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स्वयं प्रकाश, जिन्होंने अपनी कहानियों में भारतीय जीवन के मर्म को उकेरा

गत पखवाड़े ही ‘पाखी महोत्सव’ में जे .सी. जोशी स्मृति शब्द साधक शिखर सम्मान से नेवाजे गए प्रख्यात कथाकार स्वयं प्रकाश का आज सुबह ,मुम्बई में निधन हो गया। कथाकार स्वयं प्रकाश को प्रेमचंद की परंपरा का महत्वपूर्ण कथाकार माना जाता है। उनकी कहानियां पढ़ने से अधिक सुनने का विषय होती हैं तो उसका कारण यही है कि कहन का जातीय स्वभाव उन्होंने अपनी कहानियों में सादगी पूर्वक अर्जित किया।
इनकी कहानियों का अनुवाद रूसी भाषा में भी हो चुका है। उनकी प्रसिद्ध कहानी संग्रह में ‘ सूरज कब निकलेगा’,’आएंगे अच्छे दिन भी’,’आदमी जात का आदमी है’ आदि हैं।
उनकी कहानियों में विचारधारा का ऐसा सटीक प्रयोग  है कि पाठक को कहानी की परिणति कहीं से भी असहज नहीं लगती। यह कौशल हर कहानीकार के पास नहीं होता।
स्वयं प्रकाश ने जब कहानियां लिखना प्रारंभ किया था तब हिन्दी नई कहानी के अभूतपूर्व उल्लास के बाद कहानी-आंदोलनों की अराजकता के बोझ से चरमरा रही थी। उस दौर में कांशीराम सिंह, असग़र वजाहत, संजीव, पंकज बिष्ट ,उदय प्रकाश, अरुण प्रकाश जैसे कथाकारों के साथ स्वयं प्रकाश ने कहानी को फिर से जनवादी तेवर दिए।
कहानी मानो सजीव हो उठी और पात्र अपने गांव-देहात की भाषा-बोली में अपने दुःख-दर्द साझा करने लगे।
कथाकार स्वयं प्रकाश कहानी लिखने से पहले कविताएं लिखते थे और मंच पर स्वर सहित काव्य पाठ भी करते थे। इनके पिता अजमेर में रहते थे वहीं स्वयं प्रकाश ने प्रसिद्ध कथाकार रमेश उपाध्याय की सोहबत में कहानी लिखना शुरू किया था। बाद में अजमेर में ही उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई थी ।’सूरज कब निकलेगा’ कहानी इन्होंने राजस्थान के मारवाड़ इलाके में 70 के दशक में आई बाढ़ पर लिखी थी।
पूरा राजस्थान उनकी कहानियों में बोलता है।उनके रचना संस्कारों पर अपने ननिहाल इंदौर के उर्वर वातावरण का भी गहरा असर है जहाँ चंद्रकांत देवताले, होमी दाजी और सी के नायडू जैसे सितारे परिदृश्य में थे। यहाँ उनका बचपन बीता था। ऐसा हँसता -खिलखिलाता गद्य कि उसमें छिपी सोद्देश्यता कभी तैरती हुई न दिखाई दे। उनकी कहानियाँ ‘तीसरी चिट्ठी’ या ‘बाबूजीका अंतिम भाषण’ भारत के विशाल मध्य वर्ग के प्रति आशा का उजास ही तो हैं।
उन्होंने राजस्थान में रहते हुए भीनमाल से अपने मित्र मोहन श्रोत्रिय के साथ लघु पत्रिका ‘क्यों’ का सम्पादन -प्रकाशन किया तो ‘फीनिक्स’, ‘चौबोली’ और ‘सबका दुश्मन’ जैसे नाटक भी लिखे। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘बीच में विनय’ भीनमाल के परिवेश पर ही लिखा गया है। इससे पहले वे अपने सैन्यजीवन के अनुभवों पर एक  उपन्यास  ‘जलते जहाज पर’ लिख चुके थे। इधर के वर्षों में उनकी रचनाशीलता में परिवर्तन हुए और  उन्होंने बदल रहे भारतीय समाज को अपने लेखन में देखने समझने की भरपूर कोशिश की।
उनका उपन्यास ‘ईंधन’ भूमंडलीकरण की वृहद् परिघटना का भारतीय समाज पर पड़ रहे प्रभावों का अध्ययन करने वाला पहला  हिन्दी उपन्यास है तो उत्तर आधुनिक हो-हल्ले के बीच कहानी को ठेठ जन-सामान्य तक जोड़ने के प्रयास में उन्होंने ‘जंगल का दाह’, ‘गौरी का गुस्सा’, ‘बाबूलाल तेली की नाक’ और ‘कानदाँव’ जैसी कहानियाँ लिखीं।
कथा लेखन की एक लम्बी समर्पित पारी से संबंधित स्वयं प्रकाश का जीवनानुभव बहुआयामी रहा है।उन का विदा होना हिन्दी भूमि से एक स्वतंत्रचेता कथाकार का विदा होना है। विनम्र श्रद्धांजलि।

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