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फिर बाहर निकल आया जिन्न राफेल का

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने रक्षा सौदों को लेकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए नारा उछाला था ‘चौकीदार चोर है’। स्मरण रहे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने पहली बार यह नारा बुलंद किया था। उन्होंने इस नारे को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी जमकर इस्तेमाल किया। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस को भाजपा से सत्ता छीनने में सफलता मिली थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का दिया नारा ‘मैं भी चौकीदार‘ इस नारे पर भारी पड़ गया। रही-सही कसर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस डील को सही ठहराने के चलते पूरी हो गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को बड़ी राहत दी, लेकिन अब एक बार फिर से राफेल का जिन्न बोतल से बाहर निकल चौकीदार की नीयत पर शंका पैदा कर रहा है

 

क्या ‘‘चौकीदार’’ तक पहुंचेगी आंच?

 

राफेल का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है और मोदी सरकार के लिए परेशानी का कारण बनता नजर आ रहा है। राफेल डील को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी मोदी सरकार पर कई बार आरोप लगा चुके हैं। आरोप है कि देश की सरकार ने अपने करीबी पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए महंगे दामों पर डील की है। धीरे-धीरे मामला शांत होने लगा था या यूं कहिए कोरोना ने सब भुला दिया था। लेकिन अब फ्रांस के एक मीडिया पब्लिकेशन की ओर से किए गए दावे ने भाजपा की रातों की नींद उड़ा दी है।

दरअसल, इस पब्लिकेशन ने दावा किया है कि फ्रांसीसी कंपनी ‘डसॉल्ट’ जो राफेल बनाती है उसने भारत में डील कराने वाले एक बिचौलिए को एक मिलियन यूरो गिफ्ट दिए थे। फ्रांस की एंटी करप्शन एजेंसी एएफए द्वारा ‘डसाॅल्ट एविएशन्य’ कंपनी के खातों के ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर ‘मीडिया पार्ट पब्लिकेशन ने राफेल सौदे में कमीशनखोरी को लेकर बड़ा पर्दाफाश किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक 50 रेप्लिका मॉडल्स बनाने के लिए दी गई यह धनराशि एक भारतीय रक्षा कंपनी को दी गई थी। यह कंपनी पहले से ही भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी हुई है। मीडिया पार्ट की रिपोर्ट से भारतीय राजनीति गरमाने लगी है। सरकार की मुसीबतें कम न थी कि सीजेआई बोबडे ने भी राफेल सौदे में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए दायर एक याचिका पर सुनवाई की अनुमति दे दी है।

सौदे में भ्रष्टाचार को लेकर फ्रेंच वेबसाइट ‘मीडिया पार्ट’ के खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट में एक नई जनहित याचिका दायर की गई है। वकील एमएल शर्मा ने याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट से स्वतंत्र जांच की मांग की है। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने 12 अप्रैल को कहा कि अदालत मामले की सुनवाई दो सप्ताह बाद करेगी। हालांकि उन्होंने इसके लिए किसी तारीख का उल्लेख नहीं किया। लेकिन इस बीच ये जानना भी जरूरी है कि आखिर राफेल डील पर फ्रेंच ‘मीडिया पार्ट के खुलासे से भाजपा की मुसीबतें कैसे बढ़ सकती हैं और क्या है राफेल डील के पीछे की सच्चाई?

आइए, हम आपको राफेल की फ्रांस से भारत आने तक की पूरी यात्रा को विस्तार से बताने का प्रयास करते हैं। लेकिन इससे पूर्व आप दो-तीन तारीखों को लेकर स्पष्ट हो जाइए। प्रधानमंत्री मोदी 10 अप्रैल 2015 को फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद से मुलाकात करके राफेल डील का ऐलान करते हैं।

