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असली जंग तो चुनाव के बाद होगी

राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में त्रिशंकु विधानसभा के आसार बन रहे हैं। ऐसे में चुनाव प्रचार से ज्यादा जोर-आजमाइश चुनाव के बाद देखने को मिल सकती है

पश्चिम बंगाल में जैसे-जैसे मतदान के चरण आगे बढ़ते जा रहे हैं, वैसे-वैसे ही राजनीतिक पंडितों को सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि आखिर राज्य में बाजी किसके हाथ लगेगी? आम लोगों में भी चर्चा है कि क्या ‘दीदी’ अपना किला बचा लेंगी या भाजपा उनके गढ़ में कब्जा कर लेगी, या फिर त्रिशंकु सरकार बनेगी? चुनाव प्रचार के दौरान हुई हिंसक घटनाएं, हिंसक घटनाओं पर हुई सियासी जोर-आजमाइश, आरोप-प्रत्यारोप, प्रशांत किशोर के लीक हुए आॅडियो चैट आदि के चलते चुनावी जंग इतनी जबर्दस्त बन चुकी है कि राजनीतिक विश्लेषकों को अनुमान लगाना कठिन हो रहा है कि आखिर ऊंट किस करवट बैठेगा?

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राज्य में भाजपा वोटों के ध्रुवीकरण में जुटी हुई है। अंतिम चरणों का जो मतदान होगा, वहां भी भाजपा की कोशिश ममता बनर्जी के दबदबे को कम करने की है। अंतिम चरणों में जिन सीटों पर मतदान होना है वहां ममता मजबूत स्थिति में हैं। भाजपा यहां की ज्यादातर सीटें जीतना चाहती है। दूसरी तरफ ममता भाजपा को हर तरह से जवाब देती आ रही हैं। यहां तक कि वह चुनाव के बाद की रणनीति में भी भाजपा से आगे चल रही हैं। विपक्षी नेताओं को एकजुटता के उद्देश्य से चुनाव के बीच लिखे उनके एक पत्र को इसी नजरिए से लिया जा रहा है। राजनीतिक पंडित मान रहे हैं कि इस बार चुनाव के बाद ही असली जंग होगी। सरकार बनाने के लिए भाजपा और तृणमूल को खींचतान करनी होगी, क्योंकि राज्य में त्रिशंकु विधानसभा के संकेत हैं।

चुनाव के बाद होने वाली उठापटक को लेकर भी राजनीतिक पंडितों में असमंजस है। उनकी राय एक नहीं है। कुछ का मानना है कि भाजपा आज जोड़-तोड़ में माहिर हो चुकी है। देश के कई राज्यों में उसने इसी तरीके से अपनी सरकार बनाई है। मध्य प्रदेश इनका सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ राजनीतिक जानकार यह भी मानते हैं कि तृणमूल की सीटें कम आई तो जोड़-तोड़ में दीदी भी दमखम दिखाएंगी। वे भी पीछे नहीं रहेंगी, बल्कि उन्होंने तो पहले ही विपक्षी दलों की एकजुटता का आह्नान कर डाला है। माना जा रहा है कि आज भले ही ममता बनर्जी तृणमूल छोड़कर भाजपा में जाने वालों को खुले मंच से कोस रही हों, लेकिन नतीजे सामने आने पर वे अपने पुराने साथियों को घर वापसी की दुहाई भी दे सकती हैं। पार्टी के कुछ रणनीतिकार कहने भी लगे हैं कि दोस्ती-दुश्मनी चुनाव नतीजों के बाद ही तय होगी।

राज्य में अभी चुनाव के तीन चरण बाकी हैं। हालांकि इन चरणों में तस्वीर पिछले चरणों की तुलना में कुछ अलग हो सकती है। एक तरफ तृणमूल चैथे चरण के मतदान के दिन फायरिंग में चार लोगों की बूथ पर मौत का फायदा उठाने में जुटी है, वहीं दूसरी तरफ इस घटना के बहाने मुस्लिम वोटों में आ रहे बिखराव को वह फिर एकजुट करने की कोशिश में भी है। लेकिन उसकी इस कोशिश का एक दूसरा पहलू ये भी है कि इससे होने वाले ध्रुवीकरण का फायदा भाजपा को मिल सकता है। पहले दो चरणों में मतदान 80 फीसदी से ज्यादा रहा तो तीसरे और चैथे चरण में भी मतदान 75 फीसदी रहा है। लेकिन अब बाकी चरणों में मतदान प्रतिशत कम रहने की आशंका है। राज्य में कोरोना संक्रमण के मामले लगातार बढ़ रहे हैं और इसका असर लोगों की दिनचर्या पर दिखने लगा है। कोलकाता के रेसकोर्स, पार्क स्ट्रीट और हाॅर्टिकल्चर मैदान जैसे इलाकों में सुबह-शाम वाॅक करने वालों की संख्या अब कम हो गई है। छठे-सातवें चरण तक अगर संक्रमण की रफ्तार बढ़ी तो लोगों का मतदान के लिए घर से निकलना मुश्किल ही होगा।

हालांकि लोगों का मतदान के लिए न निकलना फाॅल्स वोटिंग को बढ़ा सकता है। इसमें जिसका बाहुबल चल गया, वह आगे निकल सकता है। ममता की एक खासियत यह है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को बराबर अहसास करा रही हैं कि उनमें माद्दा है। हर तूफान से टकरा सकने वाली वे एक चट्टान हैं। लेकिन इस बीच चैथे चरण के मतदान के दिन तृणमूल कांग्रेस के सलाहकार प्रशांत किशोर के लीक हुए आॅडियो चैट ने पार्टी की स्थिति असहज कर दी है। इस चैट के लीक होने के बाद अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या पीके को साथ लेना ममता की बड़ी भूल साबित होने जा रही है। इसके लिए दो मई को आने वाले विधानसभा चुनाव नतीजे का इंतजार करना होगा, लेकिन इससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि पीके के कारण तृणमूल कांग्रेस में जबरदस्त असंतोष है। कहा जा रहा है कि ऐसे असंतुष्ट नेताओं और कार्यकर्ताओं वाली पार्टी को आखिरकार चुनावों में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

देखा जाए तो राजनीतिक पार्टियों खासकर क्षेत्रीय दलों को पीके जैसे चुनावी रणनीतिकारों से काम लेने की कला नए सिरे से सीखनी होगी। ये आंकड़े जुटाने, उनका विश्लेषण करने और उसके आधार पर सलाह देने तक तो ठीक हैं, लेकिन जब पार्टी के फैसलों में उनकी दखलंदाजी बढ़ने लगती है तो नतीजा अच्छा नहीं होता है। पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूती देने वाले स्तंभ एक-एक कर ढहने लगते हैं। बहरहाल अभी प्रशांत किशोर ममता की नैया पार लगाने के दावे कर रहे हैं और बंगाल में चुनाव से पहले वे कह चुके हैं कि अगर भाजपा की 100 या उससे ज्यादा सीटें आईं तो वे चुनाव रणनीतिकार का अपना काम छोड़ देंगे।

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