लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन समय- समय पर होता रहता है। कई बार इसकी वजह राजनीतिक बताई जाती है तो कई बार सत्ताधारी पार्टी के राजनीतिक लाभ लेने की नीयत पर सवाल भी उठता रहा है। इन सबके बीच कई रोचक जानकारियां सामने आती हैं। जिससे चुनावी मौसम में जाना हर किसी को उत्साहित करता है। इस बार एक ऐसे लोकसभा क्षेत्र के बारे में जानते हैं, जो कई दृष्टि से ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण है। मगर वर्तमान समय में वह ऐतिहासिक निर्वाचन क्षेत्र नहीं है। परिसीमन में वह क्षेत्र खत्म कर दिया गया है। फिर भी वह ऐतिहासिक है, जिसे आज भी याद किया जाता है।

लोकसभा की सीटों में से कभी एक बलरामपुर भी हुआ करती थी। यह सीट उत्तर प्रदेश राज्य में हुआ करती थी। जब कभी अटल बिहारी वाजपेयी के संसदीय जीवन की चर्चा होगी, बलरामपुर सीट के बिना यह अधूरी रहेगी। उत्तर प्रदेश की यह वही सीट है जहां से पहली बार जीतकर 33 वर्षीय युवा अटल बिहारी वाजपेयी संसद पहुंचे थे। बात 1957 में हुए चुनाव की है। उस चुनाव में वाजपेयी ने जनसंघ के टिकट पर उत्तर प्रदेश की तीन सीटों पर किस्मत आजमाई थी-लखनऊ, मथुरा और बलरामपुर। लखनऊ सीट से वाजपेयी दूसरे स्थान पर रहे तो मथुरा की सीट पर वे जमानत भी नहीं बचा पाए। वाजपेयी को जीत मिली तो सिर्फ बलरामपुर लोकसभा सीट पर। इस चुनाव में जनसंघ के खाते में तब की 403 में से महज चार सीटें आईं, जिनमें एक बलरामपुर की सीट थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय चाहते थे कि वाजपेयी हर हाल में जीतकर संसद पहुंचें, इसलिए उन्होंने वाजपेयी को तीन-तीन सीटों पर चुनाव लड़ाने का फैसला किया। हालांकि अगले लोकसभा चुनाव में वाजपेयी बलरामपुर सीट पर परास्त हो गए। इसके पीछे की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। दरअसल, 1957 में जब बलरामपुर सीट से दस हजार वोटों से जीतकर संसद में पहुंचे तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी उनकी भाषण क्षमता एवं भाषा शैली से प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। वाजपेयी उन्हें चुनौती की तरह जान पड़े।

1962 के लोकसभा चुनाव में नेहरू जी ने बलरामपुर लोकसभा सीट पर वाजपेयी के सामने गांधीवादी सुभद्रा जोशी को चुनाव मैदान में उतार दिया। साथ ही उस समय के बेहद लोकप्रिय फिल्म अभिनेता बलराज साहनी को उनके चुनाव प्रचार के लिए बलरामपुर भेज दिया। यह पहला मौका था जब देश में चुनाव प्रचार के लिए किसी फिल्मी चेहरे का सहारा लिया गया। आज लगभग सभी पार्टियां चुनाव प्रचार के लिए फिल्मी सितारों को मैदान में उतारती हैं। यही नहीं, आज फिल्मी सितारे सुबह किसी पार्टी को ज्वाइन करते हैं और दो घंटे बाद टिकट पा लेते हैं। इसकी शुरुआत तीसरी लोकसभा चुनाव में हुई थी। तब बलराज साहनी को टिकट तो नहीं मिला था, पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें वाजपेयी के खिलाफ चुनाव प्रचार में उतारा था।

