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वरुण को भारी पड़े बागी तेवर, राष्ट्रीय कार्यकारणी से किए गए बाहर

भाजपा सांसद वरुण गांधी के बागी तेवर आखिरकार उन पर भारी पड़ गए। भाजपा की पुर्नगठित राष्ट्रीय कार्यकारणी से उन्हें और उनकी मां मेनका गांधी को बाहर कर दिया गया है। गांधी परिवार से ताल्लुक रखने वाले वरुण ने अपनी मां के पद् चिन्हों पर चलते हुए भाजपा के सहारे अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू की थी।

 


मेनका गांधी को राष्ट्रीय कार्यकारणी से किया बाहर

मां मेनका गांधी का कांग्रेस में कोई भविष्य गांधी कुनबे की आंतरिक रार के चलते संभव था नहीं इसलिए वर्ष 1984 में स्वर्गीय  राजीव गांधी के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने वाली मेनका बाद में जनता दल में शािमल हो गई थीं।

1989 में पीलीभीत से जनता दल के टिकट पर सांसद बनी मेनका 1992 के चुनावों में भाजपा प्रत्याशी के हाथों पराजित हो गईं। यहां तक मेनका गांधी एंटी भाजपा, एंटी कांग्रेस थीं। 1998 में बतौर निर्दलीय सांसद उन्हें अटल बिहारी सरकार में राज्य मंत्री बनाया गया। इसके बाद वे पूरी तरह भगवामयी हो गईं।

वरुण जब बड़े हुए तब तक मेनका भाजपा ज्वाइन कर चुकीं थीं। राजनाथ सिंह ने भाजपा अध्यक्ष रहते 33 बरस की कम उम्र में वरुण को पार्टी महासचिव बना डाला था। लेकिन मोदी-शाह युग में मेनका और वरुण की पूछ कम होती चली गई। तीन बार लगातार सांसद का चुनाव जीतने वाले वरुण गांधी 2014 के बाद से ही हाशिए पर हैं। 2009 में वे  पीलीभीत से सांसद बने थे। 2014 में सुल्तानपुर से विजयी हुए और 2019 में एक बार फिर से पीलीभीत से चुनाव लड़ संसद पहुंचे। 2014 में मोदी मंत्रीमंडल गठन के समय बड़ी चर्चा थी कि वरुण को मंत्री बनाया जाएगा। तब लेकिन उनकी मां को कैबिनेट मंत्री बनाया गया इसलिए वरुण का नंबर नहीं लग पाया।

तब उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा की केंद्रीय कार्यकारणी में उनको महत्वपूर्ण स्थान दिया जा सकता है लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 2019 में गठित मोदी सरकार में न तो मेनका को लिया गया, न ही वरुण को! ऐसा तब जबकि वरुण गांधी भाजपा के सबसे लोकप्रिय सांसदों में एक माने जाते हैं। मई 2013 में उत्तराखण्ड में आई केदारनाथ आपदा के दौरान बतौर सांसद वे खासे सक्रिय रहे थे।

अगस्त 2013 में प्रकाशित समाचारों के अनुसार वरुण पूरे देश में अकेले ऐसे सांसद थे जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान संसद निधि का पूरी तरह इस्तेमाल करा। तब के अधिकतर सांसदों की सांसद नीधि के तब लैप्स होने की खबरें छपी थीं।

इससे पहले 2011 में अन्ना आंदोलन को भी वरुण ने खुलकर समर्थन दिया था। जब तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने अगस्त 2011, में अन्ना हजारे को दिल्ली में अनशन स्थल देने से इंकार करा था तब वरुण गांधी ने अपने सरकारी आवास में अन्ना को धरना देने के लिए आमंत्रित कर सबको चौका दिया था। 24 अगस्त 2011, को वरुण राम लीला मैदान में अन्ना आंदोलन को समर्थन देने पहुंचे थे। मोदी-शाह के काल में लेकिन वरुण को तवज्जो नहीं देकर भाजपा आलाकमान ने वरुण को बागी बनने की राह दिखा डाली है। वे खुलकर किसान आंदोलन की पैरोकारी कर रहे हैं।

इतना ही नहीं गन्ने के समर्थन मूल्य को लेकर उन्होंने उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को भी घेरना शुरू कर दिया है। लखीमपुर-खीरी कांड पर जहां प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष जय प्रकाश नड्डा ने गहरी खामोशी अख्तियार कर ली है, वरुण खुलकर दोषियों को दण्डित करने और पूरे प्रकरण की जांच सुप्रीम कोर्ट की देख – रेख में कराने की मांग उठा रहे हैं। इस मामले से संबंधित एक वीडियो को अपने ट्विीटर हैंडल में डाल उन्होंने ट्वीट कर भाजपा भीतर खासी बैचेनी पैदा कर दी है।

वरुण ने ट्वीट किया है कि ‘लखीमपुर-खीरी में किसानों को गाड़ियों से जानबूझ कर कुचलने वाला यह वीडिया किसी की भी आत्मा को झकझोर देगा। पुलिस इस वीडियो का संज्ञान लेकर इन गाड़ियों के मालिकों, इनमें बैठे लोगों और इस प्रकरण में संलिप्त अन्य व्यक्तियों को चिन्हित कर तत्काल गिरफ्तारी करें। पार्टी सूत्रों का कहना है कि वरुण ने सीधे-सीधे केंद्रीय गृहराज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को निशाने पर लेकर पार्टी आलाकमान को खासा नाराज कर डाला है।

खबर यह भी है कि वरुण इस मुद्दे को उठाकर भाजपा से इतर अपने लिए मार्ग तलाशने में इन दिनों जुटे हुए हैं। यही कारण है कि जे पी नड्डा ने भाजपा की पुर्नगठित राष्ट्रीय कार्यकारणी में वरुण एवं मेनका गांधी को नहीं लिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वरुण किसान आंदोलन के नाम पर खुली बगावत करते हैं या फिर समय का इंतजार।

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