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वैसे तो देश के आम चुनाव हमेशा से आम जनता से लेकर राजनीतिक दलों और पार्टी से जुडे़ कार्यकर्ताओं के बीच गहमा-गहमी पैदा करते रहे हैं लेकिन इस बार खासतौर से यूपी की 80 लोकसभा सीटों के लिए जिस प्रकार की जोर-आजमाइश हो रही है उसका नजारा देखना हो तो कुछ दिन गुजारिए यूपी में। जी हां! स्थिति कुछ ऐसी ही है। दावा है कि यूपी की 80 लोकसभा सीटों को लेकर जो मारामारी हो रही है उतनी मारामारी शायद किसी और राज्य में नहीं हो रही होगी। दावा यह भी है कि इससे पहले के चुनावों में भी इस तरह की मारामारी नजर नहीं आयी होगी। इसके कारण भी बहुतेरे हैं। किसी को अपनी प्रतिष्ठा बरकरार रखनी है तो किसी को अपनी राजनीतिक हैसियत का परिचय इस चुनाव के माध्यम से करवाना है। कोई इस चुनाव में खाता खोलने भर के लिए जी-जान से जुटा है तो कोई सिर्फ वोट कटवा की नीति लेकर मैदान में है। इस बार सर्वाधिक नजरें उन दलों के नेताओं व सांसदों पर भी होंगी जिन्होंने या तो टिकट न मिलने की वजह से अपनी आस्था और नीति बदलने में तनिक देरी नहीं की है बल्कि कुछ ऐसे भी हैं जो पार्टी की नीतियों से इस कदर खफा हैं कि वे अपनी उस पार्टी को ही समूल नष्ट करने की धमकियां दे रहे हैं जिनकी हैसियत पार्टी के सहारे ही अब तक टिकी रही है जबकि यूपी की राजनीति का इतिहास गवाह है कि जिस किसी विधायक अथवा सांसद अपनी मूल पार्टी छोड़कर इधर-उधर भागा है उसका हश्र धोबी के कुत्ते सरीखा रहा है जो न घर का रह पाता है और न ही घाट का।
इस बार दलबदलू नेताओं की भी खूब भरमार है तो दूसरी ओर इस बार के चुनाव में कुछ ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हुई जिनसे दो कट्टर दुश्मनों को मन मारकर एक मंच पर आना पड़ा। जहां एक ओर पारिवारिक रिश्ते तार-तार हुए तो दूसरी ओर मौकापरस्ती ने भी खूब करतब दिखाए।
शुरुआत करते हैं मौकापरस्ती वाले सपा-बसपा गठबन्धन की। जैसा कि सभी जानते हैं कि इस गठबन्धन में विश्वास की मात्रा चुटकी भर है और ऐन वक्त पर धोखाधड़ी वाला मसाला भरपूर। आधुनिक विचार वाले अखिलेश यादव वाली सपा पर भले ही एकबारगी विश्वास किया जा सकता हो राजनीति के खेल की कुशल खिलाड़ी माया की बसपा पर विश्वास करना गर्म तवे पर हाथ रखने जैसा है जिसमें हाथ जलना ही जलना है। इस बात से शायद अखिलेश यादव भले ही पूरी तरह से वाकिफ न हों लेकिन उनके खासमखास सिपहसालार इस बात से बखूबी परिचित हैं। शायद उन्होंने अखिलेश को अवगत भी कराया होगा और अखिलेश ने उसी आधार पर गठबन्धन के लिए हामी भी भरी होगी। यदि ऐसा है, जिसकी संभावना सर्वाधिक है तो यह कहने में कतई गुरेज नहीं है कि सपा-बसपा गठबन्धन अविश्वास की डोर से बंधा हुआ है, जरा सा झटका भी सहन करने की क्षमता इस डोर में नहीं है। सपा में धृतराष्ट्र की पदवी वाले मुलायम सिंह यादव इस उम्र में भी राजनीति के दांव-पेंच बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। यदि वे दांव-पेंच में माहिर न होते तो सपा की बागडोर आज अखिलेश के पास नहीं बल्कि पार्टी के