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फिर दहशत के साए में जे एंड के

सरकारों द्वारा देश को 32 साल में बहुत गुमराह किया गया। कहा गया हालात सुधर गए हैं। सब सामान्य है। पर्यटन बढ़ गया है, फिल्म वाले आ रहे हैं, अब शूटिंग्स होंगी। कश्मीर का मिजाज अब बदल गया है। लेकिन बदलाव नजर नहीं आ रहा है। अब सवाल यह है कि सरकार को क्या करना चाहिए? सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया और अनुच्छेद 370, 35ए तो हटा दिया। लेकिन उसके बाद वह बैठ गई चाय-पानी पीने पिलाने में। स्ट्रक्चरल चेंज नहीं किए। लिहाजा स्थिति जस की तस है

जम्मू-कश्मीर को लेकर अक्सर एक पंक्ति याद आती है वो है ‘गर फिरदौस बर रूये जमी अस्त/हमी अस्तो हमी अस्तो हमी अस्त’ यानी धरती पर अगर कहीं स्वर्ग है, तो यहीं है, यहीं है। कश्मीर की सुंदरता को लेकर लिखे गए ये शब्द आपने जरूर पढ़े या सुने होंगे। लेकिन 90 के दशक के इस स्वर्ग को अब नजर लग गई है। क्योंकि अब कश्मीर जन्नत-मय्यत और जहन्नुम के बीच से गुजरता लाल कश्मीर बन चुका है।

आतंकियों की गोली से मरने वालों के परिवारों के मन में कई सवाल हैं जिनमें से एक अहम सवाल है कि आखिर उनकी गलती क्या है? जो उन्हें अपने लोगों को रोज मरते देखना पड़ रहा है। कश्मीर जन्नत से जेहनुम बन गया है क्योंकि लगातार हो रही हत्याओं से गैर कश्मीरी मुस्लिम आबादी और बाहर के लोग डर के साए में सांस ले रहे हैं या यूं कहें कि उनकी मौत कब आ जाए उन्हें भी नहीं पता?
दरअसल, बीते एक हफ्ते के भीतर कश्मीर में 7 लोगों की हत्या से आम लोग खौफ के साये में हैं। किसी राज्य में हत्या होना कोई बड़ी बात जैसा नहीं है। लेकिन हत्या किस तरह से हो रही है ये बड़ी बात है। अब आतंकी लोगों की पहचान देखकर चुन-चुन कर मौत की घाट उतार रहे हैं।
ऐसा ही कुछ देखने को मिला 7 अक्टूबर को जब श्रीनगर के ईदगाह इलाके में तीन आतंकवादी एक सरकारी स्कूल के अंदर घुस गए। पहले उन्होंने सभी स्टाफ का पहचान पत्र देखकर पुख्ता किया कि कितने लोग गैर कश्मीरी मुसलमान हैं। जब आतंकवादियों को चेकिंग के बाद पता चला कि स्कूल प्रिंसिपल, 44 वर्षीय सुखविंदर कौर कश्मीरी सिख और उनके सहयोगी दीपक चंद कश्मीरी पंडित हैं तो उन्हें अलग कर गोलियों से भून दिया गया।
इसी दिन यानी 5 अक्टूबर को ही उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा में मोहम्मद शफी लोन की भी इसी तरह हत्या की गई, जबकि 2 अक्टूबर को श्रीनगर के चट्टाबाल निवासी माजिद अहमद गोजरी और एसडी काॅलोनी के बटमालू में मोहम्मद शफी डार की भी गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई थी।

