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प्रधानमंत्री ने जिस झील को संवारने का वायदा किया, भूमाफिया ने उसे कब्ज़ा लिया 

‘‘न बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रूपैया’’, यह कहावत बाराबंकी स्थित सराही झील पर अवैध कब्जे को लेकर बिल्कुल फिट बैठ रही है। ऐसा इसलिए कि मुख्यमंत्री के सख्त आदेशों के बावजूद स्थानीय प्रशासन को रिश्वत की रकम ज्यादा रास आ रही है। शायद यही वजह है कि स्थानीय स्तर के जिम्मेदार अधिकारी न तो अपने विभागीय आला अधिकारियों से खौफ खा रहे हैं और न ही सुप्रीम कोर्ट के उन आदेशों की उन्हें परवाह है जिसमें सख्त हिदायत दी गई है कि जल स्रोतों पर यदि कब्जे पाए गए तो उन अवैध कब्जों को पूरी तरह से ध्वस्त करके उसके मूल स्वरूप में लाया जाए। वैसे तो इस तरह के खेलों में ग्राम प्रधान की भूमिका अहम मानी जाती है, लेकिन इस मामले में ग्राम प्रधान को कोई जानकारी ही नहीं। ऐसा इसलिए कि ग्राम प्रधान महिला है और वह भी पूरी अंगूठा छाप। ग्राम प्रधान का काम देखने वाला व्यक्ति ही इस पूरे खेल का मास्टर माइण्ड बताया जा रहा है। खास बात यह है कि बदसूरत झील की खूबसूरत तस्वीर पेश कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक को गुमराह किया गया 

बाराबंकी प्रशासन के झूठ का पिटारा खोलने से पहले यह बताना जरूरी है कि देश की सुप्रीम अदालत ने प्राकृतिक जल स्रोतों पर कब्जा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आदेश दे रखे हैं। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर तभी कार्रवाई की जा सकती है जब स्थानीय प्रशासन ऐसे भूमाफियाओं के प्रति सख्त हो जो प्राकृतिक जल स्रोतों पर कब्जा करके कंकरीट के जंगल खड़े करते आ रहे हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी भूमाफियाओं से किसी प्रकार का सम्बन्ध न रखते हों। राजधानी लखनऊ से मात्र 20 किलोमीटर दूर जनपद बाराबंकी का हाल कुछ ठीक नहीं है। स्थानीय प्रशासन न तो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करवा पा रहा है और न ही प्राकृतिक जल स्रोतों पर कब्जा जमाने वालों के खिलाफ किसी प्रकार की प्रभावी कार्रवाई। परिणामस्वरूप प्राकृतिक जल स्रोतों पर भूमाफियाओं का कब्जा बढ़ता जा रहा है। हद तो तब हो जाती है जब स्थानीय प्रशासन मुख्यमंत्री को ही नहीं, बल्कि पीएम तक को दिग्भ्रमित करके अपनी पीठ थपथपवा लेता है। मामला बाराबंकी की ऐतिहासिक सराही झील पर अवैध कब्जा और स्थानीय प्रशासन द्वारा यूपी सरकार को दिग्भ्रमित किए जाने से सम्बन्धित है। स्थानीय प्रशासन कहता है कि सराही झील को मृत्यु शैया से जीवन प्रदान करने में स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों का सहयोग है और इस झील को नया जीवन देने में सरकारी कोष का इस्तेमाल भी नहीं किया गया। सच यह है कि सराही झील को जीवन प्रदान करने की कोशिश में लाखों रुपए व्यय कर दिए गए इसके बावजूद न तो सराही झील का जीवन बेहतर हुआ और न ही भूमाफियाओं के चंगुल से सराही झील की जमीन को ही आजाद करवाया गया।
