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उमर अब्दुल्ला के लेख से दो खेमों में बंटी पार्टी, रुहुल्ला मेहदी ने दिया इस्तीफा 

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने एक राष्ट्रीय दैनिक अखबार में आर्टिकल लिखा था। जिसमें उन्होंने कहा था कि जब तक जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक वह विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। लेकिन अब उनके लिखे  गए आर्टिकल पर विवाद शुरू हो गया है। यहाँ तक की उनकी पार्टी दो हिस्सों में बंट गई है। जिसके कारण जम्मू-कश्मीर को वापस राज्य का दर्जा देने की मांग  पर उमर अब्दुल्ला पीछे हट गए हैं।
उमर अब्दुल्ला ने मंगलवार 28 जुलाई  को ट्वीट कर कहा, “मैंने सिर्फ इतना कहा था कि जम्मू-कश्मीर राज्य का सीएम होने के तौर पर मैं केंद्र शासित राज्य जम्मू-कश्मीर के लिए विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा। सिर्फ इतना ही कहा था, इससे न कम न ज्यादा। बाहर के लोग हल्ला मचा रहे हैं कि मैं जम्मू-कश्मीर को राज्य बनाने की मांग कर रहा हूं।
रुहुल्ला मेहदी ने मुख्य प्रवक्ता पद से इस्तीफा दिया
बता दें उमर अब्दुल्ला की यह सफाई भी तब आई है जब नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता रुहुल्ला मेहदी ने पार्टी के मुख्य प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया। रुहुल्ला मेहदी एक प्रभावशाली शिया नेता माने जाते हैं। उनका मध्य कश्मीर के बडगाम में बड़ा प्रभाव रहा है। रुहुल्ला ने इस्तीफा देने के बाद इस बात की जानकारी ट्विटर पर दी। उन्होंने ट्वीट कर लिखा, “मैंने जम्मू-कश्मीर नैशनल कॉन्फ्रेंस को मुख्य प्रवक्ता पद से अपना इस्तीफा भेज दिया है और अब से मेरे किसी भी बयान को उस तरह नहीं देखा जाए।”
इसके अलावा रुहुल्ला ने अब्दुल्ला पर पार्टी की मांग भूल जाने का भी आरोप लगाया। उन्होंने ट्वीटर पर ट्वीट कर लिखा, “राज्य का दर्जा बहाल करना न्यूनतम मांग है। यह आखिरी मांग होनी चाहिए। हमारी मांग जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जें का राज्य बहाल करने की है।”
पत्रकारों पर जमकर बरसे
मालूम हो कि उमर अब्दुल्ला को आठ महीने हाउस अरेस्ट करके रखा गया था। उन्हें इसी साल मार्च में रिहा किया गया। वहीं बात करें जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 हटाएं जाने पर कुछ भी बयान देने का तो उमर अब्दुल्ला का कश्मीर को लेकर राजनीतिक बयान पहली बार आया है। उन्होंने जो आर्टिकल लिखा उसपर विवाद होने पर पत्रकारों पर जम कर बरसे। अब्दुल्ला का कहना है कि उनके आर्टिकल को तोड़-मरोड़कर पत्रकारों ने पेश किया।उन्होंने ट्वीट कर लिखा, “मैं इससे असहमत हूं, यह कहने में कोई समस्या नहीं है। मैंने कहा और किया लेकिन जब आप कोई कुछ खोज करते हैं और मेरी जुबान से कोई शब्द लेकर मेरे ऊपर ही अटैक करते हैं तो यह मेरे बारे में तुम्हारे बारे में उससे कहीं ज्यादा है। आप सब आलसी पत्रकारों और टिप्पणीकारों से मैं पूछता हूं कि कृपया मुझे दिखाएं कि मैंने कश्मीर को पूर्ण राज्य बनाए रखने की मांग कब की?”
नफरत वाले नफरत करेंगे, कुछ भी नहीं बदलेगा
उमर अब्दुल्ला ने एक के बाद एक लगातार ट्वीट किया।  उन्होंने आगे ट्वीट कर लिखा, “नफरत वाले नफरत करेंगे, कुछ भी नहीं बदलेगा। कुछ लोग हैं जिनसे मैं कुछ अच्छे की उम्मीद कर सकता हूं। उदासीनता राजनीति का एक हिस्सा है और हर किसी को इसके साथ जीना सीखना चाहिए। जीवन चलता रहेगा।”
क्या लिखा था आर्टिकल में
उमर ने आर्टिकल में कई बिंदुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने पूरे एक साल में कब, कैसे हुआ यह उस आर्टिकल में लिखा। उनका कहना है कि एक दिन से भी कम वक्त में राज्यसभा और लोकसभा ने 70 साल का इतिहास बदल दिया। जम्मू कश्मीर की सम्प्रभुता के वादे खत्म हो गए। राज्य को तोड़ दिया गया।
उन्होंने लिखा, “नरेंद्र मोदी जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। तभी से बातें होने लगीं थीं कि भाजपा आर्टिकल 370 और 35-ए से जुड़े अपने चुनावी वादे पूरे करेगी। लोकसभा में उसके पास पूर्ण बहुमत था। एयरक्राफ्ट्स के जरिए पैरा मिलिट्री के जवानों को भेजा गया। इन्हें पूरे राज्य में तैनात किया गया। राज्यपाल कहते रहे कि जम्मू-कश्मीर का स्पेशल स्टेटस बना रहेगा। ये कहा गया कि अतिरिक्त जवानों की तैनाती अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर की जा रही है। 5 अगस्त की घटना के कुछ दिन पहले हमने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। मैं इसे जल्द नहीं भूल पाउंगा। हम अंदाजा नहीं लगा पाए कि अगले 72 घंटे में क्या होना वाला है।”
हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे कुछ तो अब भी गैर कानूनी तौर पर कैद में हैं।  उमर कहते हैं, “नेशनल कांफ्रेंस आर्टिकल 370 हटाए जाने के विरोध में थी और है। हम इसे स्वीकार नहीं करेंगे। हमने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। लोकतंत्र में हमारा भरोसा है। शांतिपूर्ण विरोध जारी रहेगा। दुख की बात यह है कि इस शांतिपूर्ण विरोध को दबाने की कोशिशें जारी हैं। कई नेता गिरफ्तार कर लिए गए। कुछ तो अब भी गैर कानूनी तौर पर कैद में हैं। आतंकवाद के खिलाफ जंग में हमने अपने हजारों कार्यकर्ता खो दिए। क्योंकि हम मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में रहना चाहते थे।”
कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा
उमर आखिर में कहते हैं, “जहां तक मेरा सवाल तो है तो मेरा रुख बिल्कुल साफ है। जब तक जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश है, तब तक मैं कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ूंगा। मैं 6 साल इस विधानसभा का नेता रहा। अब इसकी ताकत छीन ली गई है। मैं अब यहां नहीं रहूंगा। मेरे ज्यादातर वरिष्ठ सहयोगी अपने घरों में कैद हैं। इसलिए हम आगे की सियासी रणनीति नहीं बना पाए हैं। मैं पार्टी को मजबूत करूंगा। लोगों का सहयोग लेकर नाइंसाफी के खिलाफ जंग लड़ूंगा।”

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