लिए जान लगा देने वाले शिवपाल के पास होती और शायद इसी बात का दुख शिवपाल को है जिसने उन्हें प्रगतिशील समाज पार्टी बनाकर सपा को ही चुनौती देने के लिए मजबूर कर दिया। इस चुनावी महाभारत जहां पग-पग पर धोखा है वहां शिवपाल अकेले हैं और हतोत्साहित भी लेकिन उसका असर उनके चेहरे पर नजर नहीं आता, यही खूबी है राजनीति के दिग्गज नेता शिवपाल की। हालांकि शिवपाल यादव ने शुरुआती दौर में अलग पार्टी बनाए जाने के बावजूद सपा-बसपा गठबन्धन में शामिल होने के लिए चारा डाला था लेकिन बसपा प्रमुख मायावती के प्रबल विरोध के चलते अखिलेश यादव को अपने कदम वापस खींचने पडे़। इस बात का दर्द वे कई बार प्रेस वार्ता के दौरान भी उजागर कर चुके हैं। खैर, अभी हम यहां बात कर रहे हैं सपा-बसपा गठबन्धन की सफलता और असफलता की। यूपी की 80 लोकसभा सीटों के लिए दो परस्पर विरोधी दलों ने भले ही गठबन्धन करके भाजपा के समक्ष चुनौती पेश की हो लेकिन इस चुनौती में इतना दम नहीं है कि वह भाजपा के प्रवाह को थाम सके। ऐसा इसलिए नहीं कि सूबे में अभी भी भाजपा की लहर चल रही है, सच तो यह है कि भाजपा का विरोध यूपी में चरम पर है लेकिन आपस में ही वोट बंटवारे की वजह से भाजपा की स्थिति मजबूत नजर आ रही है। भले ही वह अपने पिछले रिकाॅर्ड (71 सीटें) की बराबरी न कर सके और इस बार 74 पार के नारे को भी पूरा न कर सके लेकिन भाजपा की स्थिति ऐसी नहीं होगी कि उसे किसी प्रकार का आश्चर्य हो। राजनीति पर कलम चलाने वाले दिग्गज पत्रकारों से लेकर राजनीतिक विश्लेषक भी यही मानते हैं कि इस बार भाजपा को यूपी से उतनी सफलता की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए जैसी कि विगत लोकसभा चुनाव में उन्हें अप्रत्याशित रूप से प्राप्त हुई थी। यूपी की राजनीति इस बात की गवाह है कि यूपी की जनता दोबारा जल्दी मौका किसी को नहीं देती। नब्बे के दशक में राम मन्दिर आन्दोलन के सहारे सत्ता तक पहुंची भाजपा से उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं तो यूपी की जनता ने भाजपा को लगभग दो दशक तक सत्ता से बाहर रखा। इस बार भी कुछ ऐसी ही स्थिति नजर आ रही है। भाजपा की जो सीटें कम होंगी वे सीटें सपा-बसपा गठबन्धन के अलावा कांग्रेस के बीच बट जानी तय है। यदि कांग्रेस भी गठबन्धन में साथ होती और शिवपाल यादव ने अलग दल बनाकर अपने प्रत्याशी मैदान में न उतारे होते तो शायद परिणाम कुछ और ही आने की उम्मीद होती लेकिन आपस में सिर-फुटौव्वल के चलते गठबन्धन की नींव कमजोर है। यूपी की कई लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां सपा और बसपा के खिलाफ शिवपाल ने भी अपने प्रत्याशी उतार रखे हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि शिवपाल की राजनीतिक हैसियत अखिलेश से कहीं अधिक है लेकिन यूपी की जनता में एक और खास बात है वह प्रत्याशी को देखकर वोट नहीं करती वह पार्टी देखकर ही वोट करती है। ऐसे में शिवपाल गठबन्धन को नुकसान तो पहंुचायेंगे लेकिन अपनी पार्टी को अपने अलावा एक भी सीट जिता पाना उनके लिए आसान नहीं होगा। विशेषतौर