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सभी राज्यों में पुलिसकर्मी की स्थिति बद से बदतर

पुलिस विभाग का प्रत्येक सिपाही देश की सुरक्षा में तैनात रहता है। इनके कार्य की कोई समय सीमा नहीं होती है। 8-12 घंटे ड्यूटी पर तैनात सिपाही को जब भी कोई घटना हो तो उसको जाना ही पड़ेगा ।

कुछ दिनों पहले फिरोजाबाद से एक सिपाही मनोज कुमार का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा था। उस वीडियो में रो -रो कर मनोज कुमार ने लगातार ड्यूटी कर रहे सिपाहियों की व्याथा के बारे में बताया था | उसने इस वीडियो के जरिए बताया कि दिनभर की थकावट के बाद अच्छे भोजन की हर कोई चेष्टा करता है लेकिन प्रशासन की और से दिए जाने वाले भोजन में कोई भी गुणवत्ता नहीं होती है। उसका यह वीडियो इतनी तेजी से वायरल हुआ कि प्रसाशन को इसकी जांच पड़ताल का आदेश जारी करना पड़ा ।

यूपी ही नहीं देश के हर राज्य में सिपाहियों के हालात  कुछ इसी तरह के देखे गए हैं। फिर चाहे वो उत्तर प्रदेश ,गुजरात ,बिहार ,राजस्थान, मध्य प्रदेश ,छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तराखंड या झारखंड ही क्यों न हों?  इन सिपाहियों को खाना, छुट्टी, पेट्रोल अलाउंस और मेडिकल जैसी सुविधा की स्थिति खराब है। पुलिस कर्मियों को कार्य हेतु बाहर आने जाने के लिए सरकार की और से परिवहन भत्ता तो दिया जाता है। लेकिन वो नकाफी सिद्ध हो रहा है।

अधिकतर राज्यों में तो ये भत्ता दिया ही नहीं जाता। उत्तर-प्रदेश में पुलिसकर्मियों को हर महीने पेट्रोल अलाउंस के रूप में दो सौ रुपए से सात सौ रुपए तक दिए जाते है। जबकि यूपी में एक लीटर पेट्रोल 97 रुपए का है। मध्यप्रदेश में 100 रुपए महीने साइकिल भत्ता दिया जाता है। पेट्रोल के लिए दिल्ली में सबसे ज्यादा ट्रैवल भत्ता 4,824 रुपए दिया जाता है।

वहीं महाराष्ट्र में पुलिसवाले सरकारी बसों में फ्री सफर कर सकते हैं। इसकी वजह से कभी कभी वो ड्यूटी पर लेट पहुँचते है। इसके बावजूद भी वायरल वीडियों में सिपाही मनोज कुमार के मुताबिक पुलिस कर्मियों को कच्ची रोटी और पानी युक्त दाल परोसी जाती है । जिसमें पोषण की गुणवत्ता बेहद निम्नस्तर वाली हैं । इसे लेकर जब अधिकारियों से उन्होंने शिकायत की तब उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया।

सिपाहियों को दिया जाने वाला भोजन भत्ता नकाफी

सभी राज्यों में पुलिस कर्मियों को खाने के लिए सरकार उनकी तनख्वाह में भोजन रुपी भत्ता भले ही जोड़ कर देती है। लेकिन पोषण युक्त भोजन का खर्चा पुलिस सिपाहियों को दिए गए भत्ते से दुगना पड़ जाता है ।

मध्यप्रदेश में जवानों को केवल 45 रुपए भोजन भत्ता मिलता है। जो कि देश भर में सबसे कम है । इसके अलावा पौष्टिक आहार के लिए हर महीने 650 रुपए मिलते हैं। गुजरात और छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेशों में भोजन के लिए ये भत्ता 6 हजार रुपए प्रति महीना मिलता है । वहीं महाराष्ट्र में ये भत्ता 750 रुपए प्रति महीने तनख्वाह में जुड़कर आते हैं।

पॉलिटिक्स दबाव में सिपाही

राज्यों में सिपाहियों की कमी की वजह से ही जवानों पर काम का बोझ बढ़ता जा रहा है । कई बार ऐसा होता है कि उन्हें उनके जरूरी कामों के लिए भी अवकाश नहीं मिल पाते है। सिपाहियों द्वारा ड्यूटी रोस्टर में आठ या बारह घंटे की ड्यूटी पर हस्ताक्षर किये जाते है। लेकिन अफसरों के अनुसार पुलिस वालों के कार्य के घंटे तय नहीं है । उन्हें वीआईपी ड्यूटी हो या त्योहार दंगों की स्थिति में तो चौबीस से तीस घंटे तक ड्यूटी पर सिपाहियों को रहना पड़ता है। दिल्ली , बिहार जैसे प्रदेशों में इन सिपाहियों की ड्यूटी का कोई टाइम फिक्स नहीं है।मध्यप्रदेश में फील्ड पर रहने वाले कुछ- कुछ पुलिसकर्मियों को तो सुबह 9 बजे से रात 11 बजे तक काम करना पड़ता है।

