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प्रधानमंत्री को भी सिर्फ यहां की रौनक दिखी, कठोर जीवन नहीं

जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रेडियो से अपने ‘मन की बात’ पर ‘रं समुदाय’ की भाषा बोली की सराहना कर रहे थे, तो उस समय इस समुदाय के 36 गांवों के लोग अपना घर-बार छोड़ अपनी भेड़ों के साथ मैदानी इलाकों में खुले आसमान के नीचे अपना ठौर ठिकाना ढूंढ़ रहे थे। उच्च हिमालयी क्षेत्र के दारमा, व्यास व चैंदास घाटी में रहने वाली यह जनजाति जो भोटिया जनजाति के रूप में जानी जाती है आज भी बेहद संघर्षपूर्ण व कठिन जीवन जीने को विवश है। शीतकाल शुरू होते ही अक्टूबर माह में इन गांवों के लोग घाटियों की तरफ निकल जाते हैं और ग्रीष्म ऋतु शुरू होते ही अपै्रल माह में अपने घरों को वापस लौट आते हैं। लेकिन अब इन घाटियों से स्थाई तौर पर पलायन शुरू हो गया है। दर्जनों गांवों के अधिकांश परिवार बेहतर कल की खातिर अब इन गांवों से निकलना मुनासिब समझ रहे हैं। समस्याओं के मकड़जाल में फंसी इन तीनों घाटियों की जटिलतायें यहां के लोगों को समय-समय पर विचलित करती रही हंै। आजादी के बाद से ही नीति-नियंताओं की नजर में भले ही यह एक छोटा सा भू-भाग रहा हो, लेकिन नेपाल व चीन की सीमा से लगा यह अति संवेदनशील क्षेत्र विकास का आधारभूत ढांचा विकसित न होने से अब मानवविहीन हो रहा है।
जनजातियों की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं बेशक दुनिया के लोगों को आकर्षित करती रही हों, लेकिन सच यही है कि कभी किसी ने इनका दर्द जानने की कोशिश नहीं की। कुछ समय पहले -‘मन की बात’ कार्यक्रम में जहां एक ओर प्रर्ािंानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘रं समुदाय’ की भाषा-बोली  की सहराहना कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ इस समुदाय के 36 गांवों के लोग अपने घरों को छोड़ने को मजबूर थे। बरसात का मौसम तो इन लोगों को देश-दुनिया से काट ही देता है। पिथौरागढ़ जिले की जन-जातियों की समृद्ध परंपराओं के साथ ही उनकी परेशानियों से अवगत कराती दिनेश पंत की यह विशेष रिपोर्ट:
इन घाटियों के लोग न सिर्फ शीतकाल में बल्कि मानसून काल में भी बेहद कठिन जीवन जीते हैं। बरसात में पैदल चलने तक के रास्तों के लिए यहां के लोग तरस जाते हैं। पूरे देश से इनका संपर्क टूट जाता है। राशन की व्यवस्था न होने से इनके समक्ष जीवन मरण का प्रश्न खड़ा हो जाता है। यहां से गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा बाधित हो जाती है तो भारत-चीन व्यापार के लिए जाने वाले व्यापारी भी खासे प्रभावित होते हैं। गांवों को जोड़ने वाले पुल बह जाते हैं। उस वक्त यहां साधारण नमक की कीमत भी 80 रुपया किलो पहुंच जाती है। राशन की कीमत इतनी अधिक बढ़ जाती है कि आम आदमी को खाने के लाले पड़ जाते हैं। जबकि यह इलाका आलू व लाल राजमा के लिए प्रसिद्व है। आपदा की दृष्टि से भी यह क्षेत्र अति संवेदनशील रहा है। हर साल आपदा यहां कहर ढाती है। वर्ष 2013 में आई आपदा के दौरान हजारों लोग यहां फंस गये थे। जनजीवन चैपट हो गया था। जान माल का बड़ा नुकसान हुआ था। सालों साल से यहां का जीवन काफी कठिन व संघर्षपूर्ण तरीके से चल रहा है। आज नहीं तो कल एक बेहतर जीवन की आस में इनकी जिंदगी कट रही है। शीतकाल में माइग्रेशन तो वर्षाकाल में पूरे देश से संपर्क कट जाना यहां के लोगों की मजबूरी है। संघर्ष दर संघर्ष इस समुदाय के लोगों का असली सच है। लेकिन सवाल यह है कि सीमा से लगे इस संवेदनशील क्षेत्र में रहने वाली एक बड़ी आबादी को सरकारें विकास की मुख्यधारा से क्यों नहीं जोड़ पाई? स्थानीय निवासी पूरन सिंह का यह दर्द शायद यहां के लोगों के कठिन जीवन को अभिव्यक्त कर सके। वह कहते हैं कि ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘रं समुदाय’ की भाषा की सराहना कर अच्छा काम किया, लेकिन अगर यहां के कठिन व संघर्षमय जीवन की तरफ भी वह नजर डालते तो शायद इनके जीवन स्तर में बड़ा बदलाव आ सकता था।