पंडित नेहरू का पासा सटीक बैठा और वाजपेयी बलरामपुर सीट से परास्त हो गए। 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ हुए। वाजपेयी एक बार फिर बलरामपुर लोकसभा सीट से जनसंघ के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव मैदान में थे। विधानसभा की सीट पर सूरजमल गुप्ता मैदान में थे। वाजपेयी और सूरजमल गुप्ता साथ-साथ चुनाव प्रचार कर रहे थे। संघ के पुराने स्वयंसेवक आज भी याद कर करते हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान एक दिन वाजपेयी को महदेया गांव निवासी हैदर अली के घर जाने से रोकने की कोशिश हुई। उन्हें समझाया गया कि वहां ब्राह्मण मतदाताओं की अच्छी खासी आबादी है और एक मुस्लिम परिवार के यहां खाने-पीने से वोट बैंक खिसक सकता है। हैदर अली के घर से लौटते हुए हाजिर जवाब वाजपेयी ने कहा-जो खिसकना था पेट में खिसक गया, अब वोट खिसके या रहे! वाजपेयी यह चुनाव जीत गए मगर, सूरजमल गुप्ता की हार हुई। खास बात यह थी कि वाजपेयी ने इस चुनाव में पिछला हिसाब बराबर करते हुए सुभद्रा जोशी को ही शिकस्त दी।

बलरामपुर सीट की खासियत यह भी थी कि दो-दो भारत रत्न ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। यहां से वाजपेयी तो चुनाव जीते ही, संघ के नेता और प्रखर समाजसेवी नानाजी देशमुख ने भी इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। महाराष्ट्र में जन्मे नानाजी देशमुख 1977 के चुनाव में बलरामपुर सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर भारी मतों से जीतकर संसद पहुंचे थे।

मोरारजी देसाई की सरकार में उन्हें मंत्री पद की पेशकश की गई लेकिन उन्होंने यह कहकर सभी को हैरान कर दिया कि 60 वर्ष की आयु से ऊपर के लोग सरकार से बाहर रहकर समाज की सेवा करें। आज नेतागण 90 की उम्र के बाद भी चुनाव लड़ने की लालसा रखते हैं और चुनाव जीतने के बाद मंत्री पद की उम्मीद में भी रहते हैं।2004 के लोकसभा चुनाव तक बलरामपुर सीट बरकरार रही। साल 2008 में लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन हुआ। उस परिसीमन में बलरामपुर सीट को खत्म कर दिया गया। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में बलरामपुर निर्वाचन क्षेत्र नहीं था। बलरामपुर को श्रावस्ती का नाम दे दिया गया। इसमें बलरामपुर जिले की तीन और श्रावस्ती जिले की दो विधानसभा सीटें शामिल की गईं। यहां यह भी बहुत दिलचस्प है कि 2004 तक अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव मैदान में उतरे। 2009 के चुनाव में उन्होंने राजनीतिक संन्यास ले लिया। उनकी पहली लोकसभा सीट भी 2004 तक ही बरकरार रही। 2009 में वह खत्म हो गई। इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि वाजपेयी का बलरामपुर से संबंध बहुत गहरा रहा। अब न बलरामपुर सीट रही और न ही इस सीट से पहली बार संसद पहुंचने वाले वाजपेयी।

 

सितारों की तरह चमकते रहे…

 

वाजपेयी देश के एकमात्र ऐसे राजनेता रहे, जिन्होंने चार राज्यों के छह लोकसभा क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात और दिल्ली से चुनाव लड़े और जीतकर संसद पहुंचे। उत्तर प्रदेश के लखनऊ और बलरामपुर, गुजरात के गांधीनगर, मध्य प्रदेश के ग्वालियर एवं विदिशा और दिल्ली की नई दिल्ली संसदीय सीट से चुनाव जीतने वाले वाजपेयी एकलौते नेता हैं। 1996 में हवाला कांड में अपना नाम आने के कारण लालकृष्ण आडवाणी गांधीनगर से चुनाव नहीं लड़े। इस स्थिति में अटल बिहारी वाजपेयी ने लखनऊ सीट के साथ-साथ गांधीनगर से चुनाव लड़ा और दोनों ही जगहों से जीत हासिल की। इसके बाद से वाजपेयी ने लखनऊ अपनी कर्मभूमि बना ली। वाजपेयी देश के पहले नेता हैं जो गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे। वे 1952 से लेकर 2004 तक लोकसभा चुनाव लड़े। चार राज्यों के छह लोकसभा क्षेत्रों का उन्होंने पांच लोकसभा सीटों पर उन्हें हार का मुंह भी देखना पड़ा था। यह भी वाजपेयी जैसा नेता ही कर सकता है कि पांच लोकसभा सीटों पर हारने के बाद भी वे भारतीय राजनीति में न केवल कायम रहे, बल्कि सितारों की तरह चमकते हुए तीन बार प्रधानमंत्री भी बने।

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