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वसुंधरा राजे की बढ़ती चुनौतियां

नई दिल्ली। राजस्थान में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। फिर से सत्ता में लौटने के लिए उन्हें कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ेगा। उन्हें अहसास हो जाना चाहिए कि चुनावी माहौल के बीच जहां एक ओर भाजपा नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, वहीं कांग्रेस यह संदेश देने की हर संभव कोशिश कर रही है कि पार्टी में कहीं भी कोई खेमेबाजी नहीं है। सभी एकजुट होकर पार्टी को जितवाने के लिए काम कर रहे हैं।
 वसुंधरा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि टिकट बंटवारे में असंतुष्ट नेता पार्टी छोड़ रहे हैं या छोड़ने की धमकी दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव के लिए 131 प्रत्याशियों की पहली लिस्ट जारी होने के साथ ही पांच बार के विधायक कैबिनेट मंत्री सुरेंद्र गोयल ने तत्काल पार्टी से इस्तीफा दे दिया। वे निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। उनके इस्तीफे के साथ ही 21 विधायकों ने भी पार्टी छोड़ने की धमकी दी है। सूत्रों के मुताबिक तीन और कैबिनेट मंत्री कालीचरण सराफ, राजपाल सिंह शेखावत और यूनुस खान भी रुकिये और देखिये की स्थिति में हैं। यदि प्रत्याशियों की अगली लिस्ट में उनका नाम नहीं होगा तो वे भी पार्टी छोड़ सकते हैं।
 वसुंधरा की समस्या टिकट बंटवारे से नाराज विधायकों या नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अब तो सांसद भी उनसे किनारा करने लगे हैं। इसी बीच राजस्थान के दौसा से सांसद हरीश मीणा इसका उदाहरण हैं। उन्होंने भाजपा को अलविदा कहकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। मीणा राजस्थान कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट और राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत की मौजूदगी में कांग्रेस में शामिल हुए। राजस्थान में मीणा जाति का काफी प्रभाव है और पूर्वी राजस्थान में अहम मतदाताओं के तौर पर इन्हें देखा जाता है। ऐसे में हरीश मीणा का पार्टी छोड़ना भाजपा के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह मानकर चल रहे थे कि कांग्रेस में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच मुख्यमंत्री पद के लिए अंदरूनी तौर पर जो खींचतान चल रही है उसका फायदा वसुंधरा को मिल सकता है। लेकिन अब तो यह स्थिति भी बदलती दिख रही है। कांग्रेस यह संदेश दे रही है कि राज्य में  पार्टी के भीतर किसी तरह की फूट नहीं है। खुद अशोक गहलोत ने कहा है कि मैं और सचिन पायलट दोनों ही विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।

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