[gtranslate]
Country

योगी के राज में राजकोष के लुटेरे ले रहे हैं चैन की सांस

लगभग ढाई दशक से माध्यमिक शिक्षा परिषद के अधीन शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियों का मामला सम्बन्धित विभाग में न सिर्फ चर्चा का विषय बना हुआ है बल्कि प्रति वर्ष सूबे के कोष को नाजायज तरीके से करोड़ों की चोट पहुंचा रहा है। ऐसा तब है जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन के दावे करते नहीं थक रहे। सूबे में सरकार भले ही किसी की क्यों न हो यदि नौकरशाही चाह ले तो उसके द्वारा कारित भ्रष्टाचार पर से पर्दा तो उठाया जा सकता है लेकिन कार्रवाई करना इतना आसान नहीं जितना मौजूदा सरकार के दावे हैं।

लगभग तीन वर्ष पूर्व जब सूबे की सत्ता भाजपा के हाथ में आयी तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दावा किया था कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में कारित भ्रष्टाचार पर से न सिर्फ पर्दा उठाया जाएगा बल्कि भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को सजा भी दी जाएगी। शुरूआती दिनों में तेजी भी देखने को मिली लेकिन लगभग समस्त मामलों में कार्रवाई के नाम पर निचले स्तर के अधिकारियों को बलि का बकरा बनाकर हाई प्रोफाइल मामलों को दफन कर दिया गया। ऐसा तब है जब इस मामले को हाई कोर्ट में भी चुनौती दी जा चुकी है।

नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार से सम्बन्धित ऐसा ही एक मामला लगभग ढाई दशक के बाद प्रकाश में आया है। स्थिति ये है कि फर्जी नियुक्ति से सम्बन्धित इस मामले की शिकायत पूर्ववर्ती मायावती सरकार के कार्यकाल से लेकर अखिलेश सरकार और मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल में भी की जा चुकी है। बात यदि कार्रवाई किए जाने की करें तो अब तक ये घोटाला प्रदेश सरकार के खजाने को करोड़ों की चोट लगा चुका है और यह क्रम अनवरत जारी है इसके बावजूद किसी चतुर्थ श्रेणी स्तर के कर्मचारी तक को सजा नहीं दी जा सकी।

समस्त फर्जी नियुक्तियों से सम्बन्धित ये मामला माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश का है। जिस वक्त इस फर्जीवाडे़ को अंजाम दिया गया उस वक्त सूबे में मुलायम सिंह यादव की सरकार सत्ता में थी। वर्ष 1994-95 में ही फर्जी नियुक्तियों को लेकर हाई कोर्ट चुनौती दी गयी थी। चूंकि तत्कालीन सरकार किसी प्रकार की जांच करवाने के पक्ष में नजर नहीं आ रही थी लिहाजा न्यायपालिका से ही जांच करवाने के आदेश जारी किए जाने की मांग की गयी थी। हाई कोर्ट ने मामले को संज्ञान में लिया भी और तत्कालीन सम्बन्धित विभाग के आला अधिकारियों को जरूरी निर्देश भी दिए लेकिन तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में सम्बन्धित विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव से लेकर माध्यमिक शिक्षा परिषद के तत्कालीन विभागाध्यक्ष समेत अन्य बड़े अधिकारी सिर्फ कागजी खेल ही खेलते रहे। कहना गलत नहीं होगा कि नौकरशाही के शातिर मस्तिष्क के समक्ष वह जज भी गच्चा खा गए जिनके समक्ष इस मामले को रखा गया था।

गौरतलब है कि जिस वक्त इस भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ था उसी वक्त फर्जी शिक्षकों को वेतन देने के नाम पर लगभग 12 करोड़ रूपए व्यय किए जा चुके थे। चूंकि इस मामले का हल मौजूदा समय में भी नहीं निकल पाया है लिहाज इस नुकसान का आंकलन अरबों में किया जा रहा है। हालांकि इस मामले में स्थानीय थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाने से लेकर जांच के नाम पर खानापूर्ति और चार्जशीट सहित हाई कोर्ट में बयानबाजी लगातार होती रही लेकिन इस दौरान किसी भी फर्जी शिक्षक का न तो वेतन रोका गया और न ही जांच में बाधा उत्पन्न करने की आशंका के चलते उन्हें उनके पद से हटाया गया।

कहा जा रहा है कि फर्जी तौर पर नियुक्त किए गए शिक्षक लगातार सम्बन्धित विभाग के विभागाध्यक्षों को सुविधा शुल्क देते चले आ रहे हैें जिस वजह से तमाम दस्तावेजी सुबूतों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। आश्चर्य में डालने वाली बात ये है कि इस कृत्य को उस वक्त अंजाम दिया गया जब मुलायम सरकार के कार्यकाल में शिक्षकों की नियुक्तियों के सम्बन्ध में किसी प्रकार का न तो शासनादेश जारी किया गया था और न ही पद सेंक्शन हुए थे। इतना ही नहीं अधिकतर ऐसे लोगों के हाथों में नौनिहालों का भविष्य संवारने की डोर थमा दी गयी थी जिनके स्वयं के पास शिक्षक बनने की आवश्यक योग्यता नहीं थी।

अर्थात पूरा खेल ही फर्जीवाडे़ पर खेला गया, जिसमें तत्कालीन सरकार की मूक सहभागिता से इनकार नहीं किया जा सकता। सही मायने में देखा जाए तो इस भ्रष्टाचार ने प्रदेश की पूरी नौकरशाही को ही संदेह के दायरे में ला खड़ा किया है। जहां तक मौजूदा योगी सरकार के कार्यकाल की बात है तो प्रदेश की नौकरशाही और हाई कोर्ट के बीच आंख-मिचैली का खेल अभी भी अनवरत जारी है।

बताते चलें कि शिक्षकों की फर्जी नियुक्तियों को लेकर सीबीसीआईडी जांच और माध्यमिक शिक्षा परिषद विभागीय ऑडिट भी करवा चुका है। मामले की पुष्टि के बाद ही प्राथमिकी दर्ज करायी गयी थी। इन समस्त प्रक्रियाओं के बाद माध्यमिक शिक्षा परिषद में निचले क्रम के कुछ अधिकारी से लेकर कुछ कर्मचारी भी बर्खास्त किए गए लेकिन फर्जी शिक्षकों की नियुक्तियां ज्यों की त्यों बरकरार रहीं। इन फर्जी शिक्षकों को भारी भरकम वेतन दिए जाने का सिलसिला वर्तमान योगी सरकार के कार्यकाल में भी बदस्तूर जारी है।

अब नौकरशाही का खेल देखिए। सम्बन्धित विभाग के जिन अधिकारियों-कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया था उन्होंने अपनी बर्खास्तगी को हाई कोर्ट में चुनौती दी। इधर नौकरशाही ने अपनी गर्दन फंसती देख कोर्ट की शरण में गए अधिकारियों-कर्मचारियों को संरक्षण देना शुरू कर दिया। कहा जा रहा है कि यदि ऐसा न किया जाता तो निश्चित तौर पर राज पर से पर्दा उठ जाता और कई आईएएस शिकंजे में आ जाते। फिलहाल जहां एक ओर इस मामले में अभी तक भ्रष्ट आईएएस अधिकारियों की गर्दन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है वहीं दूसरी ओर नाकाबिल शिक्षकों के चलते न सिर्फ राजकोष को प्रति वर्ष करोड़ों का नुकसान उठाना पड़ रहा है वहीं दूसरी ओर नौनिहालों का भविष्य भी दांव पर नजर आ रहा है।

You may also like

MERA DDDD DDD DD