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Country Uttarakhand

संकट में तीरथ, समाधान के कम हैं आसार

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत को यकायक ही दिल्ली तलब किए जाने के चलते नाना प्रकार की कयासबाजियों का दौर शुरू हो चला है। गत् सप्ताह 26 जून से 29 जून तक भाजपा के दिग्गज नेताओं का जमावड़ा नैनीताल जिले के शहर रामनगर में लगा। इस जमावड़े को ‘चिंतन शिविर’ कह पुकारा गया। उद्देश्य था आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर चिंतन करना। प्रदेश भाजपा के सभी बड़े नेताओं संग पार्टी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष व प्रभारी दुष्यंत गौतम इसमें शामिल हुए। इस शिविर के बाद सीएम तीरथ रावत को तत्काल दिल्ली पहुंचने का फरमान मिला। सीएम के कई पूर्व निर्धारित कार्यक्रम थे जिन्हें रद्द कर वे दिल्ली पहुंचे। इस फरमान ने नाना प्रकार की आशंकाओं को बल देने का काम किया है। बहुत अर्से से यह कहा जाने लगा है कि तीरथ रावत की गद्दी तकनीकी कारणों के चलते खतरे में पड़ चुकी है। कांग्रेस नेता नवप्रभात ने सबसे पहले इस तकनीकी कारण को मुद्दा बनाया था। बकौल नवप्रभात तीरथ रावत उपचुनाव के जरिए विधायक नहीं बन सकते है क्योंकि संविधान प्रदत्त जनप्रतिनिधित्व कानून के अनुच्छेद 151(ए) में स्पष्ट प्रावधान है कि लोकसभा अथवा विधानसभाओं में रिक्त पड़ी सीट पर उपचुनाव तभी कराए जायेंगे जबकि संबंधित सभा का कार्यकाल न्यूनतम एक वर्ष बचा हो। उत्तराखण्ड विधानसभा का वर्तमान समय 23 मार्च, 2022 तक है। चूंकि यह समय एक वर्ष से कम है इसलिए चुनाव कराया जाना संभव नहीं। इस कानून के चलते तीरथ सिंह रावत की गद्दी पर संकट आने की बात कही जा रही है क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 164(4) कहता है कोई मंत्री जो, निरंतर छह माह की किसी अवधि तक राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि को समाप्ति बाद मंत्री नहीं रहेंगा।

मुख्यमंत्री पद पर अपनी नियुक्ति के समय तीरथ रावत राज्य विधानसभा के सदस्य न होकर गढ़वाल संसदीय सीट से सांसद थे। अभी भी हैं। वे दस मार्च, 2021 को सीएम बने। इस चलते उन्हें 10 सितंबर 2021 से पहले-पहले राज्य विधानसभा का सदस्य बनना होगा। वर्तमान में 70 सदस्यीय विधानसभा में दो सीटें खाली हैं। अप्रैल 2021 में गंगोत्री सीट से विधायक गोपाल रावत का निधन हो गया था। यह सीट तबसे खाली है। गत् 13 जून को हल्द्वानी सीट से विधायक डाॅ ़ हृदयेश के निधन के चलते यह सीट भी रिक्त है। इनमें से किसी भी सीट से उपचुनाव जरिए तीरथ रावत चुनाव जीत विधानसभा पहुंच सकते हैं। ऐसा अनेकों बाद हुआ है जब सीएम पद किसी गैर विधायक को दिया गया और वह छह माह के भीतर-भीतर उपचुनाव के जरिए विधानसभा सदस्य बन गया हो। तीरथ सिंह को सीएम बनाते समय यही रणनीति भाजपा की रही थी। संकट लेकिन जनप्रतिनिधि कानून(1951) के चलते पैदा हो रहा है। इस कानून के भाग नौ में उपनिर्वाचन की बाबत विस्तार से कानून की व्याख्या की गई है। तीरथ सिंह रावत इसी की जद में आ चुके हैं। इसकी धारा 151 में कहा गया है कि ‘उपनिर्वाचन रिक्त होने की तारीख से छह माह की अवधि के भीतर कराया जाएगा किंतु इस धारा की कोई बात उस दशा में लागू नहीं होगी जिसमें किसी रिक्ति से संबंधित सदस्य की पदावधि का शेष भाग एक वर्ष से कम है।’ चूंकि राज्य विधानसभा का शेष भाग मात्र नौ माह रह गया है इसलिए विपक्षी दल इस कानून का हवाला देते हुए उपचुनाव नहीं हो सकने का मुद्दा जोर-शोर से उठा रहे हैं। यदि चुनाव आयोग इस बात से सहमत होता है और उपचुनाव नहीं कराता है तो संविधान के अनुच्छेद 164(4) अनुसार 10 सितंबर के उपरांत सीएम रावत पद में बने नहीं रह सकते हैं।

