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आगामी लोकसभा चुनाव के लिए बहुत ज्यादा समय नहीं बच गया है। कुछ ही महीने शेष हैं। अंतिम समय में जो देश की राजनीति ने राह पकड़ी है, वह नफरत और हिंसा की राजनीति है। अयोध्या में राम मंदिर मुद्दे का जोर पकड़ना और बुलंदशहर में हिंसक भीड़ के हाथों इंस्पेक्टर सुबोध कुमार का मारा जाना इसके नवीनतम उदाहरण हैं।
इन दिनों तीन बड़ी घटनाएं हुई जिनको एक-दूसरे के साथ जोड़कर देखने की दरकार है। अयोध्या में संघ और शिवसेना समेत कई हिंदू संगठन राम मंदिर बनाने की जल्दबाजी में पहुंचे। वो सब मिलकर सरकार पर दबाव बना रहे हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत तक कह रहे हैं कि सरकार को मंदिर बनाने के लिए महाभियोग लाकर कानून बनाना चाहिए। दो दिनों तक अयोध्या में धर्म संसद का भी आयोजन हुआ। इसके कुछ ही दिन बाद देश भर के किसान दिल्ली पहुंचे। संसद भवन के सामने उन्होंने अपनी गुहार लगाई। वे अपने लिए कर्ज माफी चाहते थे। जीने के लिए न्यूनतम व्यवस्था चाहते थे कि उनकी उपज का वाजिब दाम मिले। अन्न खरीददार के अभाव में खेतों में न सड़े। कर्ज का फंदा फांसी का फंदा न बने। इस घटना के कुछ दिन बाद बुलंदशहर में उग्र भीड़ ने इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या कर दी।

इन तीनों घटनाओं में परस्पर संबंध यह है कि मोदी सरकार ने साढ़े चार साल में कुछ उल्लेखनीय किया नहीं। जनता को बताने और वोटरों को लुभाने के लिए कुछ है नहीं इसलिए अब भाजपा के पास हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। मंदिर का मुद्दा भाजपा की अब मजबूरी बन गई है। ध्यान रहे पिछला चुनाव मोदी के नाम लड़ा गया था और अप्रत्याशित सफलता मिली थी। यह भी भूलना नहीं चाहिए कि तब मोदी के साथ देश की करोड़ों जनता का सपना जुड़ा था। वह सपना बड़े कौशल के साथ मोदी ने जनता की आंखों में रोपा। लेकिन पिछले साढ़े चार सालों में भक्तगणों को छोड़कर अधिकांश लोगों का मोहभंग हुआ है। सपना पूरा नहीं हुआ। वे खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं।

जिन लोगों का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मोहभंग हुआ है उनमें देश के किसान अहम हैं। युवाओं के बाद किसान आगामी लोकसभा चुनाव में संख्या के हिसाब से महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पिछले 2014 के चुनावी भाषणों और उसके बाद के भाषण में भी नरेंद्र मोदी ने किसानों की बेहतरी के लिए कई वादे किए थे। लेकिन उन वादों को निभाया नहीं गया। किसानों का बड़े पैमाने पर मोदी से मोहभंग हुआ है। उस मोहभंग का ही नतीजा है कि किसान बार-बार अपनी गुहार लेकर दिल्ली पहुंच रहे हैं। लेकिन सरकार है कि उसके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी है। पता नहीं भाजपा के आका इस चीज को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं कि किसानों की नाराजगी का खामियाजा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को भुगतान पड़ सकता है।

अब आते हैं बुलंदशहर की घटना की तरफ। सच तो यह है कि जिस तरह से गोरक्षा के बहाने हिन्दुत्व की हिंसा से भरी भीड़ ने इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की जान ली वह उस राजनीति का हिस्सा है जो अपने लाभ के लिए समाज में जहर फैला रही है। समाज में जहर फैलाने वाली यह राजनीति एक दो दिन में नहीं दशकों से बदस्तूरजारी है। आदमी को हिंसक भीड़ में तब्दील कर दिया गया है। देश में बड़ी तादाद में युवा बेरोजगार हैं। बेरोजगार युवा इस हिंसक भीड़ के बड़े हिस्से हैं। मौजूदा शासन व्यवस्था में हमारे भीतर की उस आदिम हिंसा को हवा देकर हमें फिर उस से कबिलाई दौर में लौटा दिया गया है जहां कानून नाम की कोई चीज नहीं होती थी। किसी भी अपराधी को चाहे वह निरपराध ही क्यों न हो उसे भीड़ सजा देती थी। सजा सरेआम उसे मौत के घाट उतार देने की होती थी। इन दिनों वही हो रहा है। भीड़ लोगों को सरेआम हत्या कर उसे सजा देने लगी है।

मशहूर एंकर रवीश कुमार बुलंदशहर की घटना के बाबत कहते हैं- ‘मैंने’ अपनी किताब दि फ्री वॉयस में एक रोबो रिपब्लिक की बात की है जो हर तरफ तैयार है, जो जरा सी अफवाह की चिंगारी पर किसी को घेरकर मार सकती है। सांम्प्रदायिक बातों से भटकते-मरते एक नागरकि को रोबोट में बदल दिया जाता है, जो खुद अपने स्तर पर हिंसा को अंजाम दे दे जिसके बाद हिंसा की जवाबदेही किसी नेता पर नहीं आए। पहले की तरह किसी पार्टी या मुख्यमंत्री पर न आए। उसी रोबो-रिपब्लिक की एक भीड़ ने इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को मार दिया। असल में यह सिस्टम का नया खेल है। इस खेल की खोल में वह खुद का चेहरा छिपा लेता है। इसलिए अब जो कुछ भी करती है, वह भीड़ करती है। भीड़ का कोई नाम नहीं होता, कोई चेहरा नहीं होता। लोगों को आशंका है कि आगामी लोकसभा चुनाव तक भीड़ कुछ और हत्याएं करेगी। नफरत और हिंसा की राजनीति और परवान चढ़ेगी।

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