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इन भयानक हालातों में भी धूल फांक रहे हजारों वेंटिलेटर, ऐसे जीतेंगे कोरोना से जंग?

देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर से हालात बेकाबू और खतरनाक होते जा रहे हैं।  कोरोना जल्दी-जल्दी रूप बदल रहा है और ज्यादा लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है। इस कारण अस्पतालों में कोरोना मरीजों की संख्या और मौतों का आंकड़ा भी लगातार  बढ़ रहा  है। कोरोना के इस बढ़ते रूप के कारण देशभर  में ऑक्सीजन की कमी किसी से छिपी नहीं है। भले ही सरकारी दावे कुछ भी हों, लेकिन जमीनी हकीकत अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी के चलते हो रही मौतों से लगाया जा सकता  है। वहीँ अगर बात करें वेंटिलेटर की तो  एक वेंटिलेटर सालभर में न जाने कितने लोगों की जान बचाता है। यह जीवन रक्षक उपकरण काफी महंगा होता है इसलिए हर अस्पताल में इसकी व्यवस्था होती भी  नहीं है । दिल्ली-एनसीआर के बड़े अस्पतालों में भी हमेशा वेंटिलेटर की कमी रहती आई है। इस तरह के हालात होते हुए भी सैकड़ों वेंटिलेटर यहां वहां धूल फांक रहे हैं। कहीं चलाने वाला नहीं तो कहीं किसी मामूली उपकरण की कमी रह गई है।

कोरोना काल में वेंटिलेटर की मारामारी से पूरा मध्य यूपी जूझ रहा है। बुंदेलखंड के जिलों में हालात कुछ  बेहतर जरूर है लेकिन  मध्य यूपी के आठ जिलों में टेक्नीशियन व सपोर्टिंग स्टाफ न होने से काफी दिक्क्तें  है। पीएम केयर फंड और पहले से मौजूद 250 से ज्यादा वेंटिलेटरों  में से आधे से ज्यादा धूल फांक रहे हैं। सबसे ज्यादा खराब स्थिति कन्नौज मेडिकल कॉलेज की है। यहां कुल 105 वेंटिलेटर थे, जिनमें  30 लखनऊ भेज दिेए गए हैं। बचे 75 इंस्टॉल तो हैं पर उपयोगी नहीं हैं तो जिला अस्पताल में 24 वेंटिलेटर स्टाफ न होने से बेकार हैं। यही हाल फर्रुखाबाद का भी है। यहां 16 वेंटिलेटर में एक भी काम नहीं कर रहा है, क्योंकि इन्हें चलाने वाला ही कोई नहीं है l कानपुर एक मात्र जिला है जहां न वेंटिलेटर की दिक्कत है न संचालन के लिए प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ और डॉक्टर की।

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बरेली में  300 बेड के कोविड अस्पताल में 18 वेंटिलेटर लगाए गए थे जो एक साल से चले ही नहीं हैं । प्रशिक्षित स्टाफ की कमी के चलते कोरोना काल में भी वेंटिलेटर बंद हैं ।  इसी तरह बदायूं जिला अस्पताल में पांच, राजकीय मेडीकल कालेज में 103 में से 90, शाहजहांपुर मेडिकल कालेज में 54, पीलीभीत में 16 में से 14 वेंटीलेटर चले ही नहीं हैं। सब जगह प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। जिला खीरी में 30 वेंटीलेटर धूल फांक रहे हैं।

उत्तराखंड :  183 वेंटिलेटरों  का नहीं हो पा रहा है उपयोग 

राज्य के सरकारी अस्पतालों में कुल 183 वेंटिलेटर का उपयोग नहीं हो पा रहा है। ज्यादातर जगहों पर वेंटिलेटर संचालित करने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। साथ ही कुछ जिलों में इन्हें अस्पतालों में लगाने के बजाय अब तक सीएमओ कार्यालयों में रखा गया है। हरिद्वार में स्टाफ न होने से कारण 49 मशीनों का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा। श्रीनगर मेडिकल कॉलेम में भी 20 वेंटीलेटर का उपयोग नहीं हो रहा। टिहरी में सीएमओ ऑफिस में भी पांच मशीनें धूल फांक रही हैं। चंपावत में नौ वेंटिलेटर साल भर पहले खरीदे गए। स्टाफ नहीं होने के कारण इनका संचालन नहीं हुआ है। ऊधमसिंह नगर के खटीमा चिकित्सालय को पिछले साल 12 वेंटिलेटर मिले पर यह आज तक संचालित नहीं हो पाए। अल्मोड़ा जिले के अस्पतालों में 47 वेंटिलेटर हैं। विशेषज्ञ डाक्टरों और स्टाफ की कमी के चलते इनका उपयोग नहीं हो रहा है।

झारखंड : 520 मशीनें डिब्बे में पैक 

झारखंड में अभी कुल 1173 वेंटिलेटर हैं। इनमें से कोरोना काल में 500 वेंटिलेटर केन्द्र सरकार से प्राप्त हुए हैं। इनमें 653 वेंटिलेटर कार्यरत हैं जबकि 520 वेंटिलेटर अभी काम नहीं कर रहे हैं। इनमें वे 500 वेंटिलेटर शामिल हैं जिन्हें कोरोना काल में केन्द्र सरकार ने दिये हैं। शेष जो 20 वेंटिलेटर बंद हैं वे सुदूर जिलों में लगे हैं। वहां विशेषज्ञ तकनीशियन के नहीं होने अथवा अन्य तकनीकी गड़बड़ी से इन्हें चालू नहीं किया जा सका है। कोरोना की पहली लहर में भी राज्य को पीएम केयर्स फंड से 574 वेंटिलेटर मिले थे।

बिहार : 250 से ज्यादा वेंटिलेटर बंद

बिहार में 900 वेंटिलेटर पीएचसी से लेकर मेडिकल कॉलेज अस्पताल तक में लगाए गए हैं। इनमें 250 से अधिक बंद हैं। किसी के लिए बिजली कनेक्शन नहीं है तो कहीं मानव संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।

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