आमतौर पर मर्दानगी की ऊपरी परख कुश्ती, आर्म रेसलिंग जैसे खेलों से करने की कोशिश होती है, पर यह सही नहीं है। बहुत कम युवाओं को पता है कि उनकी मर्दानगी की असल पड़ताल माइक्रोस्कोप से की जाती है। इसे स्वीकारना ही होगा। हाल तक भी मर्दानगी पर सवाल नहीं उठते थे। लोग यही मानते कि हर पुरुष बाप बनने के काबिल है। इस भरोसे को झटका लगा है। आज युवाओं में इनफर्टिलिटी (बांझपन) बढ़ रहा है। कई युवाओं को फर्टिल्टि लैब्स में आते-जाते देखा जा सकता है, क्योंकि उन्हें अपनी मर्दानगी पर शक होने लगा है।
जो युवा लैब्स की ओर रुख कर चुके हैं, उन्हें सिर्फ मॉडर्न सोच का नहीं कह सकते। वह सिर्फ मार्डन सोच के नहीं हैं, बल्कि वह अपने भविष्य, स्वास्थ्य और संतान को लेकर बहुत सजग हैं। भारत जैसे देशों में आज भी अधिसंख्यक आबादी और युवा इन मामलों पर खुलकर बात नहीं करते। यहां तक कि वे इस तरह की समस्याओं की सही जानकारी भी नहीं देते हैं।
हर समय काल की अपनी दिक्कतें हैं। इक्कीसवीं सदी में पिता बनने की हसरत पुरुषों के लिए तनाव का सबसे बड़ा कारण बनती जा रही है। बीमारियों से जुड़ी तमाम समस्याएं जैसे-जैसे खत्म हो रही हैं। पुरुषों में इनफर्टिलिटी की शिकायत बढ़ने लगी है। इस पर पहला झटका 2013 की शुरुआत में लगा। तब एक शिकायत दर्ज की गई कि भारतीय पुरुषों का वीर्य अब पहले जैसा नहीं रह गया है। वर्ष 2012 को फ्रांस में एक ग्लोबल अध्ययन किया गया था। उसी साल दिसंबर में इसकी रिपोर्ट आई। जिसमें शुक्राणुओं की औसत संख्या में 32 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई थी। इसने चिकित्सा जगत में हड़कंप मचा दिया। भारत में भी इस पर चर्चा शुरू हो गई। मगर वैज्ञानिक साक्ष्य इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि भारतीय पुरुषों के वीर्य के पतन की कहानी को इनकार और चुप्पी की चादर में छिपा रखा है। वर्ष 2013 के अगस्त में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने राज्यसभा में कहा था, ‘पुरुषों में इनफर्टिलिटी बढ़ रही है।’
इस सिलसिले में पहला अध्ययन मणिपाल के कस्तूरबा अस्पताल में 2008 में 7,700 पुरुषों पर किया गया था। जिनका वीर्य खराब क्वालिटी का पाया गया। इसके बाद से कई अध्ययन हो चुके हैं। दिल्ली के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एम्स) के एक शोध से पता चलता है कि तीन दशक के दौरान प्रति मिलीलीटर वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या छह करोड़ से घटकर दो करोड़ रह गई है। लखनऊ के सेंट्रल ड्रग रिसर्च इंस्टीट्यूट में 19,734 स्वस्थ पुरुषों के वीर्य पर किए एक अध्ययन में पता चला है कि वीर्य की संरचना और गतिविधि में ‘वास्तविक गिरावट’ आई है।
यह समस्या अकेले भारत की नहीं है। मशहूर पत्रिका ब्रिटिश मेडिकल जर्नल के मुताबिक, पिछले पचास साल में दुनिया भर में मर्दों में शुक्राणुओं की संख्या आधी रह गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सामान्य पुरुषों के लिए शुक्राणुओं की संख्या में संशोधन करके उसे पचास के दशक के पैमाने 11  .3 करोड़ प्रति मिलीलीटर (एमएल) से कम कर दो करोड़ प्रति मिलीलीटर तय किया है।
कुछ साल पूर्व फ्रांस में एक अध्ययन हुआ, जिसमें शुक्राणुओं की ‘अंतरराष्ट्रीय निगरानी’ की जरूरत बताई गई थी। शुक्राणुओं को अब ‘स्विमर’ यानी तैराक कहा जाने लगा है। एक सामान्य पुरुष एक बार के इजैकुलेशन में 20 से 50 करोड़ शुक्राणु स्वखलित करता है। एक स्पेशलिस्ट बताते हैं कि ये तैराक मेंढक के बच्चे (टेडपोल) की आकृति के होते हैं। यह गाढ़े मादा द्रव्य के बीच अफरातफरी भरा सफर तय करते हैं। इनमें कई किनारे लग जाते हैं। कुल शुक्राणुओं में सिर्फ एक-तिहाई ही सामान्य संरचना के होते हैं जिनका अगला सिरा अंडाकार होता है और पूंछ काफी लंबी। उन्हें किसी गाइडेड मिसाइल की तरह तेज गति से तैरने की जरूरत होती है ताकि वे फर्टिलाइजेशन के काम आ सकें। सिर्फ  50 से 100 शुक्राणु ही अंडाणु तक पहुंच पाते हैं और करीब दर्जन भर उसके सुरक्षा कवच को भेदने की कोशिश करते हैं, जिनमें कोई एक ही कामयाब हो पाता है।