स्थानीय पुलिस, भूमाफिया और लोकतंत्र के स्वयंभू चतुर्थ स्तम्भ का काकस बाराबंकी जनपद की ऐतिहासिक सराही झील पर गिद्ध नजर जमाए बैठा है। हालांकि पीएम मोदी की विशेष रुचि के पश्चात इसके अस्तित्व को बचाने में स्थानीय प्रशासन हरकत में अवश्य आया लेकिन प्रशासन की ये तेजी चंद दिनों की मेहमान रही। बताते चलें कि विगत वर्ष गणतंत्र दिवस के अवसर पर पीएम मोदी ने इस सराही झील को संवारे जाने की बात कही थी। चंद दिनों की तेजी के बाद अब मौजूदा हकीकत से भी रूबरू हो लीजिए। हालांकि इस दौरान सराही झील में तटबंध भी बना और पानी भी रूका लेकिन इस झील के एक बडे़ हिस्से पर भूमाफियाओं की नजरें गड़ी हुई हैं। रही बात झील को लेकर प्रगति की तो यह प्रगति सिर्फ सरकारी फाइलों तक ही सीमित है। करोड़ों खर्च के बाद कागजों में भले ही सराही झील को झील कहा जा रहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि यह झील तालाब की शक्ल में है। इस झील में विदेशी पक्षी तो नहीं अलबत्ता कुछ बन मुर्गियां और सुअर अंठखेलियां करते नजर आते हैं।
यह जान लेना भी अब जरूरी है कि अपने अस्तित्व के आखिरी दिन गिन रही इस झील के बारे में मोदी के समक्ष ये झूठा प्रचार किसने किया कि सराही झील का कायाकल्प स्थानीय ग्रामीणों के सहयोग से बदला। हकीकत यह है कि 20 जून से 10 जुलाई 2019 के बीच झील में जेसीबी मशीनें गरजती रहीं। स्थानीय नागरिक इस सच्चाई की पुष्टि करते हैं। इतना ही नहीं सरकारी फाइलों में भी प्रति घंटा आठ सौ रूपए की दर से जेसीबी का भुगतान किया जाना दर्शाया गया। एक जेसीबी हैदरगढ़ से मंगाई गई थी और एक टिकैतनगर इलाके से।
खेल कुछ इस तरह से खेला गया। भूमाफियाओं के इरादों को पूरा करने की गरज से सबसे पहले सराही व बघौली गांव के मध्य उस नाले को बंद किया गया जिससे झील में बारिश के दौरान पानी एकत्र होता था। इसके बाद जेसीबी मशीन से ही झील के बीच से ही एक तटबंध बना दिया गया। परिणामस्वरूप झील दो हिस्सों में बंट गई। सरकारी दस्तावेजों में एक भाग को झील के रूप में दिखाने के लिए सुरक्षित कर लिया गया और दूसरे भाग पर भूमाफियाओं द्वारा अवैध तरीके से कब्जा करने के लिए सुरक्षित कर लिया गया। चर्चा है कि झील पर कब्जा करने वालों में सराही गांव निवासी सुशील कुमार सिंह समेत तमाम अन्य भूमाफियाओं की भूमिका संदिग्ध है। बताते चलें कि सुशील कुमार सिंह गांव की अंगूठा छाप ग्राम प्रधान सरपती को भरोसे में लेकर उनका काम देखते आ रहे हैं। चर्चा तो यह भी है कि सुशील कुमार सिंह ग्राम प्रधान से उन कागजों पर भी हस्ताक्षर करवा लेते हैं जो नियम विरूद्ध कार्य से सम्बन्धित होते हैं। परिणामस्वरूप जब कभी मामला सामने आता है तो ग्राम प्रधान सरपता पर गाज गिरती है।
रही बात पीएम के उन दावों की जो उन्होंने गणतंत्र दिवस के अवसर पर किए थे, उन दावों की हकीकत यह है कि जो चंद पक्षी इस झील की शोभा बढ़ाते थे वे भी जेसीबी मशीनों के शोर से अन्यत्र चले गए। इस ऐतिहासिक झील में अब न पक्षियों का कलरव गूंजता है और न ही झील शब्द को प्रमाणित करता पानी। देखने से लगता है यह कोई झील नहीं बल्कि तालाब हो। ऐसे में यदि यह कहा जाए कि स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों ने पीएम मोदी को ही भ्रमित कर दिया तो शायद गलत नहीं होगा। इलाके में चर्चा इस बात की है कि यदि पीएम मोदी मंच से भाषण देने से पूर्व स्वयं टीम के साथ स्थलीय निरीक्षण करते तो शायद उनके भाषणों पर खिल्ली न उड़ायी जा रही होती।
