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दिल्ली हिंसा में जानोमाल की हानि तो हुई पर भाईचारे की लौ जला दिया

दिल्ली हिंसा में जानोमाल की हानि तो हुई पर भाईचारे की लौ जला दिया

दिल्ली हिंसा में जानोमाल की हानि तो पहुंची है लेकिन हिंसा ने नफरत को कुचल कर इंसानियत और भाईचारे की लौ को जला दिया है। प्रेमकांत और उनके जैसे कई नौजवान हिंसा में अपनी जान की परवाह तक नहीं की। ऐसे ही एक दिल को सुकून देने वाली खबर आई है। ये आप बीती है तबस्सुम और ईश्वरी की। ये कहानी है कि कैसे हिंदू परिवारों ने गली के करीब 10 मुस्लिम परिवारों को दंगाइयों की भीड़ से बचाया। और दो दिन तक अपने घर पर पनाह दी। इतना ही नहीं ह्यूमन चेन बनाकर उन्हें सुरक्षित रिश्तेदारों के घर तक पहुंचाया भी।

तबस्सुम बताती हैं, “यह 24 और 25 फरवरी की रात की बात है। उस दिन हमारी गली में अचानक ही भीड़ घुस आई। कुछ के सिर पर हेलमेट थे। कुछ हथियार लिए हुए थे। मेरे गली वालों ने हमें अपने घरों में छिपा लिया। हमारे बच्चों को खाना खिलाया। हम सब करीब सौ-पचास लोग थे। उन्होंने पूरी रात हमारी हिफाजत की।”

तबस्सुम ने आगे कहा, “उन्होंने हमें निकालने के लिए लाइन बनाई। हमारा हौसला बढ़ाते हुए कहा, पहले हम हैं…। पहले हम पर हमला होगा। घबराओ मत। हम आपके साथ हैं। हमारी मस्जिद है। वहां तक हमारे लिए लाइन बनाई और बाहर निकाला।”

तबस्सुम और ईश्वरी ने भड़की हिंसा के लिए बाहर से आए लोगों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि हमारे हिंदू भाइयों ने हमें वहां से निकाला है। ऐसा भाईचारा सभी रखें। हिंदू और मुस्लिम सब एक हैं। बस मोहब्बत से रहने की जरूरत है। जो बाहर के लोग आते हैं, सब एक होकर उन्हें निकाल दें।

वहीं जहां एक तरफ घर, दुकाने, गाड़िया जलाई गईं। यहां तक की मस्जिद तक को नहीं छोड़ा गया। वहीं चांद बाग में मंदिर की रक्षा मुस्लिम परिवार ने किया। मंदिर की सुरक्षा के लिए दिन-रात पहरा दिया। पूरी कोशिश की कि कोई दंगाई मदिर को हाथ न लगाने पाए। उनका कहना था कि अगर मंदिर को हाथ लगाया जाता है तो यकीन मानिए हम सबके लिए यह बेहद शर्मिंदगी की बात होती।

इलाके के रहने वाले नजीर कहते है कि हमें ज्यादा चिंता इस बात की थी कि इस मंदिर की ओर बढ़ा कोई भी पत्थर दंगाइयों को पूरी दिल्ली में आग लगाने का मौका दे देता, जो हम कतई नहीं चाहते थे। दूसरे स्थानीय लोग बताते हैं कि पुलिस को एक नहीं दर्जनों बार कॉल की गई। लेकिन पुलिस मौके पर नहीं आई। जिसके चलते आसपास के इलाकों में हालात ज्यादा खराब हो गए।

एक और कहानी 23 साल की सावित्री की सामने आई है। सावित्री की शादी होने वाली थी। दिल्ली के हिंसा से उसकी शादी रोकने का फैसला हुआ। क्योंकि सावित्री मुस्लिम बहुल इलाके में रहती है। ऐसे में मुस्लिम लड़कों ने शादी का सारा भार अपने कंधे पर ले लिया। उनके पहरेदारी में सावित्री की शादी संभव हो सकी।