इसी के 16 दिन पहले यानी 25 मार्च 2015 को राफेल विमान बनाने वाली कंपनी डसॉल्ट एविएशन के सीईओ मीडिया से बात करते वक्त हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के चेयरमैन का जिक्र करते हैं। वह कहते हैं कि ‘एएचएल चेयरमैन को सुनने के पश्चात अब आप मेरे संतोष की कल्पना कर सकते हैं। हम अपनी जिम्मेदारियों को साझा करने पर सहमत हैं। हम रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) द्वारा तय की गई प्रक्रिया को लेकर प्रतिबद्ध हैं, परंतु मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस कॉन्ट्रैक्ट को पूरा करने और उस पर हस्ताक्षर करने का काम जल्दी ही हो जाएगा।

ध्यान रहे बातचीत की पूरी प्रक्रिया यूपीए के समय जारी रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल (आरएफपी) के हिसाब से ही चल रही है। यानी कि नया कुछ भी नहीं हुआ है। ये वो वक्त है जब प्रधानमंत्री की यात्रा को लेकर तैयारियां चल रही थी। फिर 16 दिन बाद प्रधानमंत्री मोदी भारत से फ्रांस के लिए रवाना होते हैं। यानी कि अब तक इस डील की प्रक्रिया में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड कंपनी भी सम्मिलित है, तभी तो राफेल कंपनी के चेयरमैन भी उनका नाम लेते हैं। हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स सार्वजनिक क्षेत्र यानी की एक सरकारी कंपनी है। इस कपंनी का रक्षा उपकरणों के उत्पादन क्षेत्र में कई दशकों का अनुभव है।

यात्रा के दिन अब बहुत करीब आते जा रहे हैं। दो दिन पूर्व यानी 8 अप्रैल 2015 को तब के विदेश सचिव एस जयशंकर मीडिया से बात करते हुए कहते हैं कि ‘राफेल को लेकर मेरी समझ यह है कि फ्रेंच कंपनी, हमारे रक्षा मंत्रालय और हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड के बीच चर्चा  चल रही है। ये सभी टेक्निकल और डिटेल चर्चा है। नेतृत्व के स्तर पर जो यात्रा होती है उसमें हम रक्षा सौदों को शामिल नहीं करते हैं। वो अलग ही ट्रैक पर चल रहा होता है।’ आपने अभी तक देखा कि 25 मार्च से लेकर 8 अप्रैल 2015 तक विदेश सचिव और राफेल बनाने वाली कंपनी ‘डसॉल्ट एविएशन’ के सीईओ हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का बार-बार नाम ले रहे हैं। यानी कि इससे यह पता चल रहा है कि यह कंपनी इस डील का ही एक पार्ट है। डील के अंतर्गत स्थानीय स्तर पर बनाए जाने वाले विमान के पुर्जे इत्यादि बनाने का काम इसे ही मिलना है। इसे ‘ऑफसेट’ कहा जाता है। इसका अर्थ है मुख्य सौदे संग जुड़ा सौदा।

अब यहां पर एक और तथ्य सामने आता है जिस पर आप अपनी नजर बनाए रखें। मार्च 2014 में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड और डसॉल्ट एविएशन के मध्य एक समझौता हो चुका होता है कि 108 लड़ाकू विमान भारत में ही बनाए जाएंगे। इसके लिए उसे लाईसेंस और टेक्नोलॉजी भी मिलेगी। यानी कि 70 फीसदी काम हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का होगा और बाकी का 30 फीसदी काम डसॉल्ट करेगी।

10 अप्रैल को जब प्रधानमंत्री मोदी इस डील का ऐलान करते हैं तब इस सरकारी कंपनी का नाम पूरी तरह से कट जाता है। यह कंपनी पूरी प्रक्रिया से गायब हो जाती है और एक नई कंपनी सामने आ जाती है, जिसके अनुभव पर सवाल खड़ा है, जिसके कुछ ही दिन पहले बनाए जाने की बात उठी है, उसे काम मिल जाता है। अब यहां पर प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा यह आरोप लगाते हैं कि 60 साल की अनुभवी कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स (एचएएल) को सौदे से बाहर कर दिया जाता है और एक ऐसी कंपनी अचानक इस सौदे में प्रवेश करती है जिसका कहीं जिक्र ही नहीं था। उन्हीं की प्रेस रिलीज से इन घटनाओं का सिलसिला आपके लिए पेश करने का प्रयास किया है। आप ऑफिसियल साइट पर प्रेस रिलीज भी पढ़ सकते हैं। अब इस जगह आप रुक जाइए। अब चलिए चलते हैं वहां जहां राफेल विमान की बात शुरू होती है।

