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रेलवे ट्रैक पर पैदल सफर कर रहे मजदूर बोले, साहब आपने वीडियो बना दी तो हमें पुलिस नहीं निकलने देंगी

देश में एक तरफ जहां कोरोना महामारी दिनों दिन अपना विस्तार कर रही है, वहीं पर इस मामले पर राजनीति भी होने लगी हैं। खासकर प्रवासी मजदूरों को घर वापसी पर के मामले पर। पांच दिन पहले जब केंद्र सरकार ने यह घोषणा की कि प्रवासी मजदूर अपने-अपने घर जा सकेंगे। इसके लिए उनको रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा और साथ ही सभी राज्य सरकारों ने इसके लिए नोडल अधिकारी भी नियुक्त कर दिए थे।

वहां ऑनलाइन सबको अपना परिचय सम्मिट करने के बाद फिर राज्य सरकार की तरफ से यात्रा करने के लिए अधिकृत किया जाना था। लेकिन राज्य सरकार की यह व्यवस्था ज्यादा टिक नहीं पाई। क्योंकि जिन प्रवासी मजदूरों को अपने घर जाना था उनके ज्यादातर रजिस्ट्रेशन ही नही हो पाए। इसके बाद कहा जाने लगा कि प्रवासी मजदूर अपने आसपास के थानों व चौकियों में जाकर पुलिसकर्मियों से नाम पता लिखवाए। इस के बाद ही उनको अपने गृह प्रदेश जाने की परमिशन मिलेगी।

लेकिन जब अधिकतर लोग पुलिस के पास पहुंचते तो पता चलता कि उन्हें पहले कोविड- 19 टेस्ट कराना जरूरी है कि कही वह कोरोना का शिकार तो नहीं है। इसके बाद टैस्टिंग के लिए जब प्रवासी मजदूरों ने निजी लैब का दरवाजा खटखटाया तो पता चला कि कोविड-19 का टेस्ट 4000 से लेकर 5000 तक में हो रहा है। जो मजदूर पिछले 2 महीने से बेसहारा है उनको 4000 से लेकर 5000 टेस्ट कराना बहुत मुश्किल हो रहा था। इसके बाद भी जैसे-तैसे पैसे की व्यवस्था करके वह टैस्टिंग कराने में कामयाब हो गए तो उन्हें घर वापसी का टिकट नहीं मिला।

कहने को तो केंद्र सरकार ने श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई है। जिसमें उन प्रवासी मजदूरों को घर वापसी कराई जा रही है जो लाकडाउन से कुछ दिन पहले ही दूसरे प्रदेशों में आए थे। इनमें सबसे ज्यादा मजदूर बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के हैं । यह मजदूर लॉकडाउन के 17 मई तक बढ़ने के बाद इतने बेचैन हो गए कि अब अपने अपने घरों को पैदल ही चल पड़े हैं।

मौसम में गर्मी भी इन्हें घर जाने से नहीं रोक पा रही है। 40 डिग्री का टेंपरेचर और ऊपर से सामान के सिर पर बड़े-बड़े बैग, कंधों पर बच्चे और साथ में पत्नियों को लेकर वह रेलवे ट्रैक से पैदल ही निकल चुके हैं। हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल ही रेलवे ट्रैक से कर रहे यह मजदूर अब घर के सफर पर निकल तो चुके हैं। लेकिन उनका यह सफर इतना आसान भी नहीं है।

‘दि संडे पोस्ट’ ने ऐसे मजदूरों को मुंबई-हावड़ा रेलवे ट्रैक पर गाजियाबाद और दादरी के बीच मारीपत रेलवे स्टेशन के पास रोका और उनसे आप बीती पूछी। इनमें ज्यादातर प्रवासी मजदूर बिहार के हैं जो पिछले दो से तीन दिन से दिल्ली से चले हुए हैं। यह प्रवासी मजदूर अभी कई दिनों तक पैदल चलने को मजबूर हैं। किसी को दो से ढाई हजार किलोमीटर का सफर तय करना है, तो कोई 3000 से भी ज्यादा किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए रेलवे ट्रैक पर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। दि संडे पोस्ट ने जब इनकी वीडियो बनानी चाहिए तो एक मजदूर ने मोबाइल को रोकते हुए फोटो खींचने और वीडियो लेने से मना करते हुए कहा, “साहब अगर आपने वीडियो बना कर डाल दी तो हमें पुलिस वाले इस रेलवे ट्रैक से भी नहीं निकलने देंगे।”

मतलब यह है कि मजदूरों में पुलिस का इतना डर है कि वह वीडियो या फोटो खींचने तक से मना कर रहे हैं । हालांकि इसके बाद वीडियो बनाई गई और कई मजदूरों से बात की गई । जिसमें मजदूरों ने बताया कि वह दिल्ली में रहते हैं। लेकिन दिल्ली में उन्हें ना खाना मिल रहा था और ना ही रहने को घर मिल रहा था । उनके पास पैसा था नहीं और जिन लोगों के मकान में किराएदारो के रूप में वह रह रहे थे उन्होंने पैसा ना मिलने पर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया । जबकि दिल्ली सरकार ने पिछले दो-तीन दिन से उनके खाने के लिए कोई इंतजाम नहीं किए थे। ऐसे में वह भूखे मरने लगे।

