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इस बार बिहार में खलेगी बड़े नेताओं की कमी,नये चेहरों के हवाले चुनावी अभियान

 बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों के  ऐलान  के बाद राज्य में सियासी हलचल तेज हो गई है। इस बार बिहार विधानसभा चुनाव राज्य की सियासत में नए नेतृत्व के उभार का भी साक्षी बनेगा। साथ ही इन उभरते नायकों की अग्निपरीक्षा भी होगी। वहीं, चार दशकों से राज्य और देश की सियासत में छाए रहे लालू प्रसाद और रामविलास पासवान की कमी खलेगी। हालांकि लालू प्रसाद भले ही नेपथ्य से अपनी पार्टी की कमान संभाल रहे हैं, लेकिन इस बार उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका चुनाव में नहीं होगी, जबकि रामविलास पासवान लंबे समय से बीमार चल रहे थे। उनका कल आठ अक्टूबर को निधन हो गया है।

सुदूर गांव और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से निकलकर सत्ता के शिखर तक की यात्रा तय कर दोनों ने मिसाल भी कायम की। हालांकि लालू प्रसाद को धन लोलुपता ने ऐसे जकड़ा कि सलाखों के पीछे पहुंच गए।

इस चुनाव में तीन युवा नेता अपनी- अपनी पार्टियों की कमान संभाल रहे हैं। 30 वर्षीय तेजस्वी महागठबंधन तो 37 वर्षीय चिराग लोजपा के चेहरे  हैं। इन दोनों को राजनीति विरासत में मिली है। वीआईपी के अध्यक्ष 39 वर्षीय मुकेश साहनी मुंबई में कारोबरी रहे। इन्होंने अपनी पार्टी बनाई और पहली बार बिहार विधान सभा के चुनाव में उतरे हैं। साहनी ने एनडीए में भाजपा कोटे से 11 सीटें हासिल कर बड़ी कामयाबी भी दर्ज कर ली है। लोकसभा का चुनाव इन्होंने महागठबंधन के बैनर तले लड़ा था। वहीं बिहार के चुनाव में इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर का इस्तेमाल नहीं करने की लोजपा को दी गई भाजपा की चेतावनी ने सूबे में एक बार फिर चुनाव में चेहरे की सियासत की अहमियत का पुख्ता संदेश दे दिया है। चेहरे की अहमियत का ही तकाजा है कि नीतीश कुमार के नेतृव में चुनावी मैदान में उतरने के एलान के बावजूद भाजपा को केंद्र में अपने सहयोगी दल लोजपा को पीएम मोदी के चेहरे से दूरी बनाने की हिदायत देनी पड़ रही है।

राज्य में  चुनावी  में चेहरों को लेकर राजनीतिक पार्टियों की इस अति सतर्कता की वजह बिहार के बीते तीन दशक के चुनावी नतीजे हैं। हालिया सियासी इतिहास पर नजर डालें  तो वर्ष 1990 से अब तक सात विधानसभा चुनावों में सत्ता की दशा-दिशा मैदान में उतरे चेहरों ने तय की है। चुनावी मुद्दे चाहे जितने प्रासंगिक हों चेहरे ही सत्ता की चाभी साबित हुए हैं। 1990 से 2005 तक के 15 वर्षों  के कालखंड में सामाजिक न्याय के नारे के जरिए  लालू प्रदेश  में पिछड़े वर्ग के राजनीतिक सशक्तिकरण के सबसे बड़े चेहरे रहे।

हालांकि, राजनीतिक सशक्‍तीकरण की यह आंच जब धीमी हुई और सूबे के पिछड़ेपन व विकास के मुद्दों की आवाज तेज हुई तब लालू के सियासी चेहरे की रौनक भी कमजोर पड़ी। सूबे में डेढ़ दशक तक सामाजिक न्याय के निर्विवाद चेहरा रहे लालू के इस कालखंड को आखिरकार 2005 में विकास और सुशासन का चेहरा लेकर सामने आए नीतीश कुमार ने समाप्त किया। नीतीश ने एक ओर विकास-सुशासन और सामाजिक न्याय के प्रगतिशील चेहरे के साथ हर वर्ग को जोड़ा और 15 साल की लंबी पारी खेल दी है।

समय के घूमते इस चक्र का नतीजा कहें या संयोग मगर 2020 के चुनाव में बिहार में चेहरे की यह लड़ाई एक नए मोड़ पर है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे ने केंद्रीय राजनीति की सीमा को तोड़ते हुए प्रदेश की राजनीति में झंडा गाड़ दिया। इसका असर कितना है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बिहार में राजग से अलग होने के बावजूद लोजपा मोदी के नाम पर मैदान में है तो राजग की ओर से चेतावनी दी जा रही है।

अगले विधानसभा चुनाव तक खुद को स्थापित करने में जुटे लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान बार-बार मोदी को अपना हीरो बताकर जनता में यह स्थापित करना चाहते हैं कि लोजपा को दिया गया वोट दरअसल, मोदी के लिए होगा। दिलचस्प यह है कि तीन दशक बाद सूबे में विकल्प के नए चेहरे के तौर पर पहली बार मैदान में उतरे लालू प्रसाद के पुत्र तेजस्वी यादव को सूबे ने नेतृव की कसौटी पर अभी तक परखा नहीं है।

हालांकि यह भी अहम है कि तेजस्वी युवा चेहरा हैं और सूबे के मतदाताओं में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। चुनावी चेहरे की जरूरत का ही तकाजा है कि महागठबंधन की दूसरी बड़ी साझेदार कांग्रेस ने चुनाव से पहले तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने पर हामी भर दी।

राज्य की 243 विधानसभा सीटों पर इस बार तीन चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं। प्रदेश में 28 अक्टूबर को पहले चरण की वोटिंग होगी ,दूसरे चरण का चुनाव तीन नवंबर और तीसरे चरण का चुनाव 7 नवंबर को होगा। जबकि 10 नवंबर को होगी।

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