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‘एनीमिया’ पीड़ितों की संख्या में आया उछाल

पिछले तीन सालों से एक ओर जहां कोरोना महामारी से जंग जारी है वहीं देश में पिछले 5 वर्षो में एनीमिया पीड़ित बच्चों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया के अनुसार पहले जहां देश में एनीमिया पीड़ित बच्चों की संख्या 58 प्रतिशत थी वहीं अब बढ़कर 67 फीसद हो गई है।

मानसून सत्र के दौरान केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने बताया है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में छह माह से लेकर 5 साल तक के बच्चों में एनीमिया के मामले में 9 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। इससे पहले वर्ष 2015-16 में हुए सर्वे में एनीमिया का मामला 58.60 प्रतिशत था। जो अब बढ़कर 67.1 फीसदी तक पहुंच गया है। बच्चों में एनीमिया (खून में हीमोग्लोबिन की कमी) के सबसे ज़्यादा मामले लद्दाख में 90 फीसदी है। इसके बाद गुजरात 80, दादरा- नगर हवेली-दमन दीव 76 मध्य प्रदेश व जम्मू कश्मीर 73 तथा पंजाब व राजस्थान में 71 फीसदी मामले सामने आए हैं ।

देश में मुसहर और सपेरे समेत कई आदिवासी घुमंतू जातियां भीख मांगकर गुजारा करती हैं। दलित व पसमांदा मुसलमान जहां दिहाड़ी मजदूर होते हैं और उनकी परिवार की मासिक आय बेहद कम होती है,वहीं दूसरी ओर मछुवारा जातियों, केवट निषाद जैसी जातियां है जिनकी आय बेहद साधारण होती है। यही हाल अति पिछड़ी जातियों का भी है। इन जातियों के बहुत सारे लोगों के पास या तो राशन कार्ड नहीं है या फिर कोरोनाकाल में आधार कार्ड लिंक न होने के चलते कैंसिल हो गया। जिनका नहीं हुआ उनका अंगूठा ही नहीं लगता। वहीं दूसरी ओर लगातार काम न मिल पाने, और शैक्षणिक रूप से बेहद पिछड़ा होने के चलते निम्न मेहनताना पर काम करने के चलते व्यक्तिगत और पारिवारिक आय बहुत तुच्छ होती जिसके चलते ये लोग अपने बच्चों को पौष्टिक आहार नहीं दे पाते है जिसके चलते इनके बच्चों में एनीमिया जैसी बीमारियां आम है। कई ऐसे घुमंतू जातियां भी है जो स्कूल भी नहीं जा पाते है। जिसके वजह से वो मिड डे मील जैसे लाभकारी योजनाओं से भी वंचित हो जाते है।


लगातार आ रहे मामले पर जानकार कहते है कि देश में रोजाना फल खाना आमिर लोगों तक सीमित है। सेब, चीकू, अंगूर न सही लेकिन एक दशक पहले तक किसान वर्ग की पहुंच में आम, अमरूद, केला, पपीता, जामुन, बैर, नाशपाती, लीची आदि फल था जोकि अब वो भी नहीं है। गांव में जिनके यहां पेड़ है वही पपीता, अमरूद, बेर जैसे फल खा पा रहे हैं। गरीब गुरबे के पास न जो जमीन है न पेड़ अतः उसके पास तो वो भी नहीं है। इतना ही नहीं दूध तो पहले भी देश की 60 प्रतिशत आबादी की पहुंच से दूर था। अब सरकार ने दूध पर भी जीएसटी लगा दिया है तो दूध अब 20-30 प्रतिशत आबादी तक सिमट कर रह जायेगा। गांव में मध्य वर्ग और गरीब वर्ग जिनके पास रहने के थोड़ी जमीन है वो दुधारू जानवर पालते हैं जैसे कि भैंस गाय, बकरी आदि। लेकिन जिनके पास जमीन या रहने का ठिकाना नहीं है वो जानवर कहां रखेंगे। शहरों में तो दुधारू जानवर सिर्फ़ तबेले में होते हैं। और वहां दूध इतना महंगा है कि कंपनी कारखानों में काम करने वाले मजदूर और सेल्समैन की पहुंच से वो दूर है।

गौरतलब है कि 5 वर्ष में साग, सब्जी, दाल, दूध सब तो थाली से ग़ायब हो गयी है। गरीब माँ -बाप बच्चों को खिलाएं भी तो क्या। महंगाई इतनी बढ़ी है कि बस किसी तरह पेट भर ले रहे हैं। पौष्टिक खाने की बात करना ही एक स्वप्न है इस देश में कोरोना में दो साल स्कूल बंद रहने से मिड डे मील से वंचित रहे बच्चे रहे है। हालांकि सरकारी स्कूलों में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का दाखिला नहीं होता। बावजूद इसके ये कहने में कोई हर्ज़ नहीं है कि कोरोना काल में पूरे 2 वर्ष तक सरकारी स्कूल बंद रहे और इसके साथ ही बच्चों को मिलने वाला मिड डे मील भी बंद रहा। यहां यह बताने की ज़रूरत तो नहीं है कि ये बच्चे गरीब तबके से आते जिन्हें अपने घरों में भोजन मिलता है पर पौष्टिक आहार नहीं। सरकार ने 5 वर्ष तक के शिशुओं में एनीमिया का आंकड़ा बताया है। यदि 5-12 वर्ष के बच्चों में एनीमिया का आंकड़ा आये तो वो भी बहुत भयावह होगा।

 

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