मजदूरों का कहना है कि भूखे मरने और कोरोना बीमारी के संक्रमण में आने के डरने उन्हें रेलवे ट्रैक पर पैदल चलने को मजबूर कर दिया। जब मजदूरों से श्रमिक स्पेशल ट्रेन की बात की गई तो उन्होंने कहा कि उस ट्रेन में जाने के लिए पैसे चाहिए जो उनके पास नहीं है। इसके साथ ही मजदूरों ने पहले ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन कराया था। लेकिन उससे भी उनका नंबर नहीं आया तो उन्होंने अपने आसपास के पुलिसकर्मियों को अपना नाम-पता लिखवाया। लेकिन इसके बावजूद भी जब कुछ नहीं हुआ तो वह अपने घरों को पैदल चलने को मजबूर हो गए।

याद रहे कि इस मामले पर विपक्ष ने हल्ला मचाया हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कल घोषणा कर दी थी कि प्रदेश की सभी पार्टी की इकाइयों के नेताओं को इस मामले पर मजदूरों की सहायता करनी होगी। उन्होंने मजदूरो को रेल में जाने के लिए फ्री में टिकट दिलवाने का भी वादा किया है। सोनिया गांधी के बाद उनकी पुत्री और कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी भी सरकार के खिलाफ मैदान में उतर गई है।

प्रियंका गांधी ने इस बाबत बकायदा ट्वीट किया और कहा कि रेल मंत्री पीएम केयर फंड में जब 151 करोड़ रुपए दे सकते हैं तो फिर मजदूरों को आपदा की इस घड़ी में नि:शुल्क यात्रा की सुविधा क्यों नहीं दी जा रही है। इसके साथ ही वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने कहा कि जो मजदूर पिछले 2 महीने से कमाई नहीं कर रहे हैं उन्हें टिकट का खर्चा उठाने को कहा जा रहा है।

इसे उन्होंने केंद्र सरकार की कमजोरी कहा। इसी के साथ बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने कहा कि बिहार में जब कोसी में बाढ़ आई थी तब उनके पिता रेल मंत्री थे। तब उन्होंने लोगों को उनके घर पहुंचाने के लिए ग्यारह सौ करोड़ का पैकेज दिया था। लेकिन अब केंद्र सरकार उन मजदूरों से पैसा ले रही है जिनके पास खाने को पैसा नहीं है।

मजदूरों से रेलवे का किराया लेने को लेकर कई जानकारियां सामने आ रही है। जिसमें कहा जा रहा है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन मजदूरों के लिए मुफ्त में यात्रा नहीं करा रहा है, बल्कि इसके लिए वह राज्य सरकारों से टिकट के पैसे ले रहा है। रेलवे राज्य सरकारों से पैसा लेगी। जबकि राज्य सरकार मजदूरों से पैसा लेंगे। इसमें सत्ता पक्ष का दावा है कि मजदूरों को सब्सिडी दी जा रही है। जिसमें 85% टिकट का किराया केंद्र सरकार देगी और 15% राज्य सरकार। इसी के साथ ही रेलवे 50 रूपये अतिरिक्त सरचार्ज के रूप में भी प्रवासी मजदूरों से यात्रा की एवज में ले रहा है। लेकिन सबसे बडी समस्या यह है कि मजदूरों को पैसा मिलना तो दूर पहले टिकट ही नहीं मिल पा रहे हैं।

इस मामले में 2005 के डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत प्रवासी मजदूरों से किराए का पैसा लेने की बात कही जा रही है। जिसको लेकर सरकार और विपक्ष में आपसे लड़ाई चल रही है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस मामले में सरकार का दावा मजबूत करने के लिए कह रहे हैं कि वह रेल से मजदूरों को लाएंगे, इसके लिए मजदूरों को फ्री का टिकट दिया जा रहा है। नीतीश कुमार कहते हैं कि बाद में जब मजदूर अपने क्षेत्र के रेलवे स्टेशन पर पहुंच जाएंगे तो उन्हें ब्लॉक तक ले जाया जाएगा। जहां उन्हें 21 दिन आइसोलेशन में रखा जाएगा। 21 दिन का आइसोलेशन पूरा करने के बाद आइसोलेशन होने के बाद उन्हें 500 घर जाने के लिए दिए जाएंगे।

इस बाबत जब गौतम बुद्ध नगर के जिला अधिकारी सुहास एलवाई से बात की गई तो उन्होंने तो इस मामले पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रवासी मजदूर ऐसा करके अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं। सुहास एलवाई ने कहा कि वह इसकी जांच कराते हैं और रेलवे ट्रैक से पैदल चल रहे मजदूरों को किसी वाहन से भिजवाने का प्रबंध करवाएंगे। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि रेलवे ट्रैक के जिस इलाके से यह मजदूर गुजर रहे हैं वह इलाका जिला गौतम बुद्ध नगर के अंतर्गत आता है।

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