन में 13 लोगों की पुलिस गोलीबारी में मौत हो गई। मेदांता समूह की इस फैक्ट्री से हो रहे प्रदूषण के खिलाफ लोग महीनों से प्रदर्शन कर रहे थे। फिल्म पद्मावत को लेकर करणी सेना का विरोध भी चर्चा में रहा।
इस साल कई हादसे और प्राकृतिक आपदाओं ने देश को डराया। इन प्राकृतिक आपदाओं और दुर्घटनाओं के कारण सैकड़ों लोगों की मौत हो गई। सबसे बड़ी आपदा केरल में आई, जहां बाढ़ की त्रासदी से करीब 500 लोगों की मौत हो गई। यहां हजारों लोग बेघर हो गए। इसके बाद सबसे बड़ी दुर्घटना पंजाब में हुई। पंजाब के अमृतसर में दशहरे के दिन हुए ट्रेन हादसे में 61 लोगों की मौत ने पूरे देश को सन्न कर दिया। इस साल यूपी और राजस्थान में तूफान की वजह से भी 100 से अधिक लोगों ने जान गंवाई। तेलंगाना एवं पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में बस हादसों ने भी देश को स्तब्ध कर दिया। तेलंगाना के एक बस हादसे में 57 लोगों की मौत हो गई। वहीं, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के नूरपुर में स्कूली बस 200 फीट गहरी खाई में गिर गई। इस हादसे में 27 बच्चों समेत 30 लोगों की जान चली गई। इस प्रकार उत्तराखण्ड में भी एक बस दुर्घटना में 50 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए थे।
मीठी यादों में गुजरात के नर्मदा नदी के बीचों बीच दुनिया का सबसे ऊंचा स्टैच्यू बनकर तैयार होना रहा। नदी के साधु बेट टापू पर बना देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल का स्मारक ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ देश के लिए गौरव की बात है। यह सरदार पटेल के अद्वितीय साहस का प्रतीक है। जिन्होंने बिना खून -खराबे के टुकड़ों में बंटे देश को एकजुट किया था। 182 मीटर ऊंची सरदार पटेल की यह प्रतिमा दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है। आधार सहित इसकी कुल ऊंचाई 240 मीटर (790 फीट) है। यह प्रतिमा अमेरिका के स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ऊंची है। प्रतिमा के निर्माण में करीब 24000 टन स्टील का इस्तेमाल किया गया है।
इसरो के लिए भी जाने वाला साल उपलब्धियों भरा रहा है।  इस साल इसरो ने 12 बड़ी कामयाबियां हासिल कीं। 12 जनवरी, 2018 को कार्टोसैट -2 भेजा गया, 14 नवंबर, 2018 को जीसैट- 29 लांच किया गया। यह इसरो का सबसे भारी उपग्रह है। इसे भारत ने अपने ही रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 डी टू से भेजा। यह इसरो और देश के लिए बहुत बड़ी कामयाबी है। यह रॉकेट आगे चलकर चंद्रयान-2 और मैन मिशन के लिए काम में लाया जाएगा। इससे भारत को भारी उपग्रह भेजने में आत्मनिर्भरता मिली है। इसरो ने इस वर्ष संचार, भू-प्रक्षेपण और नौवहन के क्षेत्र में कई बड़ी और साहसिक कामयाबियां हासिल की हैं।
यह साल भारत की बहादुर बेटियों के साहस के लिए भी याद किया जाएगा। उफनते समुद्र के बीच लहरों की जिद को भारतीय सेना की छह बहादुर महिला अधिकारियों ने अपनी साहस और आत्मविश्वास से रोक दिया। महिला अधिकारियों ने 254 दिन में तीन महासागर, चार महाद्वीप और पांच देशों की साहसिक यात्रा पूरी की। इस सफर में ऐसा वक्त भी आया जब अधिकारियों को पीने के पानी के लिए बूंद-बूंद को तरसना पड़ता था। उन्हें प्यास लगने पर बारिश का इंतजार करना पड़ता था। लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के नेतृत्व में इस दल में लेफ्टिनेंट कमांडर प्रतिभा जामवाल, पी स्वाति और लेफ्टिनेंट ए विजया देवी, बी ऐश्वर्य तथा पायल गुप्ता शामिल थीं।

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