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दो विपरीत ध्रुव एक नहीं हो सकते। लिहाजा लोकसभा चुनाव के दौरान ही तय था कि सपा-बसपा ज्यादा समय तक साथ-साथ नहीं चल पाएंगे

आखिर वही हुआ जैसा कि लोकसभा चुनाव के वक्त अंदेशा लगाया जा रहा था। अपना अस्तित्व बचाने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी चौबीस साल से चली आ रही दुश्मनी को दरकिनार कर उत्तर प्रदेश में गठबंधन तो कर गए, लेकिन सब जान रहे थे कि यह अवसरवादी गठबंधन दीर्घायु नहीं होगा। हालांकि आमतौर पर गठबंधन बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन सपा-बसपा गठबंधन के मूल में एक तो अतीत की अंदरूनी गांठें पड़ी हुई थी और दूसरे भविष्य में दोनों को अलग-अलग राह पकड़नी ही थी। दोनों ओर की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं लंबे समय तक एक साथ नहीं चलने देती।

चुनाव पूर्व विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फिर से सत्ता आने से रोकने के उद्देश्य से राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन के तमाम प्रयास किए थे। शरद पवार, चंद्र बाबू, ममता बनर्जी, अखिलेश, मायावती आदि नेताओं ने इस बारे में अपने-अपने स्तर से पहल की थी। कांग्रेस भी इस दिशा में प्रयासरत रही, लेकिन उसे भी सफलता नहीं मिली। यहां तक कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा और राष्ट्रीय लोकदल ने उसे अपने गठबंधन का हिस्सा बनाने की जरूरत तक नहीं समझी। राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन बनाने का विपक्षी दलों का प्रयास बेशक सफल रहा, लेकिन यूपी में हुआ गठबंधन पूरे चुनाव के दौरान चर्चाओं में रहा। हर जगह यही चर्चा रही कि क्या सपा-बसपा का वोट बैंक एक-दूसरे को ट्रांसफर हो पाएगा? राजनीतिक पंड़ितों को लग रहा था कि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का चौबीस साल बाद एकजुट होना भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फिर से सत्ता में आने का सपना चकनाचूर भी हो सकता है।

राजनीतिक पंडितों का ऐसा सोचना अकारण नहीं था। अतीत के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो सन् 1993 के यूपी विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह और कांशीराम ने गठबंधन कर राज्य में भाजपा की राह रोक दी थी। उस चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ जाने के बावजूद मुख्यमंत्री रह चुके कल्याण सिंह फिर से सत्ता में नहीं लौट पाए थे। यह अलग बात है कि समय के साथ महत्वाकांक्षाओं का टकराव हुआ और गठबंधन के शीर्ष नेताओं के दिलों में नफरत की ऐसी गांठें पड़ी कि जिनका उपचार असंभव था। नतीजा यह हुआ कि 2 जून 1995 को बसपा सरकार से अलग हो गई। ऐसे में मुलायम सिंह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं रह सकते थे। लिहाजा उनके समर्थकों का नाराज होना स्वाभाविक था। लेकिन यह नाराजगी इस तरह आक्रोश में तब्दील हुई कि उसकी परिणति ‘गेस्ट हाउस’ कांड के रूप में सामने आई। समर्थन वापसी के बाद सपा की दूसरी सबसे बड़ी नेता मायावती राजधानी लखनऊ स्थिति गेस्ट हाउस में ठहरी हुई थीं। दोपहर के समय बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं जो कि सपा समर्थक बताए गए, ने गेस्ट हाउस के उस कमरा नंबर एक को घेर लिया जहां मायावती ठहरी हुई थीं। कार्यकर्ताओं ने मायावती को न सिर्फ भद्दी-भद्दी गालियां दी, बल्कि उन पर हमला करने को आमादा थे। अगर उस समय के भाजपा विधायक ब्रह्म दत्त द्विवेदी ने आगे बढ़कर उन्हें न रोका होता तो बहुत संभव था कि मायावती हमले की शिकार भी हो जातीं। यही वजह है कि मायावती द्विवेदी को हमेशा अपना भाई मानती रहीं।

जिस ‘गेटस हाउस’ कांड को मायावती कभी भुला नहीं पाईं उसे दरकिनार करते हुए 2019 के आम चुनाव में वे एक बार फिर मुलायम के साथ एक मंच पर खड़ी हुईं। इसका उन्हें फायदा भी हुआ। 2014 के आम चुनाव में जहां उत्तर प्रदेश में उन्हें एक भी सीट नहीं मिली थी, वहीं इस बार 10 सीटें हासिल हुई। अब मायावती यह दलील दे रही हैं कि यादवों के वोट जब सपा को ही नहीं पड़े तो उन्हें क्या ट्रांसफर हुए होंगे, लेकिन इस सच को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है कि गाजीपुर, घोसी, जौनपुर और लालगंज जैसी जिन सीटों पर यादव वोटों की अच्छी संख्या है, वहां बसपा प्रत्याशी कैसे जीत गए?

गाजीपुर में रेल मंत्री मनोज सिन्हा कैसे हार गए? अखिलेश के मुकाबले मायावती काफी ज्यादा फायदे में रही हैं। अगर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जनता को राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अपने पक्ष में सहमत न किया होता तो तब बसपा की स्थिति और भी मजबूती होती। राष्ट्रवाद की लहर के चलते जातीय व क्षेत्रीय समीकरण टूटे और गठबंधन का प्रयोग 1993 के विधानसभा चुनाव की तरह सपा-बसपा के लिए लाभदायक साबित नहीं हो सका।

बहरहाल दोनों पार्टियां 1993 की पुनरावृत्ति कर भी लेती तो तब भी गठबंधन का टूटना तय था। राज्य में दोनों दलों के जनाधार उन्हें ऐसे विपरीत धु्रव का आकार देते हैं जिसमें लंबे समय तक साथ चल पाने की संभावनाएं नहीं रहती। यही वजह रही कि मायावती ने हार का ठीकरा अखिलेश कि सर फोड़कर अलग राह चलने का ऐलान किया। संभवतः उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव की दृष्टि से इसी में अपना हित दिखाई दिया। शायद उन्हें यह भी अहसास हो चुका है कि अब उत्तर प्रदेश में गठबंधन का प्रयोग प्रभावी साबित नहीं होगा। लोकसभा चुनाव में जनता ने जातीय समीकरणों को नकार डाला है। अब महज जाति के नाम पर वोट हासिल नहीं किए जा सकते, बल्कि जनता को ठोस काम कर दिखाने की जरूरत होती है।

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