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लेखक, डॉ सी. पी. राय
राजनीतिक चिंतक एवं स्तम्भकार है।

तीन साल पहले दिल्ली में एक कार्यक्रम आयोजित हुआ।वहां एक जाने- माने पत्रकार ,जो हमारे भी पुराने मित्र हैं और सत्ता और उसके मातृ संगठन मे ऊंची पहुंच रखने वाले व्यक्ति द्वारा प्रश्न करते हुए सुना कि भारत का एक संविधान क्या ठीक है या बेकार है ।
उसके बाद कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों मे ख़ास विचारधारा के लोगों को मैंने ऐसी ही चर्चाएं करते हुये सुना। वह जगह चाहे किसी की शादी हो या मुर्दा घाट पर जो कुछ देर बैठना पैडता है उस वक़्त में।
फिर उस दिन जब एक ख़ास पहचान वाली मीडिया के पत्रकार ने राहुल गांधी की कोरोना पर हो रही प्रेस कांफ्रेंस मे भी सवाल उठा दिया कि क्या अब व्यवस्था बदल जायेगी ?

जबकि राहुल के ये कहने के बावजूद की वो किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते हैं ,बस कोरोना की लड़ाई में पूरा साथ देते हुये कुछ सुझाव भी देना चाहते हैं। पर खास तरह की मीडिया ने या तो सत्ता की नाकामियों को ढकने या उसकी ब्रान्डींग करने के जवाब की चाहत वाले सवाल ही किये । तब मजबूर होकर मुझे ये लेख लिखना पड़ रहा है।जिससे देश और जनता के सामने और व्यवस्था जिसकी कल्पना संगठन विशेष कर रहा है उसकी कुछ हक़ीक़त भी बता दिया जाए ।फिर देश की जनता तय करे और सक्रीय होकर तय करे की क्या ये व्यवस्थाएं उसे मंजूर हैं ?

चीन हो ,रुस हो या कोई ऐसा देश जहां तानाशाही जैसा राज हो वहां उनके दो चेहरे होते है । एक वो जो वे दुनिया को दिखाते हैं और दूसरा जो सच होता है ।  चीन मे जब कोरोना फैला तो वहां से तरह-तरह की ख़बरें निकलीं। जिसमे ये भी था कि वहां बीमारों की हत्या कर उनका सामूहिक दाह संस्कार कर दे रहे हैं। कुछ आतंकित करने वाले वीडियो भी आये थे । फिर अचानक उसने बहुत थोड़ी मौत बता कर सब कुछ ठीक होने की घोषणा कर दी।

जब दुनिया भर से सवाल उठे तो कुछ मरने वालों की संख्या को बढ़ा दिया गया। अब देखते हैं कि मौतों की ये संख्या अभी कितनी और कितनी बार बढ़ती है? दूसरी तरफ चीन की मोबाइल सेवा देने वाली कम्पनियों से छन कर ख़बर निकली की इस बीच कई लाख मोबाइल बंद हो गए हैं। उसका यह अर्थ निकाला गया कि उतने लाख लोग अब नहीं है ।
चूँकि दुनिया का कोई और मीडिया वहां नहीं होता है , केवल सरकारी एजेन्सी होती है । तो जो वो बताती है सिर्फ वही दुनिया जान पाती है । तानाशाह के लिए खुद की और अपनों की सुरक्षा और दुनिया मे साख जरूरी होती है ।उसके लिए लोगों की मौत चींटियों की मौत से ज्यादा मायने नहीं रखती है। आज से काफ़ी साल पहले चीन के छात्र निकल गए थे, तिनामिन चौक पर मांगे लेकर ।

उन पर लाठी चार्ज नही हुआ ,वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले नहीं छोड़े गए।उन्हें तितर- बितर करने के लिए इन सबके बजाय चीन के शासक ने उन पर टैंक चढ़ा दिया। चीन में ही हजारों घर सुने हो गए ।उनके चिराग बूझ गए । जब वहां के कुछ लोग मुझे मिले, जो अमेरिका में भ्रमण के दौरान कई दिन मेरे साथ रहे । कई दिन साथ रहने की वजह से वे बात चीत मे खुल गए और अन्य चीनियों से अलग उन्होंने कुछ फुसफुसा कर बताया । वो ये था कि वहां के भी ग्रामीण इलाके बहुत गरीब हैं। साईकिल तक के लिए हत्या हो जाती है और शहरों में तो वेश्यावृत्ति का बोलबाला है ।

