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शौचालय खा गया ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव

 

कुमार राकेश
ग्राम प्रधानों और पंचायत सचिवों का काकस केन्द्र सरकार की तमाम योजनाओं पर हावी है। चर्चा तो यहां तक है कि सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं की आड़ में अवैध कमाई का एक बड़ा हिस्सा सम्बन्धित विभाग के मंत्री से लेकर जिले के हाकिमों तक भी पहुंचाया जा रहा है। यही वजह है कि तमाम शिकायतों के बावजूद सरकारी योजनाओं की आड़ में अपना घर भरने वाले ग्राम प्रधानों से लेकर पंचायत सचिवों और सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती।

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भी ऐसे घोटालेबाजों से अछूती नही रह गयी है। हालिया मामला लखनऊ की तहसील मोहनलालगंज से सम्बन्धित है। चूंकि लखनऊ में मुख्यमंत्री से लेकर सम्बन्धित विभाग के मंत्री और जिलाधिकारी तक बैठते हैं इसलिए यह माना जाता है कि लखनऊ और उसकी तहसीलों में चलायी जा रही सरकारी योजनाओं में सेंध लगाना आसान नहीं है। इन दावों के विपरीत स्थिति यह है कि मोहनलालगंज तहसील के दर्जनों गांवों में चलायी जा रही सरकारी योजनाओं की आड़ में जमकर लूट हो रही है। मामला केन्द्र सरकार द्वारा संचालित ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत हर घर में शौचालय से सम्बन्धित है।
मोहनलालगंज तहसील के ग्रामीण इलाकों में शौचालयों के निर्माण के लिए सरकार की तरफ से पर्याप्त धन तो उपलब्ध कराया जा चुका है लेकिन पात्र लाभार्थियों तक यह धन नहीं पहुंच पाया है। इसके विपरीत अपात्रों को बिना किसी दौड़-भाग के योजनाओं का लाभ मिल रहा है।
जारी की गयी धनराशि के सापेक्ष लाभार्थियों के लिए पात्रता सूची दो बार बनायी गयी ताकि योजनाओं का लाभ असल लाभार्थियों को मिल सके। आमतौर पर इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ जो इससे पहले भी होता आया है। ग्राम प्रधान और पंचायत सचिवों ने आपस में सांठगांठ की और योजना का लाभ पात्रों के बजाए अपात्रों की झोली में डाल दिया।
प्रश्न यह उठता है कि ग्राम प्रधानों और पंचायत सचिवों ने ऐसा क्यों किया? इस सम्बन्ध में जब मोहनलालगंज तहसील के कुछ ग्रामीण इलाकों के पात्र लाभार्थियों से जानकारी ली गयी तो चैंकाने वाली हकीकत का खुलासा हुआ। उक्त योजना के मद में आए धन का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा ऐसे कथित लाभार्थियों को दिया गया जिनके शौचालय पहले से ही बने हुए थे। अधिकांश ऐसे परिवारों में सदस्यों का नाम बदलकर पुराने शौचालयों का ही रंग-रोगन करवाया और तत्पचात जियो टैग/फोटोग्राफी करके रिपोर्ट शासन के पास भेज दी गयी। रही बात अपात्रों को नाजायज तरीके से लाभान्वित किए जाने का अंकगणित तो इसके पीछे का सच यह है कि ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव द्वारा अपात्र लाभार्थियों के बैंक खाते में योजना का धन ट्रांसफर करने से पहले ही अपने हिस्से का कमीशन नकद वसूल लिया जाता है। अपात्रों को खुशी इस बात की है कि उन्हें बैठे-बिठाए 5 से 6 हजार रुपया मिल जा रहा है। दूसरी ओर पात्र लाभार्थी अपना हक पाने के लिए ग्राम प्रधान से लेकर पंचायत सचिवों की चैखट पर नाक रगड़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि कुछ ने मुख्यमंत्री शिकायत प्रकोष्ठ में भी शिकायत दर्ज करवायी है लेकिन शिकायत पर कार्रवाई की स्थिति यह है कि कोई भी अधिकारी जांच करने तक नहीं पहुंचा।
मोहनलालगंज तहसील अन्तर्गत जो ग्रामीण इलाके ग्राम प्रधान और पंचायत सचिवों की मिलीभगत के चलते प्रभावित हैं उनके नाम इस प्रकार से हैं। मोहनलालगंज तहसील की ग्राम पंचायतें बघौना, भसण्डा, सुल्सामउ, सिसेंडी, उत्तरगांव, मऊ, समेसी, दयालपुर, रामपुर गढ़ी जमुनी, मीरखनगर, कांटा-करौंदी, बलसिंह खेड़ा जैसे नाम तो महज बानगी मात्र हैं जबकि दावा यह किया जा रहा है कि इस तरह के अनेकों गांवों में योजना के धन का बंदरबांट किया गया है।
दिखावे के तौर पर कुछ वास्तविक पात्र लाभार्थियों को भी योजना का धन उनके बैंक खाते में इस शर्त के साथ ट्रांसफर किया गया कि उनका शौचालय ग्राम प्रधान अपने कारीगरों से बनवायेगा। कुछ ने विरोध किया तो अनपढ़ ग्रामीणों को दिग्भ्रमित करते हुए कहा गया कि सरकार की योजना है कि गरीबों के शौचालय ग्राम प्रधान अपने स्तर से बनवाएं ताकि गुणवत्तापरक काम हो सके। अनपढ़ ग्रामीणों ने बैंक खाते में आए 12 हजार रुपए ग्राम प्रधान को इस उम्मीद के साथ दे दिए कि उन पैसों से ग्राम प्रधान अपने कारीगरों से गुणवत्तापरक शौचालय बना देगा लेकिन हुआ यह है कि ग्राम प्रधान आधे से ज्यादा पैसा डकार गया और शौचालयों का निर्माण आधा-अधूरा ही रह गया।
प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि मोहनलालगंज तहसील की बघौना और कूढा सहित कई ग्राम पंचायतों का यदि सर्वे करवा लिया जाए तो हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी।
इसी तरह का हाल विकास खण्ड सरोजनी नगर के गांवों माती, पश्चिम पखर, पूरब पखर और बन्थरा का भी है।
कुल मिलाकर मौजूदा स्थिति यह है कि जहां एक ओर पात्र लाभार्थी अपना हक पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं वहीं दूसरी ओर अपात्र लाभार्थी ग्राम प्रधान और पंचायत सचिवों की अवैध कमाई का जरिया बने हुए हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस मामले की जांच उच्च स्तर से करवायी जाए तो निश्चित तौर पर लाखों के घोटाले का पर्दाफाश किया जा सकता है लेकिन मौजूदा सरकार मानों कान में रुई डाले बैठी हो। जिलाधिकारी भी यदा-कदा इस इलाके में चक्कर लगाते रहते हैं और ग्रामीण उनसे शिकायत भी करते हैं लेकिन उनके स्तर से भी समस्या का समाधान दूर की कौड़ी हो चुकी है।

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