भारतीय वायुसेना ने 2007 में सरकार को अपनी जरूरत बताई थी और उसी आधार पर यूपीए सरकार ने एक आरएफपी तैयार किया था कि वह 167 मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट (एमएमआरसी) एयरक्राफ्ट खरीदेगी। इसके लिए जो टेंडर जारी किया जाएगा उसमें यह सब भी होगा कि शुरुआती खरीद की लागत क्या होगी, विमान कंपनी भारत को टेक्नोलॉजी देगी और भारत में उत्पादन के लाईसेंस देगी। इसके बाद टेंडर जारी हो जाता है और लड़ाकू विमान बनाने वाली 6 कंपनियां उसमें हिस्सा ले लेती हैं। अब सभी विमानों के परीक्षण और कंपनियों से बातचीत के पश्चात भारत की वायुसेना 2011 में अपनी पसंद बताती है कि दो कंपनियों के विमान उसकी जरूरत के करीब हैं। वह दो हैं एक डसॉल्ट एविएशन का राफेल और दूसरा यूरोफाइटर्स का विमान। 2012 के टेंडर में डसॉल्ट द्वारा सबसे कम रेट दिया गया था और इसी के आधार पर भारत सरकार और डसॉल्ट कंपनी के बीच इस मुद्दे पर वार्ता  शुरू हुई।

तो अब सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी ने जो डील की है वो पहले से चली आ रही प्रक्रिया और उसकी शर्तों के अनुसार थी या फिर उसमें भी बदलाव किया गया? और अगर बदलाव हुआ तो क्यों? अब सवाल यह उठते हैं कि क्या भारतीय वायुसेना ने कोई नया प्रस्ताव दिया था? या फिर क्या डसॉल्ट कंपनी द्वारा नए दरों यानी कम दरों पर सप्लाई का कोई नया प्रस्ताव दिया गया था?

ऐसा इसलिए क्योंकि 10 अप्रैल 2015 के साझा बयान में जिस डील का जिक्र किया गया है वो 2012 से 8 अप्रैल 2015 तक चली आ रही प्रक्रिया और शर्तों से बिल्कुल ही अलग थी। अब आप यह सोच रहे होंगे कि हमने 8 अप्रैल की बात क्यों की? हमने 8 अप्रैल की बात इसलिए कही क्योंकि इसी दिन विदेश सचिव एस जयशंकर कह रहे हैं कि बातचीत तो एक पुरानी प्रक्रिया का हिस्सा है और उसमें हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड सम्मिलित है। अब एक दिलचस्प मोड़ यह आता है कि यह कंपनी दो दिन बाद इस डील से बाहर हो जाती है। अब ऐसे में बहुत से सवाल खड़े होते हैं, जैसे एचएएल को डील से बाहर करने का फैसला कब हुआ, किस स्तर पर हुआ, कौन-कौन इसमें शामिल था, क्या वायुसेना की इसमें कोई राय ली गई थी?

ऐसा होता तो विदेश सचिव एस जयशंकर एचएएल की जगह रिलायंस डिफेंस लिमिटेड का नाम लेते ही। यानी 25 मार्च को डसॉल्ट एविएशन के सीईओ, एचएएल की जगह रिलायंस डिफेंस का नाम लेते। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण का कहना है कि भारतीय बैंकों का रिलायंस डिफेंस पर 8,000 करोड़ का कर्ज है। कंपनी घाटे में है। इतना अनुभव भी प्राप्त नहीं है, क्योंकि इनकी कंपनी भारतीय नौ सेना को एक जहाज बनाकर देने का वादा पूरा नहीं कर पाई। फिर अनिल अंबानी की इस कंपनी पर ये दरियाादिली क्यों की गई?