पर उनकी अपनी ही सीट विजय हासिल करने में उन्हें पसीने छूट जायेंगे क्योंकि इस बार उनके भाई मुलायम भी उनके पक्ष में प्रचार करने नहीं आयेंगे। वैसे तो अखिलेश यादव ने अपने पिता और राजनैतिक गुरु मुलायम सिंह यादव को एक बार फिर से मैनपुरी से मैदान में उतारा है और यह सीट मुलायम जीत भी जायेंगे, इसमें दो राय नहीं लेकिन बात यदि मुलायम के मन की करें तो वे बसपा के साथ गठबन्धन से खुश नहीं हैं। मुलायम को चिंता इस बात की है कि आधे से अधिक सीट बसपा को देकर पहले ही ऐतिहासिक जीत का मौका गंवा चुके हैं शेष सीटों पर सपा के विभीषण इतिहास नहीं रचने देंगे। मुलायम को चिंता इस बात की भी है कि वे अब राजनीति के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके हैं और शायद यह उनका आखिरी मौका भी था अपनी छिपी हुई इच्छाओं को सामने लाने का जिसे उनके पुत्र अखिलेश यादव की हठधर्मिता के चलते मारना पड़ गया। मुलायम उदास हैं लेकिन पार्टी और पुत्रमोह ने उन्हें जकड़ रखा है। वे पार्टी में चाहकर भी विरोध करने की हैसियत नहीं रखते हैं। उनके बेटे अखिलेश ने उन्हें उनकी मनचाही सीट मैनपुरी से टिकट दे दिया, शायद यही सबसे बड़ा उपहार मान रहे होंगे मुलायम।
देखा जाए तो इस बार का मुकाबला भाजपा-कांग्रेस और गठबन्धन के बीच होना है। वैसे भी इन दलों के अतिरिक्त कोई ऐसा दल नजर नहीं आता जिसके बारे में दावा किया जा सके कि वह मुकाबले की मुख्य धारा में है। जहां तक सपा-बसपा गठबन्धन के हौसलों की बात है तो इस गठबन्धन के हौसले गोरखपुर, फूलपुर और कैराना उप चुनाव सीट पर फतह हासिल करने के साथ ही 56 इंच के हौसलों को भी काफी पीछे छोड़ चुके हैं। गठबन्धन के नेताओं का, यहां तक कि अखिलेश यादव और मायावती का दावा है कि गठबन्धन इस बार यूपी में 50 का आंकड़ा पार कर जायेगा। वैसे तो यह आंकड़ा गठबन्धन नेताओं की सोंच से मेल नहीं खाता लेकिन यह आंकड़ा इतना जरूर बताता है कि गठबन्धन के हौसलों में कितना दम है।
लगभग ढाई दशक बाद लोकसभा चुनाव में सपा के साथ खड़ी बसपा के लिए यह चुनाव काफी अहम है। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीटें नहीं मिल पायी थीं, हालांकि बसपा का वोट प्रतिशत कम नहीं हुआ था लिहाजा आंकलन लगाना कठिन नहीं होगा कि बसपा को जो परम्परागत वोट बैंक है वह अपनी स्थान पर बना हुआ है। यदि इस बार बसपा की चुनावी रणनीति रंग दिखा गयी तो निश्चित तौर पर यूपी की 80 लोकसभा सीटों पर बसपा को टक्कर देना भाजपा के लिए भी आसान नहीं होगा। बसपा इस बार भी सोशल इंजीनियरिंग को लेकर ही चुनाव मैदान में है। वैसे भी यूपी में जातीय समीकरण बहुत मायने रखता है। बसपा दलितों की हितैषी है तो दूसरी ओर सपा मुस्लिम और पिछड़ों की राजनीति करती आयी है। गठबन्धन नेताओं ने बाकायदा गणना कर रखी है। गठबन्धन लगता है कि सपा और बसपा के मिल जाने से दलित और मुसलमान एक छत के नीचे आ जायेगा। यदि ऐसा हुआ तो निश्चित तौर पर इस गठबन्धन को भाजपा छू तक नहीं पायेगी लेकिन इसकी संभावना काफी कम है। चुनाव प्रचार के दौरान ही कई लोकसभा क्षेत्रों में