वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में बहुसंख्य आबादी का धैर्य अब जवाब देता नजर आ रहा है। केन्द्र की मोदी और यूपी की योगी सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतर चुकी आम जनता न सिर्फ केन्द्र की मोदी सरकार को तानाशाह बता रही है बल्कि यूपी की योगी सरकार की कार्यप्रणाली पर भी उंगली उठा रही है। सरकार के विरोध में आम जनता से लेकर साधू-संतों की भारी तादाद सरकार की पेशानी पर बल डालने के लिए काफी है।
अब यह भी जान लीजिए कि एकाएक इस वीवीआईपी सीट पर जनता इतना उबाल क्यों मार रही है। हुआ यूं कि स्थानीय प्रशासन ने बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेज बहादुर के साथ ही रामराज्य परिषद की तरफ से मैदान में उतरे प्रत्याशी स्वामी श्री भगवान वेदान्ताचार्य का नामांकन महज मामूली कारणों से खारिज कर दिया है। बीएसएफ के जवान तेज बहादुर ने पहले निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पर्चा दाखिल किया था, बाद में सपा-बसपा गठबन्धन ने तेज बहादुर को अपना समर्थन देकर मैदान में उतारा। गठबन्धन के टिकट पर तेज बहादुर के मैदान में उतरने से भाजपा का समीकरण बिगड़ता नजर आने लगा था। ऐसा इसलिए कि पुलवामा में शहीद हुए सैनिको के नाम पर वोट मांगने वाले भाजपा नेताओं को चहुंओर जवाब मिल रहा था। हर कोई उनसे यही पूछ रहा था कि जब पीएम एक जवान की तकलीफों का हल नहीं निकाल सकते तो उन्हें पुलवामा में शहीद हुए सैनिकों के नाम पर वोट मांगने का अधिकार नहीं है।
दूसरी ओर रामराज्य परिषद के बैनर तले मैदान में उतने स्वामी श्री भगवान वेदान्ताचार्य का नामांकन रद् किए जाने को भी भाजपाई रणनीति का एक हिस्सा माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि भगवान वेदान्ताचार्य के मैदान में उतर आने से काशी का मुकाबला एकतरफा नहीं रह गया था। ऐसा इसलिए कि रामराज्य परिषद के साधू-संत घर-घर जाकर काशी के विनाश की तस्वीर पेश कर रहे थे। वे बता रहे थे कि आखिर किस तरह से काशी विश्वनाथ मन्दिर के लिए काॅरीडोर बनाने के नाम पर सैकड़ों मन्दिरों में स्थापित शिवलिंग को अपमानजनक तरीके से बुल्डोजर के सहारे तहस-नहस किया। इतना ही नहीं काॅरीडोर के नाम पर सैकड़ों परिवारों के बेघर होने के प्रमाण भी दिए जा रहे थे। इतना ही नहीं बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे लोगों का रोजगार छीनकर उन्हें बेरोजगार बनाए जाने की तस्वीर भी घर-घर दिखायी जा रही है।
कहा जा रहा है कि कुछ ही दिनों के अंतराल में वाराणसी की आबो-हवा बदल चुकी थी। एक तरफ बीएसएफ का बर्खास्त जवान मोदी को खुली चुनौती दे रहा था तो दूसरी ओर वे साधू-संत मोदी के खिलाफ मैदान में थे जिनकी बदौलत भाजपा को यूपी से लेकर केन्द्र तक की सत्ता का स्वाद चखने को मिला।
इन दोनों का नामांकन रद् किए जाने के बाद से भाजपा का बनारसी कैडर राहत की सांसे अवश्य ले रहा है लेकिन समस्या का पूरी तरह से निदान अभी भी नहीं हो सका है।
नामांकन रद् होने के बाद से स्थिति और खराब हुई है। स्थानीय प्रशासन और केन्द्र और यूपी सरकार के खिलाफ आम जनता और साधू-संत सड़कों पर उतर आए हैं। धरना-प्रदर्शनों से स्थानीय प्रशासन के चेहरों पर हवाइयां उड़ती साफ नजर आ रही हैं। कहा जा रहा है कि केन्द्रीय नेताओं के आदेश पर यूपी भाजपा के कई बड़े नेता वाराणसी कूच कर चुके हैं। वे खासतौर से रामराज्य परिषद के प्रत्याशी भगवान वेदान्ताचार्य को मनाने की कोशिश करेंगे। इस कोशिश में प्रलोभन भी भरपूर होगा, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता। देखना यह है कि भगवान वेदान्ताचार्य की नाराजगी दूर होती है या फिर वाराणसी की लोकसभा सीट पर मोदी की मुश्किलें बढेंगीं।
बनारण में सरकार और स्थानीय प्रशासन का विरोध करने सड़क पर उतरे साधू-संयासी बेहद क्रोध में नजर आ रहे हैं। रामराज्य परिषद के बैनर तले सैकड़ों की संख्या में साधू-संयासी सड़क पर उतर कर सरकार के रवैये को तानाशाही रवैये की संज्ञा दे रहे हैं। इन संतों का कहना है, ‘सरकार ढांेग कर रही है कि लोकतांत्रिक ढंग से भारत में चुनाव हो रहे हैं। सच यह है कि तानाशाही रवैया अपनाया जा रहा है। बहुत से लोग मोदी सरकार की नीतियों से खफा होकर मैदान में उतरे थे। वे चाहते थे कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में वे भी अपनी बात रख सकें। स्थिति यह है कि सरकार स्थानीय प्रशासन पर दबाव बनाकर मामूली तकनीकी खामियों की वजह से नामांकन रद् कर रही है। स्थिति ऐसी है कि प्रत्याशी को किसी अधिकारी से मिलने तक नहीं दिया जा रहा है। पुलिस का पहरा इतना कड़ा कर दिया गया है कि कोई चाहकर भी अधिकारी से मिलकर शिकायत नहीं दर्ज करवा सकता।’
यही हाल बीएसएफ से बर्खास्त किए गए जवान तेज बहादुर का भी है। उनका नामांकन भी मामूली खामियों के चलते रद् कर दिया गया। तेज बहादुर का समर्थन कर रहे कई जवान सरकार के रवैये से खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि वाराणसी से तेज बहादुर को कई संगठन समर्थन कर रहे थे। सरकार को डर समा गया था कि कहीं तेज बहादुर की मौजूदगी मोदी की हार में न तब्दील हो जाए।
हालिया स्थिति यह है कि रामराज्य परिषद और तेज बहादुर के समर्थक अब घर-घर जाकर सरकार की तानाशाही के सुबूत पेश कर रहे हैं। कहना गलत नहीं होगा कि यदि भाजपा ने समय रहते अपनी रणनीति में तब्दीली नहीं की तो निश्चित तौर पर वाराणसी की जनता का क्रोध भाजपाई नीतियों पर भारी पड़ जायेगा।

You may also like