इस सवाल पर अनिल अंबानी की कंपनी ने अपने जवाब में कहा कि हमें अपने तथ्यों को सही कर लेना चाहिए। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत कोई भी लड़ाकू विमान नहीं बनाया जाना है, क्योंकि सभी विमान फ्रांस से फ्लाई अवे कंडीशन में आने हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत में एचएएल कंपनी के अलावा किसी भी कंपनी को लड़ाकू विमान बनाने का अनुभव नहीं है। यदि इस तर्क के हिसाब से चलें तो इसका मतलब यह होगा कि हम जो अभी हैं उसके अतिरिक्त कभी कोई नई क्षमता नहीं बना पाएंगे। साथ ही रक्षा से जुड़े 70 प्रतिशत हार्डवेयर को आयात करते रहेंगे।

तो क्या भारत सरकार ने एक नई कंपनी को प्रमोट करने के लिए एक अनुभवी कंपनी को इस सौदे से ही बाहर कर दिया है? क्या वे रक्षा से जुड़े 70 फीसदी हाडज्वेयर का आयात ही करते रहेंगे, बल्कि अनिल अंबानी को तो यह बताना चाहिए कि वो कौन-कौन से हाडज्वेयर बना रहे हैं जिसके कारण भारत को आयात नहीं करना पड़ेगा। क्या उन्हें पता नहीं कि इस डील के तहत ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी नहीं हुई है। अब इससे तो यह समझ आता कि ‘डसॉल्ट्’ ने अपनी तकनीक भारतीय कंपनी से साझा करने का कोई वादा ही नहीं किया है। अब इस पर भी प्रशांत भूषण की ओर से सवाल उठाए गए हैं कि यूपीए के समय एक ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी देने की बात हुई थी, वो बात अचानक गायब क्यों हो गई?

भारत सरकार की तो बातें ही निराली हैं। अब जब यह मामला राहुल गांधी ने उठाया तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण का बयान सामने आता है जिसमें वह कहती हैं कि देश के सामने सब रख देंगे। पर ये क्या बाद में वह अपनी ही बात से मुकर जाती हैं और यह कहने लगती हैं कि फ्रांस से गुप्तता का समझौता हुआ है। हालांकि 13 अप्रैल 2015 को दूरदर्शन को अपना इंटरव्यू देते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर यह बता चुके थे कि 126 एयरक्राफ्ट की कीमत 90,000 करोड़ होगी। अब देखने वाली बात तो यह है कि एक रक्षा मंत्री कह रहे हैं कि 90,000 करोड़ की डील है और एक रक्षा मंत्री कह रही हैं कि कितने की डील है, हम नहीं बताएंगे।

फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकोइस हॉलैंडे के साथ प्रधानमंत्री मोदी

अब सवाल यह उठता है कि जब संसद में रक्षा राज्य मंत्री दाम के बारे में बता चुके थे तो फिर दाम बताने में हर्ज क्या है? आरोप है कि जब टेक्नोलॉजी नहीं दे रहा है तब फिर इस विमान का दाम प्रति विमान 1000 करोड़ ज्यादा कैसे हो गया? यूपीए के वक्त वही विमान 700 करोड़ में आ रहा था। तो अब आरोप है कि एक विमान के 1600-1700 करोड़ किसके फायदे के लिए दिए जा रहे हैं। इसी साल फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत आए थे। उन्होंने ‘इंडिया टुडे’ चैनल से कहा कि भारत सरकार अगर चाहे तो विपक्ष को विश्वास में लेने के लिए कुछ बातें बता सकती है। वे बुरा नहीं मानते। आप इस इंटरव्यू को खुद इंटरनेट पर भी खोज सकते हैं। अब यहां फिर से आपको 5 मार्च 2015, 8 अप्रैल 2015 और 10 अप्रैल 2015 की तारीखें याद रखनी होंगी। प्रशांत भूषण ने आरोप लगाया कि 28 मार्च 2015 को, अडानी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नोलॉजी लिमिटेड और रिलायंस डिफेंस लिमिटेड कंपनी इस प्रक्रिया में शामिल हैं।