स्थिति यह आयी कि बसपा के लोग सपा प्रत्याशी को समर्थन देने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ हैं भी तो उनमें वह जोश नहीं है जो उनके अपने प्रत्याशियों के लिए रहता है। यही हाल सपा समर्थकों का है। गठबन्धन की गरिमा को बचाए रखने के लिए सपा कार्यकर्ता बसपा कार्यकर्ता और प्रत्याशियों के साथ गली-मोहल्लों में घूम तो रहे हैं लेकिन वह जोश नजर नहीं आ रहा। ऐसी स्थिति में यदि यह कहा जाए कि भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए सपा-बसपा ने जो गठबन्धन किया है उसकी सफलता अभी कोसों दूर है।
यूपी में कांग्रेस की स्थिति पिछले कुछ चुनावों की अपेक्षा काफी सुधरी है और यह सुधार प्रियंका गांधी के राजनीति की मुख्य धारा में उतरने से आया है। प्रियंका गांधी को राजनीति में लाने के लिए कांग्रेसी काफी समय से बेचैन थे। सैकड़ों बार पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के समक्ष गुहार भी लगा चुके थे प्रदेश कांग्रेसी लेकिन उनकी इच्छा अब जाकर पूरी हुई है। प्रियंका गांधी का रोड शो भी इस बात का प्रतीक था कि यूपी की जनता प्रियंका को कितना चाहती है लेकिन यूपी की जनता की चाहत वोट में कितनी तब्दील होती है वह तो तब पता चलेगा जब ईवीएम में पडे़ वोटों की गणना होती लेकिन मौजूदा स्थिति की बात करें तो यूपी में कांग्रेस की वह स्थिति नजर नहीं आ रही है जिसकी उम्मीद यूपी कांग्रेस को थी। शुरुआती दौर का वह जोश अब कहीं नजर नहीं आता। वैसे तो प्रियंका के नेतृत्व में चुनाव रणनीति में काफी बदलाव किया गया है और उसने काफी समय बाद किसी से गठबन्धन किए बगैर ही अकेले दम पर चुनाव मैदान में उतरने की ठानी है जिससे उन कांग्रेसी नेताओं की बांछे खिली हुई हैं जो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने का सपना वर्षों से संजोए हुए थे। इसके अतिरिक्त कांग्रेस में बगावती तेवर वाले पदाधिकारियों से लेकर नेताओं की भी कमी नहीं है। ऐसे लोग भले ही कांग्रेस को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचा पाने की क्षमता न रखते हों लेकिन विरोध करके कांग्रेस विरोधी दलों को कींचड़ उछालने का मौका जरूर दे रहे हैं। इन सब अव्यवस्थाओं के बीच कांग्रेस के प्रत्याशी चुनावी जंग में कितना सफल होते हैं यह यूपी की जनता के हाथों में है। अब देखना यह है कि यूपी की जनता एक बार फिर से कांग्रेस पर विश्वास करती है या फिर उसे डिवाइड एंड रूल वाली पार्टियां ज्यादा पसंद हैं।
रही बात भाजपा की तो उसके कार्यकर्ता से लेकर प्रत्याशी तक पूरे जोश में हैं। भाजपा नेताओं में यह जोश विकास कार्यों को लेकर नहीं बल्कि डिवाइड एंड रूल पाॅलिसी की सफलता को लेकर है। हो सकता है कि यह अतिश्योक्ति हो लेकिन इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा की उपलब्धियों में डिवाइड एंड रूल की पाॅलिसी सबसे अधिक सफल रही है। भले ही यूपी का कुछ मुसलमान भाजपा के कार्यों की सराहना कर रहा हो लेकिन सच तो यही है कि यूपी का मुसलमान भाजपा को कभी वोट नहीं देगा। मुस्लिम वर्ग के बीच हो