मुंबई हाईकोर्ट का फैसला बढ़ा सकता है तीरथ का संकट

हालांकि विधि विशेषज्ञों का मानना है कि चुनाव कराने या न कराने का अंतिम निर्णय चुनाव आयोग अपने विवेक से तय करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है और यदि वह चाहे तो जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 को दरकिनार कर उत्तराखण्ड में उपचुनाव करा सकता है, लेकिन ऐसा होना कई कानूनी अड़चनों और विवादों को जन्म दे देगा। 2019 में चुनाव आयोग को ठीक ऐसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़ा था। तब महाराष्ट्र की एक विधानसभा सीट तत्कालीन विधायक के इस्तीफे के चलते खाली हो गई थी। राज्य विधानसभा की कटोल विधानसभा सीट से विधायक रंजीत देशमुख ने यकायक ही इस्तीफा दे डाला था। उन्होंने 6 अक्टुबर, 2018 को इस्तीफा दिया था। नियमानुसार छह माह के भीतर उपचुनाव कराया जाना चाहिए था लेकिन चुनाव आयोग ने इस समय सीमा की समाप्ति के छह दिन बाद चुनाव कराने का फैसला लिया था। मामला अदालत पहुंचा जहां चुनाव आयोग के फैसले को दो आधार पर चुनौती दी गई। पहला तर्क छह माह बीतने के बाद चुनाव कराए जाने का था तो दूसरा तर्क जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 151(अ) का दिया गया जिसके अनुसार विधानसभा का बचा हुआ समय एक वर्ष से कम होने के चलते चुनाव नहीं कराए जा सकते हैं। मुंबई उच्च न्यायालय के समक्ष चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि विधानासभा की समय सीमा एक वर्ष से कम होने का आंकलन संबंधित विधायक का त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष द्वारा स्वीकारे जाने से किया जाता है। इस मामले में संबंधित विधायक रंजीत देशमुख ने त्यागपत्र 6/10/2018 को दिया था। जिसे विधानसभा अध्यक्ष ने 6/10/2018 को ही स्वीकार लिया था। चुनाव आयोग का तर्क था कि राज्य विधानसभा का समय 18/10/2019 को समाप्त हो रहा है। इसलिए 6/10/2018 को खाली हुए स्थान पर चुनाव कराए जा सकते हैं, क्योंकि एक वर्ष की समय गणना पद खाली होने के दिन से की जाती है। हाईकोर्ट ने लेकिन आयोग के तर्कों को खारिज करते हुए सख्त टिप्पणी कर डाली। दो सदस्यीय पीठ ने चुनाव आयोग द्वारा एक वर्ष से कम अवधि होने के बावजूद विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव कराए जाने को ‘Arbitrary, discriminatory, unreasonable and violative of principle of law’ करार दिया। हाईकोर्ट ने इस उपचुनाव को रद्द करने का फैसला देते हुए चुनाव आयोग के ही एक अन्य मामले में लिए गए निर्णय को अपना आधार बना डाला। दरअसल 2018 में आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य में रिक्त कुछ लोकसभा सीटों में उपचुनाव कराए जाने की मांग की थी। 9 अक्टुबर, 2018 को चुनाव आयोग ने यह कहते हुए खाली पड़ी लोकसभा सीटों पर उपचुनाव कराने से इंकार कर दिया था कि लोकसभा का बचा हुआ समय एक वर्ष से कम है इसलिए जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 151 के अनुसार चुनाव नहीं कराए जा सकते हैं। मुंबई हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में चुनाव आयोग को उसके ही तर्क की याद दिलाते हुए कहा कि उपचुनाव तभी कराए जाने चाहिए जब लोकसभा अथवा किसी राज्य की विधानसभा की शेष अवधि न्यूनतम एक वर्ष हो ताकि चुने गए जनप्रतिनिध को अपने क्षेत्र में काम करने का समय मिल सके।

