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यूपी की सियासत में नया मोड़

यूपी की सियायत में नया मोड़। सपा प्रमुख अखिलेश यादव से तकरार के बाद अलग पार्टी (प्रगतिशील समाजवादी पार्टी) गठित करने वाले शिवपाल यादव ने आज स्पष्ट कह दिया है कि वे भाजपा छोड़ किसी भी दल के साथ गठबन्धन के लिए तैयार हैं। शिवपाल के दावे के बाद से उन आशंकाओं पर भी पूर्ण विराम लग गया जिसके सम्बन्ध में अब तक यह कहा जा रहा था कि शिवपाल यादव भाजपा के साथ समझौता करके अपनी पुरानी पार्टी (समाजवादी पार्टी) को लोकसभा चुनाव में नुकसान पहुंचा कर अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को फायदा पहुंचा सकते हैं। हालांकि यूपी की राजनीति में शिवपाल का यह बयान सपा-बसपा गठबन्धन के लिए राहत भरा हो सकता है लेकिन प्रेस वार्ता के दौरान उन्होंने यह कहकर पेंच फंसा दिया है कि यदि उनकी पार्टी किसी गठबन्धन में शामिल होती है तो उनकी पार्टी को यूपी में सम्मानजनक सीटें मिलनी चाहिए। शिवपाल यादव अपनी नवगठित पार्टी प्रसपा के लिए कितनी सीटें चाहते हैं? इसका खुलासा तो उन्होंने फिलहाल नहीं किया है लेकिन कहा जा रहा है कि शिवपाल ने यूपी में एक दर्जन सीटें प्रसपा के लिए मांगी हैं। अब यहां पर यह बताना जरूरी हो जाता है कि सपा-बसपा गठबन्धन के बीच पहले ही 37-37 सीटों पर समझौता हो चुका है। शेष बची 06 सीटों पर राष्ट्रीय लोकदल अपना दावा कर रही है। हालांकि लोकदल भी पहले 20 सीटों पर अड़ा हुआ था लेकिन बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव और मायावती से वार्ता के उपरांत लोकदल ने उक्त शेष 06 सीटों पर ही हामी भर दी थी। स्पष्ट है कि अब यदि भाजपा के खिलाफ बने इस गठबन्धन में कोई अन्य दल शामिल होता है तो उसे सिर्फ भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के लिए ही गठबन्धन में रहना होगा। सीटों की गुंजाइश शेष नहंी है। ऐसे में शिवपाल यादव की यह मांग सपा-बसपा के गठबन्धन को एक बार फिर से मुश्किल में डाल सकती है। यदि शिवपाल की पार्टी गठबन्धन से अलग हटकर अन्य छोटे दलों (जिसमें भाजपा से नाराज दलों की संख्या भी है) के साथ मिलकर लोकसभा के चुनावी जंग में उतरती है तो निश्चित तौर पर वोट बैंक का नुकसान सपा-बसपा गठबन्धन को ही होने वाला है।
बताया जा रहा है कि इस समस्या के निपटारे के लिए पूर्व सपा प्रमुख मुलायम को बीच में दखल देने के लिए कहा जा रहा है। सभी जानते हैं कि मुलायम की बातों को अखिलेश भले ही काट दें लेकिन शिवपाल यादव मुलायम के बातों को सम्मान देते हैं।
चूंकि शिवपाल यादव को भी अपनी नयी नवेली पार्टी का भविष्य तय करना है लिहाजा वे मुलायम के मनाने पर कितना मानेंगे? यह तो भविष्य के गर्त में लेकिन शिवपाल के बयान (भाजपा छोड़ किसी भी दल के साथ गठबन्धन के लिए तैयार) के बाद जो उम्मीद की किरण सपा-बसपा गठबन्धन में दिखी थी वह राजनीतिक चाहत के चलते खटाई में पड़ती नजर आ रही है।
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