बेहद अजीब बात है कि जो खेल 28 मार्च को खत्म हो गया उसके खिलाड़ी से लेकर मैदान तक का भारत के विदेश सचिव को कुछ ज्ञात नहीं। वो तो एचएएल का नाम ले रहे थे। यानी उन्हें कुछ जानकारी नहीं थी कि आखिरकार हो क्या रहा है। जब संसद में रक्षा राज्य मंत्री दाम के बारे में बता चुके थे तो फिर दाम बताने में क्या कैसी हिचक थी? आरोप तो यह भी लगे कि जब टेक्नोलॉजी ही साझा नहीं की जा रही है तो इतना दाम क्यों ? विमान का दाम प्रति विमान 1000 करोड़ ज्यादा कैसे हो गया? इस तरह के कई सवाल हैं, लेकिन जवाब नहीं। परंतु अपने प्रेस रिलीज में रिलायंस डिफेंस कंपनी एक और आरोप के जवाब में यह कहती है कि विदेशी वेंडर्स  के भारतीय पार्ट्स के चयन में रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका नहीं है। 2005 से अभी तक 50 ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट साइन हो चुके हैं, सब में एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है। साथ ही रिलायंस डिफेंस ने इसके जवाब में कहा है कि इस सवाल का जवाब रक्षा मंत्रालय ही सबसे सही दे सकता है।

तो इस पर प्रशांत भूषण कहते हैं कि ऑफसेट कंपनी के लिए कुछ अलग से रूल है। अब आप यह तो समझ ही गए होंगे कि यहां रिलायंस डिफेंस कंपनी इसी ऑफसेट कंपनी के दायरे में आती है। तो वहीं प्रशांत कह रहे हैं कि ऐसी कंपनी के मामले में रक्षा मंत्री ही साइन करेंगे। साथ ही अनिल अंबानी की कंपनी कहती है कि रक्षा मंत्रालय की कोई भूमिका ही नहीं होती कि विदेशी वेंडर्स (विमान कंपनी) किस भारतीय कंपनी को अपना साझीदार चुनती है?

तो क्या सच में रक्षा मंत्रालय की इसमें कोई भी भूमिका नहीं है? लेकिन प्रशांत भूषण ने तो ऑफसेट नियमावली का पूरा आदेश पत्र दिया है। अब सवाल उठता है कि अनिल अंबानी को यह कैसे पता कि अभी तक 50 ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट साइन हो चुके हैं और सभी में एक ही प्रक्रिया अपनाई गई है? तो क्या रक्षा मंत्रालय के हिस्से का जवाब रक्षा मंत्रालय को नहीं देना चाहिए?

अब इसके बाद रिलायंस डिफेंस रक्षा मंत्रालय के बारे में एक और बात कहती है। वह कहती है कि ये समझना बेहतर होगा कि डीपीपी-2016 के अनुसार विदेशी वेंडर को इस चुनाव की सुविधा है कि वो ऑफसेट क्रेडिट्स के दावे के समय अपने ऑफसेट पार्ट्स का ब्योरा दे सके। इस मामले में ऑफसेट ओब्लिगेशंस सितंबर 2019 के बाद ही ड्यू होंगी। तो इसलिए ये संभव है कि रक्षा मंत्रालय को डसॉल्ट से उसके ऑफसेट पार्ट्स के बारे में कोई औपचारिक जानकारी न मिली हो। कमाल है! अनिल अंबानी को सब कुछ पता है उन्हें यह भी पता है कि रक्षा मंत्रालय में 50 ऑफसेट एक ही तरह से डील हुए हैं। साथ ही यह भी पता है कि उनकी डील के बारे में रक्षा मंत्रालय को कुछ पता ही न हो। एचएएल को बाहर किए जाने पर रिलायंस डिफेंस की प्रेस रिलीज में यह जवाब मिलता है कि एचएएल 126 एमएमआरसीए प्रोग्राम के तहत नामांकित प्रोडक्शन एजेंसी थी जो कभी कॉन्ट्रैक्ट की स्टेज तक पहुंची ही नहीं थी।

