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आखिर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने काफी खींचतान के बाद तीन तलाक संबंधित (मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण) विधयेक के प्रावधानेां के मुताबिक महिला को एक बार में तीन तलाक देना दंडनीय अपराध है। जल्दी ही सदन में पारित विधेयक पर राष्ट्रपति की मोहर भी लग जाएगी और यह कानून का रूप ले लेगी। केंद्र सरकार लगातार इस दिशा में कोशिशों में जुटी रही तो जाहिर है कि यह उसकी बड़ी कायमाबी है। कामयाबी सिर्फ सियासी मोर्चे पर नहीं, बल्कि सरकार ने यह भी संदेश दिया है कि वह सामाजिक न्याय की पक्षधर है।
सियासी मोर्चे पर सरकार की सफलता इस मायने में है कि वह देश की प्रमुख पार्टी कांग्रेस को पटखनी देने में सफल रही है। सदन में कांग्रेस में न सिर्फ इस बार ‘तीन तलाक’ से संबंधित विधेयक पर सरकार के विरुद्ध सख्त तेवर अपनाए, बल्कि अतीत में भी उसका रवैया यही रहा है। उल्लेखनीय है कि 1980 के दशक में ट्रिपल तलाक की पीड़ित एक महिला सायरा बानो ने अपने साथ हुए अन्याय के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ाई लड़ी और न्यायालय का फैसला उसके पक्ष में आ भी गया। लेकिन 1986 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सदन में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटते हुए तीन तलाक को वैध ठहरा दिया था। ऐसे में भाजपा आज यह संदेश दे रही है कि कांग्रेस ने सिर्फ सियासी फायदे के लिए तुष्टिकरण का रास्ता अपनाया, जबकि भाजपा सबका साथ, सबका विकास के रास्ते पर मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए प्रयासरत है।
वर्ष 2017 में तीन तलाक का मुद्दा एक बार तब फिर गर्माया जब सायरा बानो नामक एक और महिला के केस में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने तीन तलाक को गैर कानूनी करार दिया। इसी बीच ट्रिपल तलाक से पीड़त कई अन्य महिलाओं का दर्द भी सामने आया। दर्द भी ऐसा कि चिट्ठी और व्हाट्अप के जरिए उन्हें तलाक दे दिया गया था। अपने पिछले कार्यकाल से मोदी सरकार इसे तीन तलाक संबंधी विधेयक को पारित करवाने की कोशिश में थी। आखिरकार तीन बार राज्यसभा में खारिज किए जा चुके मुस्लिम महिला शादी पर अधिकारों की सुरक्षा विधेयक को उच्च सदन ने भी मंजूरी दे दी है। अब मौखिक, लिखित या किसी भी अन्य माध्यम से तीन तलाक देना कानूनन अपराध होगा। सरकार के पास राज्यसभा में पूर्ण बहुमत न होने के बावजूद विपक्षी दलों के बिखराव और सहयोगी दलों की सहायता से यह बिल पास हुआ। अब यह बिल कानून का रूप लेगा।
पिछले सप्ताह ही इस बिल को लोकसभा ने मंजूरी दी थी। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बिल पेश करने के दौरान कहा था कि तीन तलाक बीस  से ज्यादा देशों में प्रतिबंधित है, इस कानून को राजनीति के चश्मे से न देखें। अब तीन तलाक देने पर आरोपी को तीन साल की जेल होगी।
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने  राज्यसभा में बिल पेश करते हुए कहा कि महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए यह विधेयक लाया गया है। दिनभर चली चर्चा के दौरान विपक्ष बंटता नजर आया। सत्ता पक्ष के साथ विपक्ष के कई दलों ने वोटिंग से खुद को अलग कर लिया। बीजू जनता दल ने सरकार का साथ दिया। विपक्ष के ज्यादातर दलों की मांग थी कि विधेयक को प्रवर समिति में भेजा जाए।  सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी तो मतदान कराना पड़ा और अंतत विपक्ष का प्रस्ताव 84 के मुकाबले 99 मतों से गिर गया। इसके अलावा विपक्ष के दर्जनभर से अधिक संशोधन एक-एक कर गिरते चले गए।
