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  •   कुमार गुंजन

उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस को कई सीटां पर अपने बागी नेताओं के चलते भारी नुकसान हो सकता है। इस बार एक खास बात यह देखने को मिली है कि अनुशासित कही जाने वाली भाजपा भीतर कांग्रेस की बनिस्पत बगावत के सुर ज्यादा तेज रहे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्तारूढ़ दल में बगावत का सीधा लाभ कांग्रेस को मिलना तय है

विधानसभा चुनाव की घोषणा से करीब छह महीने पहले की बात है। अधिकतर मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा था कि इस बार सत्तारूढ़ भाजपा आधे से ज्यादा सीटिंग विधायकों का टिकट काटेगी। कई मीडिया रिपोर्ट 30 से 35 विधायकों की संख्या भी बता रही थी। हालांकि पार्टी की ओर से इसकी अधिकारिक पुष्टि कभी नहीं की गई। लेकिन भाजपा ने कभी इसका खंडन भी नहीं किया। इसलिए चुनाव के दौरान पार्टी को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। कारण यह है कि पूरे उत्तराखण्ड में भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेताओं में टिकट पाने की इच्छा खूब बलवती होने लगी। पार्टी नेताओं को लग रहा था कि सीटिंग विधायकों के टिकट कटने पर उन्हें पार्टी चुनाव में उतार सकती है। पार्टी के कई नेता चुनाव के बहुत पहले से ही अपने-अपने क्षेत्रों में अपनी जमीन तैयार करने लगे थे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। चुनाव की घोषणा के बाद जब पार्टी ने तीन से चार चरण में टिकटों का एलान किया तो सिर्फ 10-12 विधायकों का ही टिकट कटा। ऐसे में चुनाव लड़ने के कई इच्छुक पार्टी नेताओं की उम्मीदों पर पानी फिर गया। वे बागी हो गए। ऐसे बागी उम्मीदवार चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। यदि उत्तराखण्ड में कांग्रेस की सत्ता वापसी होती है तो इसका एक बड़ा कारण भाजपा के बागी होने वाले हैं। चुनाव में कांग्रेस को भी उनके बागी नेता नुकसान पहुंचा रहे हैं लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान भाजपा को हो रहा है।

भाजपा को करीब एक दर्जन सीटों पर अपनी ही पार्टी के नेताओं के विद्रोह का सामना करना पड़ा है। पार्टी अंत तक किसी तरह कुछ बागियों को नामांकन वापसी के लिए मनाने में कामयाब रही थी। इसमें थराली से सीटिंग विधायक मुन्नी देवी शाह भी शामिल थीं। तीन डोईवाला निर्वाचन क्षेत्र के थे। यहां पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत मौजूदा विधायक हैं। रावत ने इस बार चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। इसलिए यहां से कई पार्टी नेता टिकट की उम्मीद लगाए हुए थे। इनमें जितेंद्र सिंह नेगी, सौरभ थपलियाल, सुभाष भट्ट, राहुल पंवार और वीरेंद्र रावत थे। इन नेताओं ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में पर्चा भी भरा लेकिन पार्टी अंततः इन्हें मनाने में कामयाब रही इसी प्रकार घनसाली सीट पर भाजपा से बागी सोहन लाल खंडेलवाल, पिरान कलियर सीट पर जय भगवान, कालाढूंगी में गजराज बिष्ट ने निर्दलीय नामांकन किया था। इन सबको पार्टी किसी तरह मनाने में कामयाब रही। इसके बावजूद एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर बगावत बनी रही। इसकी भरपाई भाजपा चुनाव तक नहीं कर पाई। न ही बागी उम्मीदवारों की कोई काट निकाल पाई।