यूपी के ADG रैंक के अधिकारी के मुताबिक एक सिपाही हर दिन कम से कम 12 घंटे की ड्यूटी करता है। उसके लिए हफ्ते भर में कोई छुट्टी नहीं होती। वह लोगों के सामने एक आदर्श बनने की कोशिश करता है। अगर उनकी यूनिफार्म उतरवाकर देखी जाए तो दस में से चार की बनियान फटी होगी, यहां तक मोजे भी फटे हुए मिलेंगे।

पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के अनुसार यूपी में पुलिस सिपाही से लेकर डीजीपी तक पर पॉलिटिकल दबाव रहता है। उनके अनुसार सारी राजनीति थाना, चौकी और तहसील की है। किस पर केस दर्ज करना है, चार्जशीट में कौन होगा और कौन नहीं, राजनीति का यह पूरा खेल पुलिस सिस्टम से ही चलाया जाता रहा है।

पुलिस विभागों की समस्याएँ

देश में विभिन्न राज्यों के पुलिस विभागों में संख्या बल की भारी कमी है। करीब 732 व्यक्तियों पर एक पुलिसकर्मी की व्यवस्था की गई है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने हर 450 व्यक्तियों पर एक पुलिसकर्मी की सिफारिश की है। पुलिस को अपने कार्य निर्वहन के दौरान , पुलिस बल के काम करने की परिस्थितियाँ ,पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति पुलिसकर्मियों पर काम का अतिरिक्त दबाव ,पुलिस की नौकरी से जुड़े अन्य मानवीय पक्ष ,पुलिस पर पड़ने वाला राजनीतिक दबाव जैसी कई समस्याएँ का जिक्र है।

पुलिस विभाग को इन परेशानियों से बचाया जा सके इसके लिए कई कमेटियांबनाई गई हैं। जो की बेअसर होती दिखाई दे रही है। आपातकाल के दौरान हुई बर्बरता की जाँच के लिये गठित शाह आयोग द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हो पाए इसके लिए पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त रखना होगा ।

राज्य स्तर पर गठित कई पुलिस आयोगों ने भी पुलिस को बाहरी दबावों से बचाने की सिफारिशें की थीं। इन समितियों ने राज्यों में पुलिस बल की संख्या बढ़ाने और महिला कांस्टेबलों की भर्ती करने की भी सिफारिश की थी। लेकिन नतीजा कुछ खास नहीं रहा ,अर्थात् किसी भी आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही नहीं की गई।  साल 2006 में सोली सोराबजी समिति ने मॉडल पुलिस अधिनियम का प्रारूप तैयार किया था, जिसे केंद्र और राज्य सरकार के पास विचार करने के लिए भेजा गया था। लेकिन उस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

पुलिस सुधार आयोग हेतु बनाई गई थी ये कमेटियां

पुलिस विभाग सुधार करने की मांग कई बार की गई। इसके लिए कई कमेटियां बनाई गई। इन कमेटियों के होने के बावजूद भी इन कमेटियों का परिणाम कुछ खास नहीं निकल पाया। पुलिस सुधार के लिए 4 बड़ी कमेटियां बनाई गई थी । इसके बावजूद भी पुलिस कर्मियों की स्थिति में कोई सुधार नहीं देखने को मिल रहा।

“जोएफ रबेरियों कमेटी ” ये कमेटी 25 मई 1998 को बनाई गई थी। इसे राष्ट्रीय पुलिस आयोग समेत विधि आयोग ,मानव अधिकार आयोग और वोहरा समिति के सिफारिशों को अम्ल लाने के साथ राज्यों में हुए काम का रिव्यू देना होता है।

दूसरी कमेटी “पद्मनाभैया कमेटी” है। जो पांच जनवरी साल दो हजार में बनी। पद्मनाभैया कमेटी को पुलिस की क्षमता और कमजोरी के साथ लोगों की अपेक्षा और काम- काज के अंतर को समझना। पुलिस को आधुनिक तकनीक को अपनाने के लिए सुझाव देने थे।

वीएस मलिपथ कमेटी 24 नवम्बर को न्यायाधीश डॉक्टर वीएस मलिपथ के नाम पर यह कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी ने जांच का काम अलग करने राज्य पुलिस सुरक्षा आयोग बनाने ,आईपीसी, सीआरपीसी ,और इंडियन एविडेंस की समीक्षा देनी थी।

वहीं आरएस मुशहरी कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी को भी 2012 में राष्ट्रीय पुलिस आयोग और अन्य समितियों की सिफारिश हेतु समीक्षा के लिए बनाया गया था। इसे इन आयोगों और समितियों की सिफारिशों की जांच करनी थी जिन्हे अमल में लाना व्यवहारिक तौर पर मुमकिन नहीं है। क्योकि राज्य सरकार पुलिस सुधारों में सहयोग नहीं कर रही है। इसकी वजह पुलिस की स्थितियों में सुधार होने की चूक हो रही है।

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