रुस मे भी जब तक गलास्नोस्त और पेरोसत्राइका का गोबचोय का दौर नहीं आया जिससे रुस खंड खंड टूट गया तब तक वो एक ताकत तो था, सैन्य ताकत । आज भी वह सैन्य ताकत है। पर बाकी अंदर क्या है कोई नहीं जानता।
पर उसके बाद जब रुस मे सिर्फ ब्रेड के लिए मीलों लम्बी लाईन लगी तब वहां के दोहरे समाज के बारे में दुनिया को पता लगा कि वहां भी एक तरफ सिर्फ सत्ता में मौजूद पार्टी किस कदर वैभव शाली है और दूसरी तरफ किस हद तक गरीबी है । क्यूंकि वहां के सत्ताधीशों और उनसे जुड़े लोगों के चार्टेड हवाई जहाज जब भारत सहित दुनिया के देशों में उतरने लगे और पैसा बहता हुआ दिखने लगा ,तब मालूम पड़ा कि किस कदर सत्ता और उसके दोस्तो ने लूट की है ।


भारत में भी कुछ नेताओं ने अपनी सनक पर खूब पैसा बहाया । बस सत्ता भर मिल जाने पर अय्याशी के आयोजन किये गए । फिर जिसकी निरंकुश सत्ता होती है उसे कौन रोक सकता है ।
उत्तर कोरिया भी एक उदहारण है जहां एक सनकी सर्वोच्च पद पर बैठा आदमी अपनी अय्याशी और शौक़ पर अपनी दौलत फूंकता है। वहां हर वक्त असुरक्षा से घिरा हुआ है। भयभीत होने के कारण वह कुछ कह भी नहीं सकता।लेकिन वह शासक अपनी राजधानी और उन जगहों का भी जबर्दस्त विकास करता है जहां जहां उसे रहना या आना जाना होता है या वह जगह जो उसे दुनिया को दिखाना होता है ।

यही स्थिति सारे तानाशाही वाले या फौजी शासन वाले देशों की होती है। क्योंकि निरंकुश सत्ता में कोई मानव अधिकार नहीं होता है। वहां सिर्फ सत्ता और फौज का अधिकार होता है । तानाशाही में फुसफुसा कर भी कोई ऐसी बात कह देता है जो सत्ता को न पसंद हो,तो वह उसे सीधे मौत की तरफ ले जाती है ।भयानक मौत की तरफ ।किस औरत और लड़की के पेट में से किसका बच्चा जन्म लेता है इसका पता शायद डी एन ए टेस्ट से ही लग सकता है ।

यूं भी समझा जा सकता है कि जो राजा निरंकुश और तानाशाह होता था तो उसकी प्रजा उसके ख़िलाफ़ नहीं बोल पाती थी।अब भी जिस इलाके मे जिस गुंडे का बोलबाला होता है , वहां के लोग उसके ख़िलाफ़ मुंह खोलने से डरते हैं। वहां सबको उसका हुक्म मान कर चुप रहना पड़ता है, चाहे उसके गुर्गे उनकी बहन बेटियों को भी उठा ले जाएं। इसी का बड़ा रूप , हर तरह की तानाशाही का होता है । कितना मजेदार है कि तानाशाह भी वोट डलवाता है। अपने आप को सत्ता में रखने के लिए।उसमें वो अकेला या बस उसके लोग ही उम्मीदवार होते है ।

तानाशाह जो चाहता है वो हो ही जाना है। जिन चीज़ों में उसकी सत्ता और उसके गुर्गो का हित होता है वो सब हो जाता है। जल्दी हो जाता है और अच्छा हो जाता है ,क्रूरता के साथ हो जाता है । वो खुश होता है कि उसने जो चाहा वो हो गया और उसके लोग तथा उसके लिए काम करने वाली फोर्स खुश हो जाती है क्योंकि वो राजा है और उसको सब हासिल है। थोड़ा बहुत तो हमें भी दिख जाता है ।सत्ता मे जब नौकरशाही सर्वोच्च न्यायालय के रोक के बावजूद मायावती को खुश करने को जेल तोड़ पत्थरों का पार्क बना देती है। तो किसी गांव में पूरी फ़िल्मी दुनिया उमड़ पड़ती है ।

इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है कि ऐसी सत्ता जिसमे विरोध ,कानून ,अदालत और मीडिया भी है तब भी इस हद तक अमानवीय कार्य कर लेती है तो तानाशाही की सरकारों मे क्या -क्या होता होगा । इंसान, इंसान नहीं रह जाता। बस काम लायक खा लो , जरूरत भर पहन लो और जहां बता दे सो जाओ और सत्ता के हुकुम पर सत्ताधीशों को संपन्न और सुखी करने के लिए बस मशीन बन जाओ ।

जबकि इंसान का मतलब है कि उसे रोटी मिले ,कपड़ा मिले ,छत मिले और चाहे ये थोड़ा कम भी हो पर उसे उन्मुक्त हंसी जरूर मिले। वरना कैद मे कड़ी मशक्कत वाली सज़ा काट रहे कैदी में और तानाशाही व्यवस्थाओं के नागरिक में क्या फ़र्क है ।
इसलिए किसी भी तरह की तानाशाही या एक व्यक्ति या एक संगठन का राज कायम करने का का मंसूबा पाले लोग का पहले कदम पर ही कड़ा विरोध हो जाना चाहिये। उनको ऐसा करने के पहले ही उखाड़ फेंकना चाहिये ।

फोटो साभार गूगल से

 

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