भाजपा को कुमाऊं क्षेत्र में सबसे बड़ा नुकसान रुद्रपुर सीट पर उठाना पड़ सकता है। यहां भाजपा के सीटिंग विधायक राजकुमार ठुकराल बागी हो निर्दलीय चुनाव लड़े हैं। कुमाऊं में इनके अलावा उधमसिंह नगर जिले की किच्छा में अजय तिवारी, नैनीताल की कालाढूंगी और भीमताल तथा पिथौरागढ़ जिले की गंगोलीहाट विधानसभा सीट पर भी पार्टी को बगावत झेलनी पड़ी है। कुमाऊं मंडल से कहीं अधिक बगावती सुर गढ़वाल मंडल में देखने को मिले। इसलिए कहा जा रहा है कि पार्टी जहां सबसे ज्यादा मजबूत थी वहीं उसे अधिक नुकसान होने वाला है। गढ़वाल के देहरादून जिले की रायपुर व राजपुर विधानसभा सीटों के साथ धनोल्टी, देहरादून कैंट, धर्मपुर में पार्टी को अपने बागी उम्मीदवारों से नुकसान हुआ बताया जा रहा है। यमुनोत्री, कर्णप्रयाग, चकराता, घनसाली और कोटद्वार आदि निर्वाचन क्षेत्रों में भी पार्टी को अपने नेताओं की बगावत का सामना करना पड़ा है। पार्टी ने चुनाव से ऐन पहले कई बागी नेताओं पर कार्रवाई करते हुए इन्हें छह साल के लिए भाजपा से निष्कासित कर दिया है। लेकिन पार्टी अभी भी यह मानने को तैयार नहीं है कि इन बागी नेताओं से उसके अधिकृत प्रत्याशियों को चुनाव में नुकसान हुआ है, जबकि भाजपा के ही कई विधायक एवं उम्मीदवार चुनाव बाद गुटबाजी का भी आरोप लगा चुके हैं। यहां तक कि प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक पर भी खुले तौर पर आरोप लगाया गया है। पार्टी के एक नेता नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं ‘ज्यादातर बगावत उन सीटों पर हुई है, जहां चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया था कि मौजूदा विधायकों को टिकट मिलने पर पार्टी अपनी सीट गंवा देगी। आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले लगभग सभी बागी अपने निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी पैनल का हिस्सा थे।’ स्थानीय कार्यकर्ताओं की पार्टी विरोधी गतिविधियां जितनी बताई गई हैं, उससे कहीं ज्यादा नाराजगी चुनाव के दौरान दिखी। इसका नुकसान चुनाव में पार्टी को कितना हुआ है, यह चुनाव नतीजा आने के बाद ही पता चल पाएगा।

बगावत का सुर कांग्रेस में भी बुलंद रहा। लेकिन यदि इसकी तुलना भाजपा से की जाए तो कम था। कांग्रेस को करीब आधा दर्जन सीटों पर बगावत झेलनी पड़ी है। इस लिहाज से देखें तो बागियों से भाजपा की तुलना में कांग्रेस को कम नुकसान होने की उम्मीद की जा रही है। कांग्रेस को यमुनोत्री, बाजपुर, रुद्रप्रयाग, सितारगंज, रामनगर, बागेश्वर, घनसाली, देहरादून कैंट लालकुआं और किच्छा सीटों पर बगावत झेलनी पड़ी है। कांग्रेस में बगावत के चलते सबसे ज्यादा चर्चा में लालकुआं सीट रही। यहां से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत चुनाव लड़े हैं। वे प्रदेश के सबसे लोकप्रिय नेता भी माने जाते हैं। इसलिए उन्हें भी अपनी पार्टी में बगावत झेलनी पड़ी, यह आश्चर्य की बात है। दरअसल, पहले हरीश रावत को पार्टी ने रामनगर से उम्मीदवार बनाया था। यहां से पार्टी टिकट चाह रहे पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष रंजीत रावत ने ही बगावत करने के संकेत दे डाले। पार्टी ने तब लालकुआं से घोषित उम्मीदवार संध्या डालाकोटी का टिकट काटकर हरीश रावत को लालकुआं से मैदान में उतारा। पार्टी को उम्मीद थी कि संध्या डालाकोटी को मना लिया जाएगा। लेकिन वे नहीं मानी और निर्दलीय चुनाव में उतर गई। चुनाव प्रचार के दौरान भी उन्हें मनाने की पूरी कोशिश जारी रही पर न हरीश रावत इसमें सफल हो पाए और न ही पार्टी। अंततः कांग्रेस ने संध्या को पार्टी से निष्कासित करना पड़ा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संध्या डालाकोटी से कांग्रेस उम्मीदवार एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है। इसका कारण यह बताया जा रहा है कि भाजपा ने यहां के अपने सीटिंग विधायक नवीन दुमका का टिकट काट दिया था। ऐसे में भाजपा विधायक नवीन दुमका ने भीतरखाने हरीश रावत का समर्थन कर दिया। साथ ही हरीश रावत ने यहां के बड़े नेता हरीश चंद्र दुर्गापाल और हरेंद्र बोरा को अपने साथ जोड़े रखा। वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिनका मानना है कि एक महिला का टिकट काटने से महिलाएं कांग्रेस से नाराज हो गई हैं। इसका खामियाजा हरीश रावत को भुगतना पड़ सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के करीबी जसबीर सिंह रावत का कहना है, ‘संध्या डालाकोटी को मनाने के प्रयास किए गए थे। वह कांग्रेस की एक महत्वपूर्ण सदस्य थीं। हम सभी उनका सम्मान करते हैं, लेकिन उनके अपनी बात पर अड़ने के कारण हमें उन्हें निष्कासित करना पड़ा। वह यह समझने को तैयार नहीं थीं कि पार्टी नेतृत्व के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए।’