सावित्री का घर सबसे ज्यादा दंगा प्रभावित इलाका मतलब चंदबाग में है। सावित्री की शादी 25 फरवरी (मंगलवार) को होना तय हुआ था। दंगे की बात सुनकर सावित्री फूट-फूट कर रोने लगी। ऐसे हालात में शादी होना संभव नहीं था। उसके पिता ने शादी को आगे टालने का फैसला किया। इस बात की जानकारी जब मुस्लिम पड़ोसी परिवार को लगी तो वो आगे आए।

सावित्री के पिता ने कहा कि जब वो अपने घर की छत पर गए तो आसपास का मंजर देखर उन्हें डर लगने लगा। हालांकि, उनके मुस्लिम पड़ोसी दूल्हे और दुल्हन को आशीर्वाद देने के लिए जुट चुके थे। पड़ोसियों की देख-रेख में ही सावित्री और गुलशन की शादी हुई। इसके बाद दोनों को छोड़ने के लिए मुस्लिम परिवार बाहर तक आए। वहीं सावित्री के पड़ोसियों का कहना है कि इस इलाके में सभी लोग प्यार से रहते हैं। हिंदू-मुसलमान दोनों एक-दूसरे के खुशी और गम में शरीक होते हैं। यही वजह है कि ऐसे खतरनाक हालात में भी सावित्री की शादी संभव हो पाई

हाजी नूर मोहम्मद सऊदी अरब में काम करते हैं। लेकिन उनका परिवार दिल्ली के यमुना विहार इलाके में रहता है। उनका पूरा परिवार दंगे में फंस गया। जब उनके परिवार वालों ने उन्हें फ़ोन कर यहां की हालत से अवगत कराया तो नूर मोहम्मद परेशान हो गए। मदद के लिए अपने रिश्तेदारों को फ़ोन करने लगे। लेकिन यहां की हालत इतनी खराब थी कि उनका कोई भी रिश्तेदार इलाके में जाकर परिवार को निकालने की स्थिति में नहीं था। फिर उन्होंने अपने दोस्त पूरन चुघ को फोन किया। पूरण ने भी बिना वक्त गंवाए अपनी कार निकाली और नूर मोहम्मद के घर पहुंच गए। चुघ ने नूर के परिवार के साथ-साथ उनके यहां किराए पर रहने वाले एक परिवार को भी वहां से निकाला और उनके रिश्तेदारों के घर सुरक्षित पहुंचाया।

एक और कहानी है जो कि पुलिस की है। करावल नगर के पास गाजियाबाद के लाल बाग इलाके के नजदीक पुलिस की बैरिकेडिंग लगी थी। अचानक दोपहर में उपद्रवी नारेबाजी करते हुए लोगों के घरों के दरवाजे पीटने लगे। एक घर के भीतर परिवार खुद को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा था। अचानक कार, ई रिक्शा, बाइक और स्कूटी पर सवार कुछ युवक वहां पहुंच गए। घर के दरवाजे खटखटाए पर अंदर से किसी की भी आवाज नहीं आई तो फिर भी लोगों ने घर में लगी खिड़की के शीशे तोड़ने शुरू कर दिए। पुलिस के पास महज कुछ ही सेकेंड थे परिवार को बचाने के लिए। गाजियाबाद के एसपी (ग्रामीण) नीरज कुमार जादौन के पास बॉर्डर चेकप्वाइंट का चार्ज था। उन्होंने दिल्ली पुलिस और यूपी पुलिस के सीमा के बारे में सोचने की बजाए तुरंत कार्रवाई की। वह सीमा पारकर भीड़ की तरफ आगे बढ़े। करीब 30 अन्य पुलिसकर्मी इस दौरान उनके साथ कगे बढ़े। इन लोगों के पास एंटी रॉयट के साजो सामान भी थे। पुलिस ने लाठीचार्ज की। जिससे आए हिंसक लोग भाग खड़े हो गए।

दिल्ली हिंसा में ऐसे कई फरिश्ते सामने आए और लोगों की जान बचाई। प्रेमकांत जिसने मुस्लिम परिवार को बचाने के लिए खुद को आग के हवाले कर दिया। वहीं हिन्दुओं को बचाने के लिए हासिम और इरफ़ान जैसे लोग सामने आकर खड़े हो गए और दंगाईयों से कहा कि उन्हें छुने से पहले उनकी लाशों से गुजरना होगा।

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