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जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने के बाद कुख्यात आतंकी संगठन आईएसआई बोखला गया है। घाटी में आतंक के नए चेहरे ‘द रेजिस्टेंस फोर्स’ के उभार के बीच जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का एक खतरनाक ट्रेंड चल पड़ा है। जो ट्रेंड है टारगेटेड किलिंग। जिसमें मारे जा रहे हैं सिविलियन और बाहरी या फिर कश्मीरी पंडित।
यह घटनाक्रम नया तो नहीं है। लेकिन ये उस जिहाद की कड़ी है, जो पहले से यहां चला आ रहा है। बताया जा रहा है कि अब नए सिरे से कश्मीर में खौफ पैदा किया जा रहा है। लेकिन कश्मीर तो पिछले 32 वर्षों से ही खौफ में है। हाल ही में हुई हत्याओं का उद्देश्य तो बचे हुए लोगों का सफाया कर देना है।
ताजा घटनाक्रम और लगातार जम्मू कश्मीर में दहशतगर्दों द्वारा आम नागरिकों पर हो रहे हमलों पर घाटी में ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के वरिष्ठ पत्रकार सलीम पंडित का कहना है कि ये नहीं है कि कश्मीरी पंडित को ही टारगेट कर रहे हैं। दे आर ट्राइंग टू गिव ए फीलिंग कि ये जो कश्मीर है, यहां कोई डिवेलपमेंट न हो जाए। अगर नजर डालें पिछले कुछ समय से हो रही हत्याओं पर तो इन हत्याओं को एक खास तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। पहले सरपंचों को निशाना बनाया गया। श्अजय पंडिता हों, अजय दर हों, कोई पुलिसकर्मी हो, कोई कश्मीरी पंडित हो, उसको मौत दोश्। कृष्णा ढाबा श्रीनगर में दुर्गा नाग रोड पर था, उसके मालिक को मार दिया गया। देखा जाए तो ये हत्याओं का जो सिलसिला शुरू हुआ है, इसका मकसद केवल दहशत फैलाना नहीं है। यह एक सन्देश है सरकार को। सरकारें चाहे जो भी कहें या करें लेकिन जब-जब सरकार कश्मीरी पंडितों का मुद्दा उठाएगी। तब-तब कश्मीर में एक-दो दिन में अलगाववादी इसका जवाब हत्याकांड से देंगे।
हालांकि ये एक बड़ी विडंबना है कि पिछले 32 वर्षों से केंद्र सरकारें इस अहम मुद्दे पर ध्यान देने से बचती आई हैं। मुख्य मुद्दा यह होना चाहिए कि 1990 के दशक से आज तक कश्मीर में जेनोसाइड हुआ है। धर्म के आधार पर सफाया किया गया बहुलतावाद का, सेक्युलरिज्म का, लोकतंत्र का। जो मूल नागरिक हैं, उनके अपनी जन्मभूमि में रहने के अधिकार पर वार किया गया। यानी हम ही हम रहें, तुम नहीं रहोगे। तुम रहोगे तो हमारी शर्तों पर रहोगे। कश्मीर में अब कुछ ऐसा ही हाल है।
सरकारों द्वारा देश को 32 साल में बहुत गुमराह किया गया। कहा गया हालात सुधर गए हैं। सब सामान्य है। पर्यटन बढ़ गया है, फिल्म वाले आ रहे हैं, अब शूटिंग्स होंगी। कश्मीर का मिजाज अब बदल गया है। लेकिन बदलाव नजर नहीं आ रहा है। अब सवाल यह है कि सरकार को क्या करना चाहिए? सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया  और अनुच्छेद 370 और , 35-ए तो हटा दिया। लेकिन उसके बाद वह बैठ गई चाय-पानी पीने पिलाने में। स्ट्रक्चरल चेंज नहीं किए। लिहाजा स्थिति जस की तस है।

अब भी कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियां दिन-प्रतिदिन ताकतवर होती जा रही हैं। उनको कोई डर नहीं क्योंकि वो इस बात को लेकर निश्चिंत हो चुके हैं कि सरकार 370 हटाने के बाद कुछ नहीं करने वाली, मैदान खुला है। कश्मीर के लोगों के मन में सवाल हैं कि क्या प्रधानमंत्री को एक बयान नहीं देना चाहिए था? गृह मंत्री को चिंता नहीं करनी चाहिए? देश के प्रधानमंत्री को मजबूत शब्दों में मेसेज देना चाहिए। ताकि कश्मीर यानी देश के स्वर्ग को जेह्हनुम बनने से रोका जा सके।

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