भले ही भगवान राम के सहारे ही सही लेकिन यूपी में शिवसेना की धमक से अब इंकार नहीं किया जा सकता। वैसे भी राम मंदिर निर्माण के नाम पर यूपी की जनता भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों की वादाखिलाफी से अब पूरी तरह ऊब चुकी है। यहां तक कि जिन संतों-महंतों को राजनीति से कोई विशेष लेना-देना नहीं है उनका विश्वास भी अब भाजपा से उठ चुका है। यहां तक कि संघ के पदाधिकारी तक अब भाजपा के खिलाफ खुलकर नजर आ रहे हैं।
यूपी में शिवसेना के आगाज से जुड़ी ऐसी संभावनाएं इसलिए व्यक्त की जा रही है क्योंकि दशहरा और दीपावली के दौरान संघ के पदाधिकारियों और साधू-संतों ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को अयोध्या आने का निमंत्रण दिया है। उद्धव ठाकरे ने भी पार्टी के कुछ खास सांसदों के साथ अयोध्या आने का निमंत्रण स्वीकार कर लिया है। उद्धव ठाकरे ने भी इस सम्बन्ध में अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा अयोध्या में राम मंदिर के नाम पर सिर्फ हिन्दुओं के साथ छल करती रही है लिहाजा अब अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शिवसेना करवायेगी। उद्धव ठाकरे के बयान और अयोध्या में साधू-संतों के बीच भाजपा के विरोध को देखते हुए भाजपा के बड़े नेताओं के चेहरों पर हवाइयां साफ देखी जा रही हैं। पार्टी के बडे़ नेताओं को अब यह लगने लगा है कि यदि यूपी में शिवसेना ने दस्तक दी तो निश्चित तौर पर यूपी के हिन्दू वोट बैंक को विकल्प के रूप में शिवसेना मिल जायेगी और राम मंदिर के नाम पर वोट देने वाला हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग उससे छिटककर शिवसेना के खेमें मंे चला जायेगा जिसकी संभावना सर्वाधिक है। पार्टी नेताओं का यह भी मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो यूपी की अधिक से अधिक सीटों पर कब्जा जमाकर केन्द्र की सत्ता पर दोबारा काबिज होने का उसका ख्वाब अधूरा रह जायेगा। साफ जाहिर है कि यूपी की जनता का भाजपा से डोलता विश्वास  इस बार कोई न कोई रंग जरूर दिखायेगा।
जानकार सूत्रों की मानें तो शिवसेना ने यूपी मंे पार्टी की आगाज के लिए तैयारियां शुरु कर दी हैं। पार्टी वृहद स्तर पर यूपी में शिवसेना की जमीन बनाने के लिए कार्यकर्ताओं को जोड़ने का लक्ष्य बनाकर काम पर जुट गयी है। बूथ स्तर पर शिवसेना कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर दिया गया है। खासतौर से प्रथम चरण में अयोध्या को लिया गया है। अयोध्या में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए शिवसेना की युवा टीम जोर-शोर से जुटी है।
दूसरी ओर भाजपा इस समस्या से निपटने के लिए ‘संघम् शरणम गच्छामि’ की स्थिति में है। इस सिलसिले में पार्टी के बडे़ नेताओं की संघ प्रमुख मोहन भागवत से कई दौर की मीटिंग हो चुकी हैं। बताया जा रहा है कि मोहन भागवत ने भी शिवसेना की काट के लिए भाजपा को आश्वासन दे रखा है। यही वजह है कि इस बार आरएसएस के अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल की बैठक (31 अक्टूबर से 2 नवम्बर) में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह सहित कई बडे़ नेताओं को आमंत्रित किया गया है। यह बैठक प्रत्येक वर्ष की भांति इस बार भी मुम्बई में की जा रही है।
भाजपा के समक्ष मुश्किल इस बात की है कि इस बार अन्य विरोधी पार्टियों के साथ शिवसेना भी इस महासमर में नजर आयेगी। कयास लगाए जा रहे हैं कि यदि शिवसेना ने यूपी से अपने पैर वापस नहीं खींचे तो निश्चित तौर पर सर्वाधिक नुकसान भाजपा को होने वाला है।
दूसरी ओर लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी विरोधी पार्टी कांग्रेस भी कमर कसकर तैयार है। भाजपा मैनेजमेंट की नाकामी के चलते इस बार तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिसका लाभ उठाने के लिए विपक्ष ने पूरी तैयारी कर रखी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश और बिहार से मजदूरों संग मारपीट से जन्मा ताजा मुद्दा सरकार की गले की फांस बना हुआ है। कांग्रेस ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लिया है और इस मुद्दे को प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर की अगुवाई में कैश कराने की तैयारी भी कांग्रेसी कर चुके हैं।
कांग्रेस के प्रदेश स्तरीय नेताओं की मानें तो इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस के कई ऐसे बडे़ नेताओं के नेपथ्य से बाहर आने की संभावना है जो कई वर्षों से निष्क्रिय बने हुए थे। जाहिर है यदि कांग्रेस के बड़े नेता नेपथ्य से बाहर आए तो निश्चित तौर पर प्रदेश कांग्रेस को संजीवनी मिलेगी।
फिलहाल इस बार के महासमर में जहां एक ओर भाजपा की मुश्किलें शिवसेना के यूपी में दस्तक देनेे के बाद से काफी बढ़ गयी हैं वहीं दूसरी ओर भाजपा की प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी अपने पुराने दिग्गजों के सहारे मैदान में है। जाहिर तौर पर इस बार का लोकसभा चुनाव बेहद रोचकतापूर्ण होगा।

You may also like