आम तौर पर वीर्य के नमूनों को कुछ ऐसे शब्दों से खारिज कर दिया जाता है। मसलन ‘बहुत गाढ़ा है’, ‘बहुत पतला’, ‘बहुत कम’ या फिर ‘बहुत चिपचिपा।’ ये सिर्फ शब्द नहीं है, बल्कि युवाओं के दिल में सुई चुभोने जैसा है।
अक्सर पुरुष निराश होते हैं। क्योंकि वे इनफर्टिलिटी और नपुंसकता का अंतर नहीं जानते। एक विशेषज्ञ का कहना है, ‘नपुंसकता का मतलब किसी पुरुष का सेक्स गतिविधियों में लगातार असमर्थ रहना है जबकि इनफर्टिलिटी का मतलब शुक्राणुओं की खराब क्वालिटी या संख्या से है।’ हालांकि दोनों ही स्थितियां रिश्तों, और आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने वाली हैं। अमेरिका की स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के जर्नल ऑफ एंड्रोलॉजी में छपे एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि काम-काज का दबाव पुरुषों को नपुंसक बना सकता है, क्योंकि उससे सेक्स के लिए जरूरी हार्मोन की कमी हो जाती है।
भारत में बांझपन को हमेशा से ही औरतों से जोड़ा जाता रहा है। एक इनफर्टिलिटी इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च की डॉ ममता दीनदयाल कहती हैं, ‘मेरे पास ऐसी महिलाएं आती थीं जिनके पति उन्हें प्रताड़ित करते, घर से निकाल देते और दूसरी शादी कर लेते थे।’ पुरुषों में बढ़ता बांझपन अब बंद दरवाजों के पीछे पारिवारिक समीकरण को बदल रहा है। एक समय था जब तलाक के मामले अधिकतर दहेज और घरेलू हिंसा के कारण दर्ज होते थे। आज ऐसे मुकदमे नपुंसकता और इनफर्टिलिटी की वजह से भी दायर होते हैं। कुछ साल पहले कर्नाटक हाईकोर्ट में एक मामला आया था जिसमें महिला ने यह कहते हुए तलाक की मांग की थी कि शादी के दो साल बाद भी वह गर्भ धारण नहीं कर सकी है और वह ‘अपने वैवाहिक जीवन से संतुष्ट नहीं है।’
सामान्य आबादी में इनफर्टिलिटी खासकर शहरी भारत में नाटकीय तरीके से बढ़ रही है। जनगणना के आंकड़ों के आधार पर मुंबई स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज का अनुमान है कि 1981 से 2010 के बीच इसमें 50 फीसदी की वृद्धि हुई है। 15 से 20 फीसदी बेऔलाद भारतीय दंपत्तियों में अब उंगली पुरुषों की तरफ घूम गई है। देश में संतानहीनता के 40 फीसदी मामलों में पुरुषों में इनफर्टिलिटी को जिम्मेदार ठहराया जाता है।
इनफर्टिलिटी पर वातावरण और पुरूषों के रहन-सहन का बड़ा असर होता है। रोजाना काम आने वाले उत्पादों के रूप में हर साल तकरीबन 2,000 नए केमिकल्स दुनिया भर के बाजारों में उतारे जाते हैं। इनमें से कई केमिकल्स के अपनी सेहत पर असर के बारे में कुछ नहीं जानते। शराब से शुक्राणु बनना कम हो जाता है, स्मोकिंग से इनका आकार गड़बड़ा जाता है, एस्पिरिन की ज्यादा खुराक वीर्य में अहम रसायनों से छेड़छाड़ कर देती है और चीनी की अधिक मात्रा मोटापा, तनाव, यौन संक्रमित रोग, भारी वर्जिश, अनिद्रा और उम्र का बढना, सब मिलकर इनफर्टिलिटी को बढ़ावा देते हैं।
मर्दों में इनफर्टिलिटी का इलाज आसान नहीं है। परीक्षण सटीक नहीं होते। वीर्य इंसानी शरीर का सबसे जटिल द्रव्य होता ह,ै जिसे इकट्टा और जमा करना मुश्किल होता है। इस क्षेत्र में सीमित ज्ञान, अपर्याप्त शोध से बनी दवाइयों को बेचना भी आसान हो जाता है। फर्टिलिटी क्लीनिकों और स्पर्म बैंकों का पंजीकरण नहीं होता। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने देश भर में ऐसे 900 क्लीनिकों की पहचान की है, लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि कई और उसकी नाक के नीचे अपना धंधा चला रहे हैं। सच मानने में पुरुषों की शर्म, उनका आत्मसम्मान और इलाज से इनकार समस्या का बोझ महिलाओं के कंधे पर डाल देता है।