भूमाफियाओं ने ‘हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए वह खेल खेला जिसने स्थानीय प्रशासन को इस चिंता में डाल दिया है कि यदि किसी समय खेल का पर्दाफाश हुआ तो निश्चित तौर पर उनके खिलाफ कार्रवाई तय है। हुआ ये कि मनरेगा के तहत मजदूरों से कार्य करवाने के बजाए भूमाफियाओं ने जेसीबी से मेड़बंदी करा डाली। इसके बाद स्टीमेट पास करा कर मनरेगा के बजट से लाखों की हेराफेरी करने की योजना बनाई गई। भला हो तत्कालीन बीडीओ आदित्य तिवारी का जिन्होंने योजना भांपकर मंजूरी देने से इनकार कर दिया। या यूं कह लीजिए बीडीओ ने अपनी जान बचाने की गरज से अपने हाथ पीछे खींच लिए। बताते चलें कि जेसीबी के काम को मनरेगा में दर्शाकर पैसा रिलीज करने का दबाव एक तहसील स्तरीय अधिकारी ने भी बनाया था, लेकिन तत्कालीन बीडीओ की सतर्कता के चलते सरकारी खजाना तो लुटने से बच गया लेकिन सराही झील को भूमाफियाओं के चंगुल से नहीं बचाया जा सका। मौजूदा स्थिति जस की तस बनी हुई है। हालांकि स्थानीय समाचार पत्र ने भी खबर प्रकाशित की लेकिन उसका भी कोई पुरसाहाल नहीं। मानो सरकार ने कानों में रूई डाल रखी हो।
आमतौर पर ग्रामीण अंचलों में ऐसे मामलों के लिए प्रधान को मुख्य रूप से दोषी माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि प्रधान की मिलीभगत के बगैर इस कृत्य को अंजाम नहीं दिया जा सकता। साथ ही इलाकाई लेखपाल भी ऐसे मामलों में बराबर का दोषी होता है। रही बात ग्राम प्रधान की तो इस गांव की महिला प्रधान सरपता अंगूठा छाप है। हस्ताक्षर करना भी उन्होंने तब सीखा जब वह प्रधान बन गयी। स्पष्ट है कि महिला प्रधान सरपता को आसानी से दिग्भ्रमित किया जा सकता है और हुआ भी कुछ ऐसा ही। ग्रामीणों की मानें तो सरपता तो नाम मात्र की प्रधान है जबकि प्रधानी का समस्त कार्य उनके पति देखते हैं। हालांकि ये अनैतिक है और इसकी जानकारी समस्त आला अधिकारियों को भी है लेकिन किसी ने कभी हस्तक्षेप नहीं किया।
स्थानीय ग्रामीण भी यही कहते हैं कि सम्बन्धित कार्य के लिए 300 घण्टे जेसीबी चलायी गयी है। हालांकि मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों में जेसीबी से कार्य नहीं कराया जाता है लेकिन प्रधान पति ने जिम्मेदार अधिकारियों से सांठगांठ करके न सिर्फ जेसीबी से कार्य करवाया बल्कि जेसीबी का भुगतान किए जाने की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया। इस खेल में एसडीएम (रामसनेही घाट) की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। ऐसा इसलिए कि जेसीबी से कराए गए कार्य का भुगतान करवाने का भरोसा एसडीएम (राम सनेही घाट) ने दिया था। एसडीएम ने भरोसा दिलाया था कि वे बीडीओ से कहकर झील की मेड़बंदी का भुगतान मनरेगा योजना के धन से करवा देंगे। अब प्रश्न यह उठता है कि आखिर एसडीएम ने ठेकेदार को गैरकानूनी भरोसा क्यों दिया? दूसरी ओर प्रधान का कार्य देख रहे सुशील का कहना है कि एसडीएम के मुकर जाने के कारण उन्हें अपनी जेब से 02 लाख 40 हजार रुपयों का भुगतान करना पड़ा है, जबकि उन्हें एक पैसा कहीं से नहीं मिल सका। बताते चलें कि सराही झील का एक बड़ा भाग (27 हेक्टेयर) सराही गांव में आता है और 15 हेक्टेयर भाग बनगावां गांव में।
स्थानीय मीडिया ने भी इस खेल में जमकर धन उगाही की। सराही गांव निवासियों का कहना है कि जिस अखबार की खबर के साथ सराही झील की फोटो छापी गयी थी, दरअसल वह फोटो सराही झील की थी ही नहीं। सराही झील तो अभी भी दयनीय दशा में है। मीडिया का भ्रमजाल उस वक्त खुलकर सामने आया जब नवनियुक्त एसडीएम (राम सनेही घाट) राजीव शुक्ल ने सराही झील का दौरा किया। श्री शुक्ल पर्यावरण प्रेमी हैं। वे इससे पूर्व अयोध्या (फैजाबाद) की तहसील सोहावल में एसडीएम रह चुके हैं।
