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भारतीय राजनीति में वंशवाद की बात अक्सर होती है। वंशवाद की इस राजनीति में अधिकतर दल फंसते ही जा रहे है।भारत में वंशवाद में प्रमुख कांग्रेस को माना जाता है। इसकी शुरुआत नेहरु राज से हुई जिसने अब परपंरा का रुप ले लिया है। धीरे-धीरे सभी पार्टियों में यह हावी होता चला गया। लोकसभा चुनाव 2019 में भी परिवारवाद और वंशवाद हावी रहा। अभिनेता एंव डीएमके के अध्यक्ष एम.के स्टालिन के बेटे उध्यनिधि को गत गुरुवार को पार्टी की युवा इकाई का सचिव नियुक्त किया गया है। अभी तक यह पद वेल्लाकोली के पास था,लेकिन उन्होंने कुछ दिन पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
इससे पहले डीएमके के अध्यक्ष स्टालिन के पिता एम करुणानिधि रह चुके है। उनके निधन के बाद उनके छोटे बेटे स्टालिन ने पार्टी की कमान संभाली थी। इसी प्रकार दक्षिण के एक अन्य बडे राज्य कनार्टक में भी वंशवाद चरम पर है। यहां जनता दल सेक्युलर पार्टी अपना वर्चस्व रखती है।देश के पूर्व प्रधानमंत्री एजडी देवगौेडा द्वारा1999 जुलाई में जनतादल (सेक्युलर) पार्टी की स्थापना की गई थी। देवेगौडा के राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होने के बाद पार्टी की कमान किसी अन्य वरिष्ठ नेता के बजाय उनके पुत्र एजडी कुमारस्वामी के हाथों आ गई। कुमारस्वामी वर्तमान में दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री है। अब एक कदम आगे जा देवेगौडा ने अपने पोते निखिल कुमारस्वामी को जदयू के यूथ विंग का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। एक तरफ देवेगौडा के छोटे बेटे राज्य में मुख्यमंत्री पद संभाले हुए है और वहीं कुमारस्वामी के बडे भाई रेवन्ना भी लोक निर्माण विभाग के मंत्री है।
पार्टी पूरी तरह से वंशवाद की ओर बढती नजर आ रही है। रेवन्ना के बेटे प्रज्वल वर्तमान में लोकसभा सदस्य है। ऐसी स्थिति कई पार्टियों में है जहां वंशवाद को भरपूर जगह दी गई है। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी इसका एक अन्य उदाहरण है। इस पार्टी में अधिकतर यादव परिवार के लोग ही राजनिति में सक्रिय है। वर्तमान में मुलायम सिंह के पुत्र अखिलेश पार्टी के अध्यक्ष हैं तो पत्नी डिंपल पूर्व सांसद व कई अन्य रिश्तेदार पार्टी के महत्वपूर्ण पदों में काबिज हैं।

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