रही चर्चाएं इस बात का पर्याप्त प्रमाण हैं कि वह भाजपा के कार्यकाल में स्वयं को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा। रहा बात तीन तलाक को लेकर मुस्लिम परिवारों के बीच ही मतभेद करने की तो भाजपा भले ही इसके लिए कानून बनवाने में सफल रही हो लेकिन इसका पालन अभी भी नहीं किया जा रहा। अभी भी उन्हें मुस्लिम कानून पर ज्यादा भरोसा है। कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा का यह तीर भी अफसल रहा है।
दलबदलू और विभीषणों की फौज भाजपा में भी है। कुछ तो ऐसे हैं जो पूरे पांच वर्ष तक भाजपा में रहते हुए भी भाजपा नेताओं को कोसते रहे हैं। इनमें से कुछ को पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है तो कुछ टिकट न मिल पाने की वजह से विभीषण की भूमिका में आ गए हैं। जाहिर है कि जिन स्थानों पर पूर्व में जीते हुए प्रत्याशियों को टिकट नहंी दिया गया है उन स्थानों पर भाजपा को अपनी जीत सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा।
ये तो रहे यूपी की राजनीति के प्रमुख दल जो तमाम तरह के दावे कर रहे हैं और उनके दावों पर चर्चा भी हो रही है लेकिन इस बार यूपी का मुसलमान मझधार में है, वह अभी तक यह तय नहीं कर पाया है कि आखिरकार उसे किस दल के साथ जाना है। मुसलमानों के भीतर जोश पैदा करने वाले मुल्ला-मौलवी और कुछ चर्चित नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि यदि मुसलमानों को राजनीति में अपनी हैसियत बनानी है तो वह या तो मुस्लिम प्रत्याशियों को वोट दे या फिर मुस्लिम पार्टी को। मुश्किल इस बात की है कि यूपी में भाजपा ने तो मुस्लिम नेताओं से लगभग किनारा कर रखा है। खबर लिखे जाने तक किसी को भी टिकट नहीं दिया गया है। स्पष्ट है कि भाजपा इस बात से पूरी तरह से वाकिफ है कि मुस्लिम भले ही भाजपा में आस्था जताने की बात कर रहा हो लेकिन वह वोट उसे नहंी देगा। खैर, मुस्लिमों के बीच समस्या इस बात की है कि आखिरकार वह किसी मुस्लिम दल के प्रत्याशी को वोट दें क्योंकि अभी तक किसी भी मुस्लिम सियासी पार्टी की तरफ से किसी ने भी नामांकन नहीं किया है। इन परिस्थितियों के अनुसार यदि यह कहा जाए कि यूपी का मुसलमान एक बार फिर से राजनीतिक दलों के लिए खिलौना मात्र बन चुका है तो शायद गलत नहीं होगा। हालांकि सपा और बसपा ने चारा डाला जरूर है लेकिन यह चारा पर्याप्त नहीं है। मुसलमानों को नब्बे के दशक जैसा मुलायम राज वाला चारा चाहिए जिसकी संभावना कम ही है।
फिलहाल लोकसभा चुनाव को लेकर यूपी की मौजूदा स्थिति यह है कि ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है। संघर्ष त्रिकोंणीय (भाजपा-कांग्रेस और गठबन्धन) होने की संभावना है। शंका और आशंका भी बनी हुई है। आशंका इस बात की भी है कि वह कौन सा दल होगा जो परिणाम आने के बाद सीटों के आधार पर कांग्रेस और भाजपा के साथ ब्लैकमेलिंग वाली स्थिति में होगा। कुछ भी हो इस बार के चुनाव परिणाम नए-पुराने राजनीतिक दलों की हैसियत जरूर बता देंगे।

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