हुआ यूं कि एक मीडियाकर्मी ने अधिकारियों को दिग्भ्रमित करने की गरज से सोहावल तहसील में समदा झील की फोटो उनसे लेकर अखबार में प्रकाशित कर दी। तस्वीर भी ऐसी थी मानो सराही झील में पंछियों का कलरव गूंज रहा हो। इस बात की जानकारी उस वक्त एसडीएम महोदय को भी नहीं थी, या यूं कह लीजिए कि जानकारी होने के बावजूद उनके फेवर की गलती को वे पूरी तरह से पचा जाना चाहते थे। उक्त मीडियाकर्मी किस अधिकारी को खुश करने के लिए ऐसा कर रहा था? ये जांच का विषय हो सकता है लेकिन इस अखबार ने एक बार नहीं, बल्कि दो बार (18 और 25 जनवरी 2020) खूबसूरत पक्षियों वाली तस्वीर के साथ सराही झील की तारीफ कर डाली। साथ ही एसडीएम महोदय की तारीफ में भी पुल बांधे गए। खबर का असर यह हुआ कि सराही झील को पक्षी विहार के रूप में विकसित करने सम्बन्धी आदेश जारी हो गए। जाहिर है योजना को कागजों पर उतारने से पूर्व अधिकारियों का स्थलीय निरीक्षण भी जरूरी हो जाता है। जब इसकी जानकारी स्थानीय मीडिया को लगी तो बड़ी संख्या में पत्रकारों का समूह सराही झील की हकीकत जानने पहुंचा। स्थलीय कवरेज के दौरान जो नजारा सामने आया उसकी हकीकत से एसडीएम को भी अवगत कराया गया। कहना गलत नहीं होगा कि 50 प्रतिशत से ज्यादा झूठी खबर का ऐसा जाल बुना गया कि पीएम मोदी भी उसी जाल में फंस गए और ग्रामीणों की तारीफ करते हुए सराही झील को पक्षी विहार के रूप में संवारने के आदेश जारी कर दिए।
अधिकारियों के दौरे के दौरान यह बात सामने आयी कि तटबंध (सराही झील में) बनाने में किसी ने श्रमदान नहीं किया और न झील में वैसा कलरव है, जैसा प्रचारित किया गया। 80 प्रतिशत से अधिक सूख चुकी सराही झील में चार-छः सारस, 20-25 वनमुर्गी, बगुले उड़ते नजर आए। एसडीएम ने दूरबीन से भी देखने की कोशिश की लेकिन उन्हें भी दूर तक कोई पक्षी नजर नहीं आया। अलबत्ता सूख चुकी झील में आसपास के गांव वालों के सुअर चरते हैं। हालांकि झील का पानी जिस नाले से घाघरा नदी में बह जाता था उस नाले को बंद करने की वजह से झील में पानी ठहरना शुरू अवश्य हुआ है लेकिन ये तटबंध झील के किनारे से करीब डेढ़ सौ मीटर दूरी पर बनाया गया है। इसके पीछे की मंशा झील की करीब दो सौ बीघा भूमि पर कब्जा करने की है।
ग्रामीणों का कहना है कि दलित महिला प्रधान सरपता का काम देखने वाले सुशील सिंह मोटी कमाई के मूड में थे। जेसीबी से तटबंध बनवाने में जितना धन खर्च हुआ उससे तीन गुना ज्यादा का भुगतान मनरेगा से कराने की कोशिश की गयी थी। यह भुगतान हो भी जाता यदि समय रहते ‘पूरेडलई ब्लाक’ के तत्कालीन खंड विकास अधिकारी आदित्य तिवारी ने हस्तक्षेप न किया होता। हालांकि स्थानीय प्रशासन अभी भी तटबंध के कार्य को मनरेगा के तहत करवाए जाने की बात कह रहा है लेकिन जेसीबी मशीन से खुदाई करवाने वाले ठेकेदार सुशील सिंह स्वयं कहते हैं कि उन्होंने 20 जून 2019 से 10 जुलाई 2019 तक जेसीबी से तटबंध बनवाया। रुपये ब्लाक से मंजूर नहीं हुए तो अपने पास से जेसीबी का किराया देना पड़ा। प्रश्न यह भी उठता है कि आखिरकार स्थानीय प्रशासन क्यों इस बात को छिपा जाना चाहता है? बताया जा रहा है कि सुशील सिंह ने अधिकारियों के मौखिक आदेश पर ही लाखों की रकम खर्च करके जेसीबी से काम करवाया था और वह अपने पैसों की मांग लगातार करता आ रहा है। फिलहाल ऐतिहासिक सराही झील पर भूमाफियाओं का अवैध कब्जा बना हुआ है, वह भी तब जब स्थानीय प्रशासन से लेकर शासन स्तर तक दोषी व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई किए जाने के निर्देश दिए जा चुके हैं। दूसरी ओर स्थानीय निवासी सरकार से पूछ रहे हैं ‘कहां है आपकी एंटी भूमाफिया टास्क फोर्स।’

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