परंतु आपने शुरू में पढ़ा होगा कि 25 मार्च 2015 को डसॉल्ट एविशन कंपनी के सीईओ, एचएएल कंपनी के चेयरमैन का शुक्रिया कर रहे हैं और यही नहीं 8 अप्रैल 2015 को विदेश सचिव भी एचएएल के प्रक्रिया में बने रहने की बात कहते हैं। तो अगर यह कंपनी कॉन्ट्रैक्ट की स्टेज तक पहुंची ही नहीं तो डील के दो दिन पहले तक बार-बार इसका नाम क्यों लिया जा रहा है? तो अब सवाल यह उठता है कि रिलायंस डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट के स्टेज पर कैसे पहुंची, कब पहुंची और क्या उसने इन सवालों का जवाब दिया है।

भला यह कैसी डील हुई कि अप्रैल 2015 से अगस्त 2018 आ गया और अभी तक रक्षा मंत्रालय को कोई भी जानकारी नहीं है, तो क्या डसॉल्ट एविएशन ने कोई जानकारी ही नहीं दी है, फिर भी रिलायंस को सब पता है कि रक्षा मंत्रालय को क्या जानकारी है और क्या नहीं। यही सरकार कहती है कि हम इस डील के संबंध में कोई भी बात नहीं बता सकते। ऐसा इसलिए क्योंकि यह देश की सुरक्षा का सवाल है और गुप्तता का समझौता है। दूसरी तरफ रिलायंस डिफेंस कंपनी चार पन्ने का प्रेस रिलीज जारी कर रही है तो सिर्फ मोदी जी की सरकार पर ही गुप्तता का समझौता लागू होता है, डील में हिस्सेदार कंपनी पर नहीं।

अब इतना सब होने के बाद तो रक्षा मंत्रालय का जवाब देना तो बनता है। अगर जवाब रक्षा मंत्री नहीं दे सकती तो कोई और मंत्री दे दें। या तो कोई ब्लॉग लिख दे, या फिर कोई ट्वीट कर दे। वैसे भी इस सरकार की यही तो खूबी है, क्योंकि जब कृषि कानून पर फैसला होता है तो गृहमंत्री बोलते हैं और जब रक्षा मंत्रालय से संबंधित कोई फैसला होता है तो कानून मंत्री बोलते हैं।

ऐसे में रिलायंस डिफेंस कहती है कि उसे 30,000 करोड़ का कोई ठेका नहीं मिला है। डसॉल्ट एविएशन किस ऑफसेट पार्टनर को कितना काम देगी यह तो अभी तय ही नहीं हुआ है। इसके लिए डसॉल्ट एविएशन ने 100 से अधिक भारतीय कंपनियों की ओर इशारा किया है। इसमें से दो कंपनियां हैं जो सरकारी हैं एचएएल और भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड। ताजा खुलासे के बाद लगता है जैसे कि डसॉल्ट एविएशन ने आंख मारकर इशारा किया है या सीटी बजाई है, खतरा सामने है, आगे कुआं पीछे खाई है।

2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसी रक्षा सौदों को लेकर सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए नारा उछाला था ‘चौकीदार चोर है’ स्मरण रहे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने पहली बार यह नारा बुलंद किया था। उन्होंने इस नारे को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी जमकर इस्तेमाल किया। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की भाजपा से सत्ता छीनने में सफलता मिली थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में लेकिन प्रधानमंत्री मोदी का दिया नारा ‘मैं भी चौकीदार’ इस नारे पर भारी पड़ गया। रही-सही कसर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस डील को सही ठहराने के चलते हो गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को बड़ी राहत दी, लेकिन अब एक बार फिर से राफेल का जिन्न बोतल से बाहर निकल चौकीदार की नीयत पर शंका पैदा कर रहा है।

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