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सरकारी नौकरी पाने वालों की संख्या में जारी है गिरावट

भारतीय समाज में सरकारी नौकरी को लेकर एक अलग तरह का क्रेज देखने को मिलता है। इस नौकरी को पाने के लिए युवा दिन रात तैयारी करते जरूर हैं।लेकिन संसद में बताए आकड़े देखें तो बीते कुछ वर्षों में सरकारी नौकरी पाने वालों की संख्या में गिरावट आई है। केंद्रीय कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने 27 जुलाई को लोकसभा में बताया है कि वर्ष 2014-15 से 2021-22 के दौरान केंद्र सरकार के सभी विभागों में 7 लाख 22 हजार 311 लोगों को नौकरी दी गयी है। जबकि इन आठ वर्षो के दौरान केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए कुल मिलाकर 22 करोड़ 5 लाख 99 हजार 238 आवेदन प्राप्त हुए।

वर्ष 2014 – 15 में जितने आवेदन मिले थे उसमें से महज 0.56 प्रतिशत को नौकरी मिली। इस तरह से 2016 -17 की बात की जाए तो 0.44 प्रतिशत को सरकारी नौकरी मिली है। वर्ष 2017-18 में 0. 19 प्रतिशत लोंगो को नौकरी मिली है। वर्ष 2018 – 19 में नौकरी 0. 07 प्रतिशत लोगों को मिली। इस तरह से 2015 – 16 से लेकर 2021 – 22 को दौरान केवल 2019- 20 को छोड़ दिया जाए तो इन आठ वर्षों में कोई भी साल ऐसा नहीं रहा जिसमें आवेदनकर्ताओ के मुकाबले नौकरी पाने वालों की संख्या 0.50 प्रतिशत से अधिक हो। अगर वार्षिक औसत निकाला के तो यह आंकड़ा हर वर्ष केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए तकरीबन 2 करोड़ 75 लाख लोगों ने जरूर आवेदन किया है लेकिन नौकरी मिलने वालों का वार्षिक औसत महज 0.07 प्रतिशत से लेकर 0.8 प्रतिशत रहा है।

यह है देश में केंद्र सरकार की नौकरियों का हाल है। सरकार 20 जुलाई 2022 के संसदीय कार्यवाही के दौरान कार्मिक मंत्री जीतेन्द्र सिंह ने संसद में बेरोजगारी के हाल पर एक और आंकड़ें पेश किया। कार्मिक मंत्री ने लिखित जवाब दिया की वित्त मंत्रालय के डिपार्टमेंट ऑफ़ एक्सपेंडिचर के वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक केंद्र सरकार के सभी तरह के मंत्रालयों और विभागों में मार्च 1 साल 2021 तक तकरीबन 40 लाख 35 हजार पद ऐसे थे, जिनपर नियुक्ति की जानी थी। इनमें से महज 30 लाख 55 हजार पदों पर सरकारी नौकरी मिली हैं यानी तकरीबन 9 लाख 79 हजार पद अभी भी खाली हैं, जिन पर नियुक्ति नहीं हुई है।

इन आंकड़ों के अनुसार आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि 135 करोड़ वाले देश में केंद्र सरकार की महज 40 लाख नौकरी का क्या मतलब है? इसमें से भी करीब 9 लाख पदों पर नियुक्ति नहीं हुई है।

कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से ट्वीट किया गया था कि प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रालयों और विभागों के मानव संसाधन का मुआयना कर निर्देश दिया कि मिशन मोड के तहत अगले डेढ़ साल में 10 लाख लोगों की भर्ती की जाए। इस पर बेरोजगार युवाओं ने कहा कि मोदी जी जुमला नहीं जॉब दीजिए। आप पूछेंगे कि क्यों ? वर्ष 2014 में चुनाव से पहले भारत के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने लोगों से वादा किया था कि अगर उनकी सरकार सत्ता में आती है तो हर साल दो करोड़ नौकरियां देंगे। यानी सरकार को अब तक 16 करोड़ नौकरियां दे देनी चाहिए थी। इतनी नौकरियों पर सरकार ने क्या किया? सरकार की ओर से इस पर कोई रिपोर्ट कार्ड नहीं पेश किया गया।

वर्ष 2014 के बाद कितनी भर्तियां हुईं, कितने को सरकारी नौकरी मिली? कितने लोग बेरोजगरी से बाहर निकले? इस तरह के पुख्ता आंकड़े सरकार के जरिये नहीं पेश किये जाते हैं। सरकार ने अब तक कोई मुकम्मल रोजगार नीति नहीं बनाई है। अगर रोजगार नीति होती तो पता चलता कि केंद्र सरकार के किसी मंत्रालय और विभाग में कितना नौकरी है। उस पोस्ट को भरने के लिए कितने पोस्ट सैंक्शन किये जा रहे हैं? कितने भरे जा रहे हैं? कितने पोस्ट नहीं भरे गए हैं? यह सारी जानकारी सरकार की तरफ से पेश करने की कोई नीति नहीं है? यहां तक की गैर सरकारी क्षेत्र में कितनी नौकरियों की संभावना है? युवाओं को कितनी नौकरियां मिल रही हैं? कितना न्यूनतम वेतन होना चाहिए? देश के आबादी का कितना हिसाब लेबर फोर्स में जुड़ रहा है? इसमें से कितने युवाओं को नौकरी मिल रही है? इन सारी बातों को केंद्र सरकार किसी नियत अवधि पर साझा करना चाहिए जो केंद्र सरकार नहीं करती है।

देश में मौजूदा वक्त की रोजगार दर तकरीबन 40 प्रतिशत है। यानी काम करने लायक हर 100 लोगों में केवल 40 लोगों के पास काम है। 60 लोगों के पास काम नहीं है। मोदी सरकार के पिछले पांच साल के कार्यकाल का हिसाब किताब यह है रोजगार दर 46 प्रतिशत से घटकर 40 प्रतिशत पर पहुंच गयी है। जबकि वैश्विक मानक 60 प्रतिशत का है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकॉनमी के अध्यक्ष महेश व्यास बताते हैं कि हर साल भारत में तकरीबन 5 करोड़ लोगों को रोजगार मिलेगा तब बेरोजगारी की परेशानी दूर रहेगी।

 

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