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संयुक्त राष्ट्र : बाल शोषण की लिस्ट से बाहर हुआ भारत

संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर वर्ष बाल शोषण के मामलों की एक लिस्ट (चिल्ड्रन एंड आर्म कनफ्लिक्ट) की जाती है। जिसमें साल 2010 से लगातार भारत का नाम भी शामिल किया जा रहा था। जो इस साल पूरे 12 वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की इस लिस्ट से बाहर हो गया है। इस रिपोर्ट में इतने सालों से भारत का नाम शामिल होने का प्रमुख कारण जम्मू-कश्मीर में हथियारबंद समूहों में नाबालिगों की भर्ती और सेना द्वारा उनकी हिरासत, गैर कानूनी गतिविधियों में संलिप्तता आदि थी।

संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कहना है कि साल 2023 की बाल शोषण की रिपोर्ट में से भारत का नाम हटा दिया गया है, क्योंकि भारत  सरकार ने बच्चों की सुरक्षा के लिए कई सार्थक कदम उठाए हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र के सेक्रेटरी जनरल का कहना है कि इससे पहले की रिपोर्ट में हमने भारत सरकार और उनके विशेष प्रतिनिधि के काम की तारीफ की थी कि वे बाल शोषण के मामलों पर गंभीरता से ध्यान दे रहे हैं और यह पिछले कई समय से संयुक्त राष्ट्र से निरंतर संपर्क में हैं। यह इसी का परिणाम है कि भारत का नाम इस सूची से हटाया जा रहा है। यूएन के मंत्रालय सचिव इंदीवर पांडेय ने कहा है कि सुरक्षाबलों को भी बाल सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। साथ ही अब भारत में जेजे एक्ट और पॉक्सो एक्ट को सही तरीके से लागू किया जा रहा है।

 

बच्चों की सुरक्षा के लिए भारत सरकार की योजना

 

क्या है पॉक्सो एक्ट:

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो एक्ट) बाल यौन शोषण के मामलों को रोकने के लिए साल 2012 में लागू किया गया था। इस कानून के तहत 18 साल से कम उम्र के नाबालिग बच्चों के साथ होने वाले यौन उत्पीड़न, यौन शोषण और पोर्नोग्राफी जैसे यौन अपराध और छेड़छाड़ के मामलों को संरक्षित करने का प्रयास किया जाता है। फिर चाहे पीड़ित लड़की हो या लड़का। इस कानून के अंतर्गत अलग- अलग अपराध के लिए अलग-अलग सजा निर्धारित की गई है। जैसे अगर कोई व्यक्ति किसी बच्चे को पोर्नोग्राफी दिखाता है या उसके सामने कोई सेक्सुअल हरकतें करता है तो उसे 3 साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक की सजा हो सकती है। इस प्रकार के मामलों के लिए एक विशेष प्रकार का न्यायालय होता है जिसमें बच्चे के साथ उसके माता-पिता या जिन पर बच्चा सबसे ज्यादा भरोसा करता हो वे लोग मौजूद होते हैं और इस प्रकार के मामले की पूरी सुनवाई एक कैमरे के सामने की जाती है। यह अधिनियम पूरे भारत पर लागू होता है, पॉक्सो कानून के तहत सभी अपराधों की सुनवाई, एक विशेष न्यायालय द्वारा कैमरे के सामने बच्चे के माता-पिता या जिन लोगों पर बच्चा भरोसा करता है, उनकी उपस्थिति में होती है।

जुवेनाइल जस्टिस एक्ट  :

भारतीय परिवारों में माता- पिता द्वारा बच्चे को मारा जाना एक आम बात मानी जाती है, लेकिन कई बार अभिभावक बचे को इतना मार देते हैं कि वह बच्चे के लिए घातक माना जाता है। अभिभावकों द्वारा की जाने वाली ऐसी ही हिंसाओं को रोकने और बच्चों की सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट ( जेजे एक्ट) लागू किया गया। हालांकि, इस तरह के मामले आमतौर पर पुलिस तक बहुत कम ही पहुँच पाते हैं।ऑल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट व जाने माने वकील अशोक अग्रवाल के मुताबिक बच्चों के साथ अगर पैरेंट्स खुद मारपीट करते हैं तो उनके खिलाफ न सिर्फ आईपीसी की धाराओं के तहत बल्कि जेजे एक्ट के तहत भी केस बनेगा। जेजे एक्ट में 18 साल के कम उम्र के बच्चे को बच्चा ही माना गया है। दिल्ली हाई कोर्ट के एडवोकेट भुवन ऋभु बताते हैं कि जेजे एक्ट की धारा-75 के मुताबिक अगर किसी बच्चे के साथ मारपीट होती है, गाली गलौज होता है या फिर उसे एक्सपोज किया जाता है या फिर उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। तो ऐसी स्थिति में जेजे एक्ट की धारा-75 के तहत केस दर्ज किया जा सकता है और इस मामले में दोषी पाए जाने पर तीन साल तक कैद या एक लाख रुपये जुर्माना या दोनों हो सकता है।

 

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