समृद्ध परंपरायें :  यूं तो उत्तराखण्ड में प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर स्थलों की कोई कमी नहीं, लेकिन जनपद पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित दारमा-व्यास वैली दुनिया की सबसे खूबसूरत घाटियों में से एक है। धैलीगंगा, पंचाचूली की चोटियां व बुग्यालों की मखमली घास सैलानियों को आकर्षित करती रही हैं। प्राकृतिक सौन्दर्य ही नहीं, बल्कि यहां की सांस्कृतिक विरासत भी काफी समृद्ध रही है। यहां लगने वाला दांतू मेला जिसे दारमा घाटी का कुंभ भी कहते हैं, समृद्ध ­सांस्कृतिक विरासत का एक बड़ा उदाहरण है। इस मेले में भगवान शिव और गणेश के स्थानीय लोक देवताओं की पूजा अर्चना होती है। मेले में भागीदारी के लिए देश विदेश से लोग अपने गांव पहुंचते हैं। पांच दिन चलने वाले इस मेले में कई धार्मिक अनुष्ठान होते हैं। इस दौरान पूरी घाटी में उल्लास व उमंग का वातावरण कायम हो जाता है। यहां के लोगों का लोक देवता ह्या गबला देव यानी महादेव हैं। भगवान शिव को ‘रं भाषा’ में ह्या गबला देव कहा जाता है, इस दौरान इनका ही पूजन होता है। इसी तरह व्यास घाटी के बूंदी गांव में भी हर 12 वर्ष बाद किर्जी भामौ विजयोत्सव मनाया जाता है। तब इन ऊंची बर्फीली पहाड़ियों पर उल्लास व उमंग का वातावरण बन पड़ता है। बारह वर्षों बाद बारह टहनियों वाले किर्जी पौधे को तिरंग बुग्याल में जाकर नष्ट किया जाता है। इसे दुश्मन का प्रतीक माना जाता है। इस वनस्पति को नष्ट करने को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक दौर में इसी वनस्पति से सारे उपचार किए जाते थे, लेकिन एक बार एक महिला के बारह वर्षीय पुत्र के इस वनस्पति के द्वारा उपचार करने पर मौत हो गई तब उस मां द्वारा श्राप दिया गया कि बारह वर्ष में जब इस पेड़ में बारह टहनियां आएंगी तो इसे नष्ट कर दिया जाएगा। तब से यह परंपरा चली आ रही है। मूलतः यह वनस्पति बिषैली मानी जाती है। इस वनस्पति में हर साल एक टहनी आती है। उत्सव की शुरूआत में ईष्ट देवता की पूजा होती है और वनस्पति को नष्ट करने के बाद सामूहिक भोज होता है। इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। अब इसने महोत्सव का रूप ले लिया है।
लिंगानुपात में अव्वल : इस जनजातीय समाज में महिला का काफी सम्मान होता है। यहां कन्या पक्ष से दहेज नहीं लिया जाता है। विवाह के लिए वर पक्ष लड़की के घर जाकर निवेदन करता है और निवेदन को स्वीकार करना या न करना लड़की के ऊपर निर्भर करता है। यह एक जीवट जनजाति है। इस समाज में बेटा व बेटी के अधिकार बराबर हंै। किसी तरह का कोई भेदभाव यहां नहीं होता। लिंगानुपात में भी आर्दश स्थित बनी हुई है। दर्जनों महिलाओं ने उच्च पदस्थ पदों पर पहुंच अपनी पहचान बनाई है। चंद्रप्रभा एतवाल, सुमन कुटियाल, कविता बूढ़ाथोकी यहां की ऐसी महिलाएं हैं जिन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा फहरा या है। यहां महिलाओं को धर्मिक अनुष्ठानों में भी बराबर का अधिकार मिला हुआ है। दारमा घाटी में पैदा हुई दानवीर जसूली सौक्याणी के किस्से आज भी स्थानीय लोग बड़े आदर के साथ सुनाते हैं।
‘रं समुदाय’ के निवास स्थल : व्यास घाटी: बूंदी, गंुजी, गब्र्यांग, रौंगकोंग, नपलच्यू, नाबी, कुटी । चैंदास घाटी: पस्ती, नियांग, नारायण आश्रम, सोसा, छलमा छिलासो, हिमखोला, पांगू, रोंतों, घरपांगू, रिनझिम, सिर्दांग, सिर्खा, रूंग, बम्बा कुरीला, गांगला, ताकुल, सिमखोला, बुंगबुंग, गाला, जिप्ती। दारमा घाटी: दर, बौंगलिंग, सेला, चल, बालिंग, नागलिंग, दुग्तू, दांतू, बौन, ठाकुर, तिदांग, सीपू, सौन।
