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UP विधानसभा जीतने की शतरंजी बिसात  

UP विधानसभा जीतने की शतरंजी बिसात  

यह बात अब किसी से छिपी नहीं रह गई है कि यदि यूपी विधानसभा को फतह करना है तो गांव-देहात क्षेत्रों में जीत हासिल करने के लिए जन-जन तक विश्वास हासिल करना जरूरी है। राजनीतिक दल इसके लिए बूथ स्तर पर टीमों को मजबूत करती हैं ताकि जन-जन तक पार्टी की विचारधारा को पहुंचाया जा सके। जहां तक पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की जीत का सवाल है तो बूथ स्तर पर उसकी मजबूती ने ही उसे सफल बनाया है। हालांकि, इस बार भी भाजपा बूथ स्तर पर अभी से जुट गई है लेकिन सीएए को लेकर अफवाहों ने इस कदर भाजपा की छवि को खराब कर रखा है कि इस बार उसकी दाल गलती नजर नहीं आ रही। स्थिति ये है कि बूथ स्तर पर सम्पर्क करने वाले भाजपा नेताओं के साथ अभद्र व्यवहार अब आम होता जा रहा है।

उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुए भी भाजपा अब यह मान बैठी है कि वर्ष 2022 में विधानसभा का सफर आसानी से तय कर पाना आसान नहीं होगा। ऐसा इसलिए कि विरोधी दल सीएए के विरोध को आम जनता के बीच अच्छी तरह से भुना चुके हैं। आम जनता को भी अब यही लगने लगा है कि यदि सीएए और एनपीआर की कार्रवाई शुरू हो गई तो वर्ग विशेष के साथ ही उन्हें भी तमाम परेशानियों का सामना करना पडे़गा। नोटबंदी का उदाहरण आग में घी का काम कर रहा है।

राजनीति के माहिर भाजपाइयों ने इसका तोड़ भी निकाल लिया है। सीधी उंगली से घी निकलने न देखकर उंगली टेढ़ी करके चुनावी वैतरणी पार करने की तैयारी को अमली जामा पहनाया जा चुका है। बूथ स्तर पर मजबूती के लिए भाजपा ने आगामी अक्टूबर माह में होने वाले पंचायत चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जो शतरंजी बिसात बिछाई है वह काबिले तारीफ कही जा सकती है। यहां यह बताना जरूरी है कि खासतौर से यूपी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए गांव-देहात क्षेत्रों की जनता को अपने पक्ष में करना बेहद जरूरी है। इसके लिए पंचायत अध्यक्षों की जीत भाजपा के लिए बेहद जरूरी है।

पंचायत चुनाव के लिए आरक्षण का पुनः निर्धारण किया जाना भाजपा की चुनावी रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस नए निर्धारण से प्रदेश में पंचायतों के आरक्षण की स्थिति पूरी तरह बदल जाएगी। वर्ष 2015 में हुए पिछले पंचायत चुनाव में जो पंचायत जिस वर्ग के लिए आरक्षित हुई थी, इस बार वह उस वर्ग के लिए आरक्षित नहीं रह पायेगी।

इस प्रक्रिया को इस तरह से समझा जा सकता है। मान लीजिए यदि इस वक्त किसी ग्राम पंचायत का प्रधान अनुसूचित जाति वर्ग से है तो इस बार के चुनाव में उस ग्राम पंचायत का प्रधान पद ओबीसी के लिए आरक्षित हो सकता है।  चुनावों के लिए नए चक्रानुक्रम के अनुसार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जाति महिला, अनारक्षित, महिला, अन्य पिछड़ा वर्ग, अन्य पिछड़ा वर्ग महिला, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जनजाति महिला के वर्गों में नए सिरे से आरक्षण तय किया जाएगा।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश का पंचायती राज विभाग आरक्षण में बदलाव की इस कवायद को जुलाई-अगस्त में पूरी करेगा क्योंकि नए आरक्षण का निर्धारण चुनाव से तीन महीने पहले किया जाता है। इस सम्बन्ध में पंचायती राज विभाग का कहना है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि वर्ष 2015 के बाद से अब तक करीब 250 से 300 ग्राम पंचायतें शहरी क्षेत्र में पूरी तरह या आंशिक रूप से शामिल की गई हैं लिहाजा इतनी पंचायतों का कम हो जाना स्वाभाविक है।

जहां तक भाजपा की रणनीति का सवाल है तो तस्वीर बिलकुल स्पष्ट है। भाजपा इस बात को अच्छी तरह से जानती है कि यूपी के अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों का वोट जाति और धर्म के आधार पर बटा हुआ है। गांव के ग्राम प्रधानों की गांवों में तूती बोलती है। अर्थात जो ग्राम प्रधान ने कह दिया पूरे गांव को उसकी बात मानना लगभग जरूरी हो जाता है। भाजपा यह बात अच्छी तरह से जानती है कि उसका अधिकतर वोट बैंक शहरी क्षेत्रों से है।

हालांकि, राज्य निर्वाचन आयोग इस तरह की बातों को कोरी अफवाह बताता है और उसका यह तर्क कि विकास कार्यों के चलते अधिकतर ग्राम पंचायतों को शहरी क्षेत्रों से जोड़ा जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन यूपी भाजपा नेताओं के बीच हो रही चर्चा को आधार मानें तो ये सारा खेल वर्ष 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर खेला जा रहा है।

यूपी भाजपा नेताओं के दावों में कितनी सच्चाई है? उसका शत-प्रतिशत दावा तो नहीं किया जा सकता, इसके विपरीत यदि 250 से 300 ग्राम पंचायतों को शहरी क्षेत्र से जोड़कर नए आरक्षण का निर्धारण किया गया तो निश्चित तौर पर भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है। ये बात सपा-बसपा और कांग्रेस भी जानती है लिहाजा उसने भी नए सिरे से रणनीति को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है। कहना गलत नहीं होगा कि अक्टूबर माह में होने वाले पंचायत चुनाव बेहद रोचक हो सकते हैं। इससे पहले पंचायत अध्यक्षों के चेहरों पर पड़ती शिकन इस बात का प्रमाण है कि भाजपा की यह शतरंजी चाल उनके किले को ध्वस्त कर सकती है।

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