लालकुआं जैसा विरोध कांग्रेस को यमुनोत्री में भी झेलना पड़ा है। वहां पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार दीपक बिजलवान के खिलाफ कांग्रेस के बागी नेता संजय डोभाल चुनाव लड़े हैं। संजय डोभाल पिछला चुनाव यहां से लड़ चुके हैं। तब वे हार गए थे। इस बार भी वे टिकट के प्रबल दावेदार थे। लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट न देकर जिला पंचायत अध्यक्ष दीपक बिजलवान को उम्मीदवार बनाया। बिजलवान पर भ्रष्टाचार का आरोप है। पिछले महीने ही उन्हें जिला अध्यक्ष पद से हटाकर जांच की जा रही है। इस सीट पर निर्दलीय संजय डोभाल को मजबूत माना जा रहा है। माना जा रहा है कि यहां से संजय डोभाल ने भाजपा उम्मीदवार एवं सीटिंग विधायक केदार सिंह रावत को कड़ी टक्कर दी है। मुख्य विपक्षी दल के लिए एक बड़ी चिंता रुद्रप्रयाग में भी रही। वहां कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार प्रदीप थपलियाल को दो बार विधायक रह चुके मातबर सिंह कंडारी के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। मातबर सिंह कंडारी भाजपा सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। पिछला चुनाव वे कांग्रेस के टिकट पर लड़े थे। इस बार टिकट न मिलने से नाराज होकर वे निर्दलीय चुनाव लड़े हैं। इसी तरह से कांग्रेस को घनसाली में पूर्व विधायक भीमलाल आर्य के विरोध का सामना करना पड़ा है। बागेश्वर विधानसभा सीट पर भैरव सिंह ने बागी होकर कांग्रेस की मुश्किल बढ़ाई है। वहीं रामनगर सीट पर भी कांग्रेस को संजय नेगी की बगावत झेलनी पड़ी है। बागी उम्मीदवारों के बारे में पूछे जाने पर कांग्रेस नेताओं का दावा है कि उनकी वजह से पार्टी की जीत की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

राज्य की 70 सीटों पर इस बार 632 उम्मीदवार चुनाव लड़े हैं। सबसे ज्यादा उम्मीदवार गढ़वाल क्षेत्र से हैं। यहां पर सबसे अधिक सात जिलों की 41 सीटों पर 391 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे। कुमाऊं की बात करें तो यहां पर 29 विधानसभा सीट हैं। यहां 241 उम्मीदवार अपना भाग्य आजमाए हैं। इस दफा प्रदेश में कुल 82 लाख 37 हजार 886 मतदाता थे। इनमें पुरुष मतदाता की संख्या 42 लाख 24 हजार 288 और महिला 39,19,334 थी, जबकि अन्य मतदाताओं की संख्या 300 और सर्विस मतदाता 93,964 थे। मौजूदा मतदाता सूची में 1,58,008 वोटर 18 से 19 आयु वर्ग के थे। इन्होंने पहली बार मतदान किया है। इस बार 65 ़37 फीसदी मतदान हुआ है। यह पिछले चुनाव की तुलना में थोड़ा कम है।

 

बात अपनी-अपनी

यह बात सही है कि हमारे कई नेता निर्दलीय चुनाव लड़े हैं। हमने उन्हें समझाने का काफी प्रयास किया। कई नेता हमारी और पार्टी की बात माने भी। कुछ नहीं माने। पार्टी ने उन पर कार्रवाई की। मुझे नहीं लगता कि इनसे भाजपा को चुनाव में कोई नुकसान हुआ है। हम फिर से 60 सीट लाकर सत्ता में वापसी कर रहे हैं।
मदन कौशिक, अध्यक्ष प्रदेश भाजपा

कांग्रेस को भाजपा की तुलना में कम ही बगावत का सामना करना पड़ा है। भाजपा को करीब-करीब आधे विधानसभा सीटों पर बागियों का सामना करना पड़ा है। इनमें 13 सीटों पर असंतोष सबसे ज्यादा रहा है। कांग्रेस को उनकी तुलना में बहुत कम सीटों पर नाराजगी झेलनी पड़ी है।
राजीव महर्षि, वरिष्ठ प्रवक्ता, प्रदेश कांग्रेस

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही पार्टी में बगावत हुई है। लेकिन सत्ताधारी पार्टी भाजपा को बागी उम्मीदवारों से ज्यादा नुकसान पहुंचने की संभावना है। इस बार कई भाजपा नेताओं को टिकट मिलने की काफी ज्यादा उम्मीदें थीं। खासकर तब जब पार्टी नेतृत्व ने ऐसे संकेत देने शुरू कर दिए कि खराब प्रदर्शन करने वाले करीब 25 मौजूदा विधायकों के टिकट कट सकते हैं। यह उनकी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण रिपोर्ट में भी नजर आया था। उनके  सर्वेक्षण रिपोर्ट में कई विधायकों का रिपोर्ट कार्ड नकारात्मक आ रहा था। लेकिन जब पार्टी ने टिकट वितरण किया तो कुछ ही विधायकों के टिकट कटे।
जय सिंह रावत, राजनीतिक विश्लेषक

 

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