‘शर्म और चुप्पी तोड़नी पड़ेगी’

इनफर्टिलिटी विशेषज्ञ एवं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के सदस्य डॉ अनूप गुप्ता से बातचीत
क्या मर्दों में इनफर्टिलिटी बहुत बड़ी समस्या है?
हां। यह बिल्कुल सही है। पुरुषों खासकर भारत में यह समस्या तेजी से बढ़ती जा रही है। आप कई विकसित देशों की आबादी दर घटने जैसे खबरें पढ़ते होंगे। हालांकि ऐसे देशों ने कई सालों से इस पर काम शुरू कर दिया है। मगर भारत में अभी इस पर बात भी बहुत कम होती है। इसका नतीजा यह होगा कि भारत एक-दो दशक बाद युवाओं का देश नहीं रह जाएगा। यहां आबादी दर घटने लगेगी।
इस समस्या से निजात कैसे पा सकते हैं?
उसके लिए सर्वप्रथम हमें शर्म और अपनी चुप्पी तोड़नी पड़ेगी। इस पर खुलकर बात करनी होगी। जब आप बात करेंगे तभी समस्या का पता चलेगा और जब समस्या पता चलेगी तभी उसका निदान भी होगा।
पुरुषों में इनफर्टिलिटी बढ़ने के क्या कारण हैं?
सबसे प्रमुख कारण युवाओं के रहन-सहन, खान-पान है। आजकल के युवा खासकर शहरी युवा लैपटॉप और मोबाइल का बहुत इस्तेमाल करते हैं। ऑफिस में तो उनका लैपटॉप बेशक टेबल पर रखा रहता है। मगर ट्रैवलिंग और घर में लैपटॉप का इस्तेमाल अपने पैर पर रखकर ही करते हैं। यह पुरुषों के स्पर्म को नुकसान पहुंचाता है। उसी प्रकार मोबाइल को हम अपने पैंट के पॉकेट में रखते हैं। यह शहर और गांव में एक समान है। मोबाइल स्पर्म को खराब करता है। इसके अलावा नशा और रासायनिक खाना भी इसके कारक हैं।
  • 2001 में शोध किए गए 34 प्रतिशत पुरुषों में वीर्य 2-5 सीसी से कम रहा।

 

  • 2011में करीब 65 फीसदी पुरुषों में वीर्य सामान्य संख्या से कम पाया गया।

 

  • 2001-11 के बीच सामान्य से कम वीर्य वाले पुरुषों में 32 फीसदी की वृद्धि हुई।

 

  • शुक्राणु कम होने के कई कारण हैं।

 

  • 37 फीसदी स्क्रॉटम वेंस में सूजन की तकलीफ से ग्रसित

 

  • 25 फीसदी बिना बात के संशय से ग्रस्त पुरुष

 

  • 10 फीसदी में वीर्य संबंधी गड़बड़ियां

 

  • 9 फीसदी में टेस्टीकुलर (वीर्यकोष) की खराबी

 

  • 6 फीसदी टेस्टीकल संबंधी गड़बड़ी के शिकार

 

  • 6 फीसदी अवरोध का शिकार

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