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चौराहे पर लुटता चीर
प्यादे से पिट गया वजीर
चलूं आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊं?
राह कौन सी जाऊं मैं?
 
दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूं या निधि शेष लुटाऊं मैं?
राह कौन सी जाऊं मैं?
-अटल बिहारी वाजपेयी
खबर आई कि अटल बिहारी वाजपेयी की मौत हो गई। यह भी कहा गया अटल का अंत हो ही नहीं सकता। और भी बहुत सी अतिरेक और भावुकतापूर्ण बातें जो किसी बड़े आदमी के निधन पर की जाती है। जो हमारी संवेदनशीलता भी है, उससे ज्यादा परंपरा। कहा भी जा रहा है कि यह अतिरेक और पोस्ट वर्ल्ड ट्रूथ का समय है और अधिक आधुनिक शब्दावली के आसरे बात को कहें तो न्यू नॉर्मल का दौर। अब हमें कोई भी खबरें कुछ भी चीजें भीतर तक उद्वेलित नहीं करतीं, चौंकाती नहीं।
बात अटल की। तो आज यह कि अटल मौत से पहले ही मौत के शिकार हो गए। लगभग सात साल पहले। पिछले सात सालों में वह स्मृतियों-चेतना से जुदा एक जिंदा लाश की तरह रहे जो देख-सुन और सांसें ले सकती थी। अब जबकि अटल की काया का अंत हो चुका है लोग-बाग उनकी लोकप्रियता शोक और भावुकता के जबर्दस्त जकड़न में हैं। यह जकड़न हमें सम्यक-तटस्थ बातें कहने से रोकती है। लेकिन अगर वाजपेयी जी के जीवन से ही सूत्र लें तो विरोध का जोखिम लेकर भी व्यक्ति को सच बयान करना चाहिए। वे खुद भी यही करते रहे। पार्टी-संघ के भीतर और बाहर भी।
भवभूति ने अपने नाकट ‘उत्तर रामायण’ में लिखा है कि राजा को लोकप्रिय होना चाहिए। अटल बिहारी वाजपेयी लोकप्रिय थे। लोकप्रियता और उनकी उदारता ने ही उनको राजा के सिहांसन तक पहुंचाया। अगर वह लोकप्रिय-उदार नहीं होते तो वह कभी भी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। सबको इस बात का पता है कि दो सांसदों से सत्ता तक भाजपा को ले जाने में रणनीतिक और सांगठिनक रूप से आडवाणी की मेहनत तथा कौशल ज्यादा है। एक मोड़ पर जब आडवाणी को लग गया कि अब भाजपा संसद में खुद की बदौलत बहुमत हासिल नहीं कर सकती तो वह आडवाणी ही थे जिन्होंने गठबंधन की राजनीति राह पकड़ी। चूंकि आडवाणी की छवि एक कट्टर हिंदूवादी नेता की थी। ऐसे में सेक्युलर पार्टियां भाजपा के साथ आने को तैयार नहीं थी। इसलिए मजबूरी में आडवाणी ने वाजपेयी को आगे किया। गोविंदाचार्य के इस बात पर कई लोगों ने यकीन किया कि ‘वाजपेयी तो पार्टी के मुखौटा हैं।’
इसमें कोई दो राय नहीं कि वाजपेयी भारतीय राजनीति के शायद अंतिम उदारवादी और लोकप्रिय राजनेता थे। उन्हें आजातशत्रु की उपाधि भी दी जाती है। उनके उदारवादी पर कुछ लोगों को पहले भी ऐतराज था। लोकप्रियता का अपना एक मूल्य होता है और राजनीति में या विचारधारा के मामले में अजातशत्रु होना कोई बहुत अच्छी बात नहीं मानी जाती। जैसे लोकप्रियता को भी अगर वह मानवीय और मूल्यपरक नहीं है तो उसे बहुत अच्छा नहीं माना जाता।