सदन में बिल पर चर्चा का जवाब देते हुए कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कांग्रेस एक सुधारवादी पार्टी थी, लेकिन 1986 में उसके कदम रुक गए और उसने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। प्रसाद ने तंज कसा कि शाहबानो से लेकर शायराबानो तक कांग्रेस वहीं खड़ी है। यह एक ऐतिहासिक कदम है, जो मुस्लिम महिलाओं के साथ होने वाली नाइंसाफी को रोकेगा। अब मुसलमान भाई अपनी बीवियों को तलाक देने से पहले दो-चार बार सोचेंगे कि ऐसा करने से उन्हें सजा हो सकती है। महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में भी ये एक बड़ा कदम है।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक देने को असंवैधानिक भले ही ठहरा दिया था, लेकिन इसका पालन नहीं होता था। शरीयत में भी तीन तलाक का जिक्र नहीं है, फिर भी मुस्लिम समुदाय में इसका चलन जारी था। सरकार का मकसद निर्दोष पतियों को सजा दिलवाना नहीं है, बल्कि सजा के डर से पुरुष तीन तलाक देने के बारे में सोचेंगे भी नहीं।
पिछले महीने ही बहुत सी महिलाओं ने इस सिलसिले में अर्जी भेजी थी। अगर इन मामलों में अदालत फैसले दे तो बेहतर होगा। मामला अदालत में जाने पर महिलाओं को भी अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है। पहले तीन तलाक बोलकर उन्हें रातों-रात घर से बेदखल कर दिया। ना उन्हें किसी तरह की आर्थिक मदद मिलती थी और न ही कानूनी मदद मिलती थी। अब तीन तलाक कानून महिलाओं के हक में है, न कि उनके खिलाफ है।
 गौरतलब है कि तीन तलाक का जिक्र न तो कुरान में कहीं आया है और न ही हदीस में। यानी तीन तलाक इस्लाम का मूल भाग नहीं है। तीन तलाक से पीड़ित कोई महिला उच्च अदालत पहुंची है तो अदालत ने कुरान और हदीस की रौशनी में ट्रिपल तलाक को गैर इस्लामिक कहा है। तीन बार तलाक को ‘तलाक- ए-बिद्दत’ कहा जाता है। बिद्दत यानी वह कार्य या प्रक्रिया जिसे इस्लाम का मूल अंग समझकर सदियों से अपनाया जा रहा है, हालांकि कुरान और हदीस की रौशनी में यह कार्य या प्रक्रिया साबित नहीं होते।
 सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 2017 में सायरा बानो मामले में तीन तलाक को निरस्त किया था। दो जजों ने इसे असंवैधानिक कहा था, एक जज ने इसे पाप बताया था। इसके बाद दो जजों ने इस पर संसद को कानून बनाने को कहा था। संसद में यह बिल लोकसभा से तो दो बार पास हुआ, लेकिन राज्यसभा में अटक गया। इसके बाद इसे कानूनी जामा पहनाने के लिए सरकार ने अध्यादेश का रास्ता चुना। छह महीने के अंदर इस पर संसद की मुहर लगनी जरूरी थी। तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद इसका इस्तेमाल होने पर सरकार सितंबर 2018 में अध्यादेश लाई। तीन तलाक देने पर पति को तीन साल की सजा का प्रावधान रखा गया। हालांकि किसी संभावित दुरुपयोग को देखते हुए विधेयक में अगस्त 2018 में संशोधन कर दिए गए थे।
जनवरी 2019 में इस अध्यादेश की अवधि पूरी होने से पहले दिसंबर 2018 में एक बार फिर सरकार बिल को लोकसभा में नए सिरे से पेश करने पहुंची थी। 17 दिसंबर 2018 को लोकसभा में बिल पेश किया गया। हालांकि, एक बार फिर विपक्ष ने राज्यसभा में इसे पेश नहीं होने दिया और बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग की जाने लगी। और एक बार फिर बिल अटक गया था।
सही मायनों में रूढ़िवादी बेड़ियों में कैद मुस्लिम महिलाओं को अब आजादी मिली है। तीन तलाक पर कानून बनने से यह प्रथा स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। महिलाओं को भी हलाला और बहुविवाह जैसी कुप्रथा के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखनी होगी।
शायरा बानो, तीन तलाक के खिलाफ संघर्ष करने वाली महिला

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