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यूपी के फिर होंगे टुकडे़!

तो क्या यूपी के टुकड़े फिर से होंगे! यूपी अब यूपी नहीं किसी और नाम से जाना जायेगा? ये बातें चैंकाने वाली अवश्य हो सकती हं लेकिन सच यही है। उत्तराखण्ड के बाद एक बार फिर से यूपी के बंटवारे को लेकर आवाज उठने लगी है। इस बार ये आवाज पूर्वी उत्तर प्रदेश के 37 जनपदों को अलग करके ‘अवध राज्य’ का गठन किए जाने के रूप में उठी है। आवाज उठाने वाला संगठन है ‘अवध राज्य आंदोलन समिति’।
संगठन के अध्यक्ष रविन्द्र का मानना है कि यदि यूपी के जनपदों का विकास करना है कि यूपी को दो भागों में बांटा जाना चाहिए। बताते चलें कि ये संगठन पिछले पांच वर्षों से अवध राज्य की स्थापना किए जाने की मांग करता चला आ रहा है। ज्ञात हो तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने भी वर्ष 2011 में यूपी को दो भागों में बांटे जाने पर सहमति दर्ज की थी। उन्हीं के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश विधानमंडल ने उत्तर प्रदेश के पुनर्गठन का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किया था। बंटवारे की पक्षधर सिर्फ बसपा ही नहीं बल्कि कांग्रेस और भाजपा के कुछ नेता भी हैं जो ये मानते हैं कि यूपी को दो भागों में विभाजित करके जनपदों का विकास अच्छे ढंग से किया जा सकता है।
बताते चलें कि नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट में भी ये माना गया है कि स्वास्थ्य, शिक्षा और स्वच्छता के मामले में उत्तर प्रदेश निचले पायदान पर है। इसका प्रमुख कारण है अनियंत्रित जनसंख्या। जनसंख्या बढ़ोत्तरी की वजह से मांग और आपूर्ति के बीच असंतुलन की वजह से पूरे प्रदेश में अराजकता जैसा माहौल बन चुका है।
संगठन का मानना है कि पूर्व से लेकर पश्चिम तक लगभग एक हजार किलोमीटर के दायरे में फैला यह प्रदेश प्रशासनिक दृष्टिकोंण से अव्यवहारिक हो चुका है, लिहाजा समस्या का हल इसके बंटवारे में ही नजर आता है।
संगठन का मानना है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के 37 जिलों और पश्चिम उत्तर प्रदेश के 38 जिलों को अलग करके दो राज्यों का गठन कर दिया जाना चाहिए। दो राज्य बनने से केन्द्र सरकार पर आर्थिक बोझ तो कम पडे़गा ही साथ ही विकास भी ठीक ढंग से किया जा सकेगा।
वैसे देखा जाए तो संगठन की मांग व्यवहारिक दृष्टिकोंण से काफी हद तक सही है लेकिन संगठन की ये मांग कितनी कारगर साबित होती है, ये देखने वाला होगा।

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