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पहले से ही खुदकुशी का मन बनाकर बैठी थी कांग्रेस, ये है हार की असल वजह

पहले से ही खुदकुशी का मन बनाकर बैठी थी कांग्रेस, ये है हार की असल वजह

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत हुई। लेकिन कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला पाया। कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा ने इस हार की जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। कांग्रेस अपने केवल तीन सीटों पर जमानत बचा पाई है। बाकी सभी सीटों पर कांग्रेस की जमानत जब्त हो गई है। ये पहली बार नहीं हुआ है। कांग्रेस ने 2015 के विधानसभा चुनाव में भी एक भी सीट हासिल नहीं कर पाई थी। कांग्रेस में दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष का पद हमेशा से खाली रहता आया है।

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस की दिग्गज नेता शीला दीक्षित के बाद से ही कांग्रेस पार्टी दिल्ली में शिथिल पड़ गई थी। शीला दीक्षित के नेतृत्व में लगातार 15 साल तक कांग्रेस की सत्ता रही है। उनके देहांत के बाद अजय माकन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। लेकिन 2018 में अजय ने अपने तबियत खराब होने का हवाला देकर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद से फौरी तौर पर तीन कार्यकारी अध्यक्ष काम कर रहे थे जो पहले शिला दीक्षित के नेतृत्व में कार्य कर रहे थे।

कांग्रेस के नेता न तो उतनी सक्रियता से विधानसभा चुनावों में उतरते नजर आए और न ही पार्टी का शीर्ष नेतृत्व दिल्ली चुनाव के लिए गंभीर नजर आया। जिसके कारण कांग्रेस की एक बार फिर करारी हार हुई। हालांकि, इस हार की कहानी खुद पार्टी के नेता चुनाव से पहले ही लिख चुके थे। ये बात किसी से नहीं छुपी है कि कांग्रेस पार्टी में आपस में ही नेताओं की कहा-सुनी से मन-मुटाव बना रहता है। जो पार्टी में आपसी तालमेल न हो उस पार्टी पर जनता विश्वास करने से कतराती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है 72 साल के सुभाष चोपड़ा को चुनाव अभियान समिति का अचानक से अध्यक्ष बना देना।

अंदरखाने में ये खबर है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल को टक्कर देने के लिए कांग्रेस ने पूर्व सांसद और क्रिकेटर कीर्ति आजाद को चुना था। कीर्ति आजाद के जरिए कांग्रेस पूर्वाचलियों का वोट अपने पाले में करने के फिराक में थी। लेकिन जब इस बात की जानकारी कांग्रेस पार्टी के दिग्गज नेताओं को मिली तो वे पार्टी निर्णय के खिलाफ खड़े हो गए। इसके बाद सोनिया गांधी के पास ये संदेश भेजवाया गया कि अगर कीर्ति आजाद को कमान सौंपी गई तो दिल्ली में बगावत होनी तय है। बताया जा रहा था कि चुनाव पास होने के कारण मजबूरन सुभाष चोपड़ा को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया।

सुभाष चोपड़ा की नियुक्ति के कुछ ही दिनों के बाद उनकी कीर्ति आजाद और दिल्ली के प्रभारी पीसी चाको से बहस हो गई। यहां तक कि ये तीनों सोनिया गांधी के सामने भी लड़ पड़े। इसलिए बेहतरीन टीम होने के बावजूद बिखरी हुई दिखी, जिसका असर विधानसभा चुनाव में पड़ा। कांग्रेस के कई उम्मीदवारों के पास प्रचार के लिए कार्यकर्ता तक नहीं थे। और जिन उम्मीदवार के पास प्रत्याशी थे उन्हें मतदाता जानते तक नहीं थे। ऐसे में न तो जनसंपर्क ठीक तरह से हो पाया न मतदाता तक कांग्रेस अपनी बात ठीक तरह से पहुंचा पाई। कांग्रेसी दिग्गज सिंधिया जीत के लिए जोर लगा रहे थे, पर आम कांग्रेसी भी यह मानकर चल रहे थे कि प्रदेश में उनकी सरकार नहीं बन पाएगी। कांतिलाल भूरिया जैसे दिग्गज नेता भी केवल मुंह दिखाई की रस्म अदा करते हुए दिखाई दिए।

इससे साफ हो गया था कि कांग्रेस भेड़ चल में बस चाल रही थी और जीत के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही थी। अब कांग्रेस के सभी 67 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है। केजरीवाल के अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने 53.6 फीसद वोट हासिल कर 62 सीटों पर अपनी जीत दर्ज की। जबकि 2015 में 52 फीसद मतों के साथ दिल्ली में 70 विधानसभा सीटों में 67 दर्ज की थी। दूसरी ओर भाजपा के वोट बढ़े हैं। 2015 की विधानसभा चुनाव में पार्टी को 32 फीसद वोट मिले थे जो इसबार बढ़कर 38.5 फीसद हो गई है। भाजपा ने 8 सीटों पर जीत दर्ज की है। देखा जाए तो इस बार सबसे अधिक नुकसान कांग्रस को हुआ है। इसे पिछले बार 9 फीसद वोट मिले थे जो अब घटकर 4 फीसद पर आ गई है।

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