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UAPA एक्ट : चार साल जेल में बंद मो हबीब के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं,हुए रिहा

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त्रिपुरा से एक और मामला आया है UAPA एक्ट केस का, जिसमें इस एक्ट को लेकर फिर एक बार कोर्ट ने पुलिस को फटकार लगाई है।

चार साल से कैद मोहम्मद हबीब बेगुनाह साबित

त्रिपुरा में रहने वाले एक मैकेनिक पर वर्ष 2005 में बेंगलुरु में हुई एक शूटिंग की घटना में कथित रूप से शामिल होने का आरोप लगा था।वर्ष 2017 में उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। अब जेल में चार वर्ष बीत जाने के बाद, कोई सबूत न मिलने पर उन्हें बरी कर दिया गया। 36 वर्ष के मोहम्मद हबीब चारों सालों तक बिना किसी गुनाह के जेल में रहे।

गिरफ्तारी की ख़बर सुन पिता की हो गयी थी मौत

हबीब पर लगे आरोपों की बात सनुकर उनके पिता की भी मौत हो गई। अब उन्हें बेंगलुरु की केंद्रीय जेल से रिहा कर दिया गया है। बिना फीस के हबीबी का केस लड़ने वाले वकील ताहिर आमिर कहते हैं कि,’ एक व्यक्ति के इकबालिया बयान के आधार पर ही उन्हें गिरफ्तार किया गया था।वह अकेले नहीं हैं जिन्हें कई सालों तक बिना मुकदमे के सलाखों के पीछे रखा गया। अभी भी बेंगलुरु में राज्य भाजपा मुख्यालय के बाहर 2013 के विस्फोट मामले में 27 आरोपी बिना किसी मुकदमे के जेल में बंद हैं।’

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त्रिपुरा के मूल निवासी 36 वर्षीय मोहम्मद हबीब 14 जून को विशेष एनआईए अदालत ने बरी कर दिया। हबीब को 2017 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने दिसंबर 2005 की शूटिंग की घटना के सिलसिले में गिरफ्तार किया था, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी और कुछ अन्य घायल हो गए थे। कर्नाटक पुलिस ने कहा था कि हमला पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा ने किया था और बाद में हबीब को गिरफ्तार कर लिया, उसकी पहचान “आतंकवादी हमले के साजिशकर्ता” के रूप में की गई थी।

चार साल तक बिना मुकदमे के जेल में रखा गया

बेंगलुरू की केंद्रीय जेल से रिहा होने के बाद, हबीब ने कहा, “मेरे ऊपर लगे आरोपों को सनकर मेरे पिता की मौत हो गई थी। मुझे चार साल तक बिना किसी मुकदमे के जेल में रखा गया था और अब उन्हें कोई सबूत नहीं मिला तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैं पहले कभी बेंगलुरु नहीं आया था।”

पुलिस ने दावा किया था कि त्रिपुरा के अगरतला के जोगेंद्र नगर के रहने वाले हबीब वर्ष 2005 के गोलीबारी मामले के मुख्य आरोपी को अवैध रूप से बांग्लादेश ले गए थे उन्होंने कहा कि वह बेंगलुरु में आतंकी गतिविधियों में भी शामिल था। वकील ताहिर आमिर ने कहा, “पेशे से गैरेज मैकेनिक हबीब को सलाउद्दीन नाम के एक व्यक्ति के इकबालिया बयान के आधार पर गिरफ्तार किया गया था, जिसे साल 2008, दिसंबर 2017 में लखनऊ पुलिस ने गिरफ्तार किया था।”

हबीब पर कड़े गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, विस्फोटक अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। हालांकि, एक विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी अदालत अभियोजन पक्ष से असहमत थी।

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अदालत ने हबीब की इस दलील से सहमति जताई कि “पुलिस ने आरोपी के बारे में चार्जशीट में कुछ भी नहीं कहा है और न ही कोई सबूत एकत्र किया है जो यह दर्शाता है कि आरोपी को किसी भी समय इस मामले में शामिल घटना या अपराध का कोई ज्ञान है।”
न्यायाधीश ने कहा, ” उपलब्ध के सामग्री के आधार पर, मेरा विचार है कि आरोपी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं।”

अब सवाल यह है कि UAPA ACT के कई ऐसे मामले क्यों आ रहे हैं जहां कोर्ट को आगे आकर पुलिस को फटकार लगानी पड़ रही है? क्या इस एक्ट के विभिन्न मुद्दों पर एक लंबी बहस नहीं होनी चाहिए ?

अभी हाल ही में UAPA एक्ट के तहत 13 माह तक जेल में रहने के बाद रिहा हुए पिंजरा तोड़ की एक्टिविस्ट देवांगना कालिता ,नताशा नरवाल और ताहिर तन्हा ने भी बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कई खुलासे किए हैं। उन्होंने कहा कि UAPA एक्ट के नाम पर जेल में हम जैसे न जाने कितने नौजवान हैं जो बन्द हैं। जिनके पास ढंग से उनका कोई लीगल रिप्रेजेंटेटर नहीं है। बल्कि यह कानूनी हक़ है लेकिन जेल के अंदर माहौल ऐसा है कि कब और क्यों इस एक्ट के तहत पकड़ कर उन्हें जेल में बन्द कर दिया गया है यह उन्हें भी नहीं बताया गया। बिना किसी ठोस सबूत के आधार पर इस एक्ट का ग़लत इस्तेमाल ही तो किया जा रहा है।

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उन्होंने आगे कहा कि, उन्हें भी नहीं पता था कि वे कब जेल से बाह निकलेंगे। लेकिन हम शायद इसलिए भी निकल सके क्योंकि हमारे पास लीगल एक अच्छी टीम रही, लोग रहे।उन्होंने इसके लिए दिल्ली हाइकोर्ट को भी धन्यवाद कहा ।

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