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कुछ बड़ा करने के फेर में हैं नीतीश कुमार

बिहार के सुशासन बाबू नीतीश कुमार भले ही जोड़-जुगत के सहारे मुख्यमंत्री पद पर काबिज होने में एक बार फिर सफल रहे हैं। हालिया संपन्न विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी जदयू के बेहद निराशाजनक प्रदर्शन ने उन्हें खासा नर्वस कर दिया है इतना नर्वस, इतनी बेचैनी कि जदयू राष्ट्रीय कार्यकारिणी के अंतिम दिन 27 दिसंबर को उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे डाला। आज जदयू की कमान नीतीश कुमार के दशकों से विश्वसनीय साथी रामचंद्र प्रसाद सिंह के हाथों में दे दी गई है। आरसीपी सिंह पूर्व में नीतीश बाबू के केंद्र में रेल मंत्री रहते उनके निजी सचिव रह चुके हैं। नीतीश कुमार के बिहार का मुख्यमंत्री बनते ही आरसीपी सिंह ने भी उत्तर प्रदेश सरकार को अलविदा कहें अपना तबादला बिहार में करा दिया था। वे लंबे समय तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रमुख सचिव पद पर रहे हैं। फिर एक दिन सरकारी सेवा से त्यागपत्र देकर जदयू में शामिल हो गए। जुलाई 2010 में नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा सदस्य बना डाला और अब ठीक दस साल बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज कर यकायक ही आरसीपी सिंह को जदयू का अध्यक्ष बना नीतीश कुमार ने न केवल सबको चौंकाने का काम किया है, बल्कि अपने सहयोगी दल भाजपा में ही भारी बेचैनी पैदा कर डाली है।

भाजपा से अलगाव की तरफ उठाया गया पहला कदम

नीतीश कुमार निःसंदेह कुछ ऐसा करने की रणनीति बना रहे हैं जिससे बिहार में जदयू की खोई जमीन वापस पाने के साथ-साथ भाजपा के राज्य में लगातार हो रहे विस्तार को रोका जा सके। सुशासन बाबू की राजनीति को समझने वाले भलीभांति जानते हैं कि नीतीश कुमार जदयू के विधानसभा चुनाव में निराशाजनक परफॉर्मेंस को भाजपा की देन मानते हैं। यदि भाजपा समय रहते चिराग पासवान को एनडीए गठबंधन से बाहर जाने से रोक लेती तो संभव था कि जदयू बिहार में तीसरे पायदान में न होती।
चिराग पासवान को आगे कर भाजपा ने ऐसा राजनीतिक पासा फेंका जिससे स्वयं तो भाजपा राज्य विधानसभा में सबसे बड़ा दल बन गई, नीतीश कुमार की पार्टी तीसरे नंबर पर जा पहुंची। राज्य में अपनी सत्ता बनाए रखने की नियत से भले ही भाजपा में नीतीश कुमार को सीएम बनाए रखा, लेकिन कब तक यह एडेस्टमेंट जारी रहेगा कह पाना कठिन है। जिस अंदाज में अरुणाचल प्रदेश में भाजपा ने जदयू के छह विधायकों से पाला बदल करवाया है उससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि जदयू-भाजपा गठबंधन तनाव में है और आने वाले समय में बिहार की राजनीति बड़ा उलटफेर देखने जा रही है।

 

क्या होगा नीतीश का अगला कदम

राजनीतिक पंडितों का आकलन है कि नीतीश जल्द ही मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने का मन बना चुके हैं। बहुत संभव है कि कुछ समय तक नीतीश कुमार भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देते रहे लेकिन माकूल समय आने पर वे सरकार गिरा देंगे। जदयू के सूत्रों की मानें तो यदि नीतीश कुमार सीएम पद त्यागते हैं तो अगली सरकार में जदयू की हिस्सेदारी नहीं होगी। यानी जदयू सरकार को बाहर से समर्थन देती रहेगी, उसका हिस्सा नहीं बनेगी।

 

लवजेहाद, सीएए और कृषि कानूनों का हवाला दे जदयू एनडीए छोड़ देगा


अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि को नीतीश कुमार बहुत सहेज कर रखते आए हैं। भाजपा को संग लेकर तेरह बरस तक बिहार में सत्ता संभालते रहे नीतीश कुमार ने कभी भी हिंदुत्व की वकालत नहीं की। सीएए के मुद्दे से भी उन्होंने दूरी बनाते हुए अल्पसंख्यकों को साधे रखने का प्रयास किया है।

ऐसे में जब कभी भी भाजपा अथवा केंद्र सरकार सीएएए की कवायद शुरू करेगी नीतीश कुमार को एनडीए छोड़ने और बिहार में सरकार गिराने का अवसर मिल जाएगा। इतना ही नहीं कृषि कानूनों को लेकर किसान और केंद्र सरकार से टकराव को भी नीतीश एक बड़ा मुद्दा आने वाले कुछ ही दिनों में बना सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तो बिहार में राजनीतिक अस्थिरता आनी तय है। इस बीच पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने लवजेहाद पर भाजपा शासित राज्यों में बन रहे कानून को नफरत फैलाने वाला कदम कहकर स्पष्ट कर डाला है कि जदयू इस प्रकार के कानूनों का समर्थन कतई नहीं करेगी। कुल मिलाकर जदयू-भाजपा गठबंधन अब ज्यादा समय तक चलता नजर नहीं आ रहा है।

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