तीरथ के पास विकल्पों की कमी

मुंबई उच्च न्यायालय का निर्णय चुनाव आयोग के हाथ तो बांधता ही है, संविधान की मूल भावना और जनप्रतिनिधित्व कानून की स्पष्ट व्याख्या भी करता है। ऐसे में तीरथ रावत के पास कोई स्पष्ट और मजबूत विकल्प की भारी कमी है। यदि वे 10 सितंबर से पहले इस्तीफा देकर दोबारा शपथ लेते हैं तो भी कानून उनके आड़े आ जाएगा। दरअसल संविधान निर्माताओं ने संविधान बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखा कि भविष्य में समय काल और परिस्थिति अनुसार संविधान की व्याख्या की जा सके लेकिन उसकी मूल भावना संग छेड़छाड़ न हो। यही कारण है कि जब कभी संविधान में ऐसे संशोधन किए गए जो उसकी मूल भावना के विपरीत थे तब सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे संशोधनों को खारिज कर डाला। संविधान का अनुच्छेद 164(4) स्पष्ट कहता है कि किसी भी पद चाहे वह केंद्र में मंत्री का हो या फिर राज्यांे में, यदि नियुक्त किया गया व्यक्ति संबंधित लोकसभा, राज्यसभा अथवा राज्यों की विधानसभा-विधान परिषद का सदस्य न हो तो छह माह की अवधि के भीतर उसे संबंधित सदन का सदस्य बनना ही होगा। 1995 में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री हरचरण बरार मंत्रिमंडल में तेज प्रकाश सिंह को मंत्री बनाया गया था। वे तब विधानसभा के सदस्य नहीं थे। छह माह के भीतर एमएलए न बन पाने के कारण उन्होंने मार्च 1996 में इस्तीफा दे दिया। हरचरण बरार के स्थान पर कुछ माह बाद कांग्रेस ने राजिन्दर कौर भट्टल को सीएम नियुक्त कर डाला। भट्टल ने तेज प्रकाश सिंह को एक बार फिर से नवंबर 1996 में अपने मंत्रिमंडल में ले लिया। राजिन्दर कौर भट्टल के इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी गई। सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा। 18 अगस्त 2001 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एएस आनंद की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने इस पर अपना महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए छह माह की अवधि बीतने बाद भी सदन का सदस्य न बन पाने पर किसी भी परिस्थिति में दोबारा मंत्री बनने को पूर्णताः गैर संवैधानिक बता डाला। न्यायमूर्ति आनंद ने कहा ‘We are of considered opinion that it would be
subverting the constitution to permit an individual, who is not a member of the legislature, to be appointed a minister repeatedly for a term of ‘Six consecutive months without him getting himself elected in the meanwhile’। उपरोक्त दोनों निर्णयों के चलते यह स्पष्ट है कि न तो राज्य में उपचुनाव होना संभव है न ही तीरथ सिंह रावत 10 सितंबर को इस्तीफा दे दोबारा पद की शपथ ले सकते हैं। ऐसे में एकमात्र विकल्प भाजपा के पास या तो 10 सितंबर से पहले एक अन्य सीएम को शपथ दिलाना है या फिर समय पूर्व विधानसभा भंग कर बचे कुछ महीनों को राष्ट्रपति शासन के अधीन करने का है। दोनों ही विकल्प राजनीतिक दृष्टि से भाजपा को भारी पड़ने वाले हैं। भाजपा रणनीतिकारों की इस बड़ी चूक का काम विपक्षी दलों को आगामी विधानसभा चुनावों में मिलना तय नजर आ रहा है।

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