अब जब अटल नहीं हैं जब हम उनके प्रति शोक से बाहर होंगे। काल का पहिया थोड़ा और घूमेगा तो अपनी कुछ खास बातों के लिए वे गाहे-बगाहे याद कर लिए जाएंगे। मसलन वह बहुत अच्छे वक्ता थे। विद्वान थे, अपनी लोकप्रियता को खतरे में डालकर सच बोलते थे, वियोंड द पार्टी जाकर भी अपने मन की बात कहने का उनमें साहस था। तमाम नैतिकताओं-परंपराओं और मर्यादाओं के बीच भी वे अपने ढंग से जीने के कुछ ‘पल’ और ढंग चुरा लेते थे। उनकी इस चोरी के बारे में जानते तो सब थे, न कोई पकड़ता या न ही कोई कहता था। सरगोशियों की बातें अलग हैं।
राजनीति में सौ फीसदी ईमानदारी चलती नहीं, वाजपेयी जी बहुत कम बेईमान थे, खासकर विचारों-सिद्धांतों को लेकर। मसलन गुजरात दंगों के बाद गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को बर्खास्त करने का मन बना लिया था, मगर आडवाणी के मना करने पर ‘राजधर्म’ निभाने का उपदेश देकर बाद में गुजरात दंगें को डिफेंड किया।
वाजपेयी जी के समर्थन पर ज्यादा मतभेद की गुंजाइश नहीं है। लेकिन उनकी सीमाओं पर बातें कम होती हैं। तमाम लोकप्रियता, उदारवादी सोच, भाषणों की जादूगरी के बावजूद वाजपेयी ने नेहरू, लोहिया की तरह कोई राजनीतिक चिंतन दर्शन नहीं दिया। उनका कोई राजनीतिक चिंतन भी नहीं है। इसी आधार पर कहा जा सकता है कि जब गांधी-लोहिया को लोगों ने बिसार दिया जिनका मुकम्मल राजनीतिक चिंतन दर्शन है, फिर उसमें वाजपेयी की थोड़ी कम बिसात है।
अटल बिहारी वाजपेयी का एक पहलू उनका कवि रूप भी है। उनके प्रशंसकों में एक बड़ा तबका उन्हें बड़ा कवि भी मानता है। उन्होंने कई अच्छी कविताएं भी लिखी। उनकी पुस्तक ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ बहुत चर्चित भी है। उनकी कविताओं की पांडुलिपि राजकमल प्रकाशन के पूर्व मालकिन शीला संधू के पास भेजी गई थी। कविताओं को देखने-परखने के बाद उन्होंने पुस्तक छापने से इंकार करते हुए वह पांडुलिपि लौटा दी थी। हिंदी के आलोचक अटलजी की कविताओं को साहित्य के निकष पर ऊंचा दर्जा नहीं देते। उनकी कविताओं का शिल्प पुराना है और भावावेश की जगह अतिशय, भावुकता की प्रधानता है। बेशक वे कवि हृदय हैं, उनकी कविताओं में बात भी गहरी और सरोकार की है, लेकिन कहने के ढंग के मामले में उन्होंने पुराने शिल्प को ही चुना है।
अटल की अंत्योष्टि के बाद अब उनकी लोकप्रियता को राजनीतिक रंग देने की भी खबरें आ रही हैं। कुछ ही महीने बाद तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव हैं। उसके कुछ ही महीने बाद लोकसभा चुनाव। आ रही खबरों के मुताबिक भाजपा की कोशिश वाजपेयी जी की लोकप्रियता और उनके निधन से उपजी भावुकता का चुनावी लाभ लेने की है। उनके अस्थि कलश की यात्रा इसकी नजीर है। खास बात यह कि अटल की मौत की खबर उनके हनुमान कहे जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह को नहीं दी गई है। वे गंभीर रूप से बीमार हैं। महीनों से वे कोमा में हैं। अटल की तरह ही भारतीय राजनीति के एक और लोकप्रिय नेता जॉर्ज फर्नांडीस भी सालों से मौत के पहले ‘मरण’ को झेलते हुए गुमनामी में जीने को अभिशप्त हैं।

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