अनवाल समुदाय : धारचूला व मुनस्यारी में अनवाल समुदाय अपनी बोली, विरासत, रीतिरिवाजों के लिए जानी जाती है। अनवाल यानी बकरी का चरवाहा। बकरी चुगाने वालों को अनवाल कहा जाता है। जंगलों की कमी से बकरी पालन अब कम होने लगा है। नए व्यवसायों की तरफ यह समुदाय बढ़ रहा है। इस समुदायों के लोग भगवान शिव के उपासक रहे हैं। झौड़े, चांचरी, ढुस्का, आन कथाएं इनकी संास्कृतिक विशेषताएं रही हैं। चरवाहे के रूप में देश रक्षा में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी वेशभूषा भी इन्हें अन्य समुदाय से अलग करती है।  होली से परहेज: धारचूला के ‘रं समाज’ में न तो होली गायन होता है न ही चीर बंधन जैसी कोई परंपरा है। धारचूला के दारमा, व्यास व चैदांस घाटी में रं समाज रहता है। यहां बोली संबंधी अड़चन व होली साहित्य के प्रचलन न होने से भी लोग होली को नहीं अपनाते हैं।
जोहार घाटी व शौका समाज : भाषा ही नहीं इन्होंने अपना पहनावा भी सुरक्षित रखा है। यहां महिलाओं की पारंपरिक पोशाक व वेशभूषा सहज की लोगों को अपनी और खींच लेती हैं। स्थानीय बोली में आभूषण व जेवरात को ‘हत-कान’ कहते हैं। पैजामा, चूड़ी व छ्यामटांग की तीन लड़ियां जोहार का विशिष्ट आभूषण रही हैं। कानों के आभूषण को स्यूंति बालि, गले के आभूषण को अुःतु व चांदी की चैड़ी पट्टी को चूड़ी कहते हैं। इसके अलावा अनैर, अतरदान व स्यू साड़ल आदि आभूषण भी लोकप्रिय हैं। अर्द्धचंद्राकार आभूषण जिसे त्वाड़, माला जिसे चनरहार व त्यलड़ कहते हैं। आभूषणों के आकार व मोटाई आदि बताती है कि इस सुरक्षा कवच का काम करती है। पांव में चांदी के मोटे आकार की पट्टी जिसे पायजामा कहते हैं। लड़कियां पांव में चांदी का खोखला जिसे गोलाकार छल्ला कहते हैं। जोहार की महिलाओं में स्यू-सांगल, अतरदान और चिम्ट-कनकुड़ि, चांदी की चेन या मोटे धगे से दाएं कंधे पर लटकाने की परंपरा रही है।
 हाशिए पर बरपटिया जनजाति : सीमांत की भोटिया जनजाति जहां समृद्धता की तरफ बढ़ी है, वहीं बरपटिया जनजाति सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होने के बाद भी जीवन स्तर की दृष्टि से काफी विपन्न व पिछड़ी हुई है। यह मुनस्यारी विकासखण्ड के 12 गांवों में निवास करती है। लेकिन आज तक यह विकास की मुख्यधारा में शामिल नहीं हो पाई है। कृषि से जुड़ाव के कारण शिक्षा से यह जनजाति वंचित हो गई। हालांकि आरक्षण मिलता है, लेकिन इसके बाद भी स्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आ पाया है। आर्थिक विपन्नता आज भी बनी हुई है। एक समय ऐसा भी था जब बरपटिया जनजाति के लोगों के पास मुनस्यारी में सबसे अधिक जमीन थी। भूमि संबंधी विवादों के लिए इनकी अपनी अदालत लगती थी। डाडाधर, बसंतकोट, तौमिक, चिलकोट, मदकोट की अदालतें आज भी लोगों की जुबान में हैं। कहा जाता है कि बारहपाटा का घाघरा व लमकोट काफी प्रसिद्ध था। गीत-संगीत के क्षेत्र में यह क्षेत्र में यह काफी प्रसिद्ध रहा है। हालांकि बरपटिया (ज्येष्ठा) जनजाति उत्थान समिति भी बनी है। शिक्षा में पिछड़ने के कारण ये आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र में भी पिछड़ते चले गए। मुनस्यारी के जिन 12 गांवों में यह जनजाति रहती है उनमें अलग-अलग उपजातियों के नाम से ये जाने जाते हैं। इन गांवों में खासियत यह है कि यहां रहने वाली जनजातियों की जाति के नाम से ही गांव के नाम पड़े हैं। बरपटिया जनजाति की विशेष पहचान उसकी वेशभूषा है। महिलाएं घाघरा पहनती हैं, जिसका पाट आगे की ओर रहता है। पुरूष बाखली पहनते हैं जो एक तरह का लंबा कोट होता है।

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