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सुप्रीम कोर्ट ने लगाई अतिक्रमण विरोधी अभियान पर रोक

उत्तरी दिल्ली के जहांगीरपुरी इलाके में नगर निगम के अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत कथित अवैध निर्माणों को तोड़ दिया गया है। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अतिक्रमण विरोधी तोड़फोड़ की कार्रवाई का संज्ञान लेगा, जो कोर्ट के आदेश के बाद जारी रखी गई थी। वहीं इस अभियान के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) नेता वृंदा करात ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

दरअसल, 20 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हिंसा प्रभावित जहांगीरपुरी इलाके में इमारतों को ध्वस्त करने के मुद्दे पर अगले आदेश तक ‘यथास्थिति’ कायम रखने के निर्देश दिए। वहीं न्यायालय ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किए हैं। याचिका में दावा किया गया है कि दंगे के आरोपियों की इमारतों को तोड़ा जा रहा है। न्यायालय ने यह भी कहा कि 20 अप्रैल के आदेश के बाद की गई तोड़फोड़ का भी संज्ञान में लिया जाएगा। जहांगीरपुरी इलाके में नगर निगम ने अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत कई पक्के और अस्थायी ढांचों को बुल्डोजर से तोड़ दिया गया था।

नगर निगम के अतिक्रमण विरोधी अभियान शुरू होने के कुछ ही घंटों बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे का आदेश दिया था, लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद भी घंटों तक निगम की कार्रवाई जारी रही। इस पर उत्तरी दिल्ली नगर निगम के महापौर राजा इकबाल सिंह ने कहा था कि उन्हें अभी तक आदेश प्राप्त नहीं हुआ है और जब तक उन्हें आदेश नहीं मिलता तब तक अवैध निर्माणों को गिराने का काम जारी रखेंगे। जिसके बाद याचिकाकर्ता के वकील दुष्यंत दवे फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और चीफ जस्टिस एनवी रमना वाली पीठ ने दोबारा अतिक्रमण विरोधी अभियान को रोकने का आदेश दिया। जिसके बाद बुल्डोजर से की जा रही कार्रवाई को रोक दिया गया।

वृंदा करात ने किया सुप्रीम कोर्ट का रुख
जहांगीरपुरी इलाके में नगर निगम के अतिक्रमण विरोधी अभियान के बीच माकपा नेता वृंदा करात ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली जिसमें कहा है गया कि वह 20 अप्रैल को सुबह करीब दस बजे जहांगीरपुरी पहुंचीं और तत्काल वहां मौजूद अधिकारियों को यथास्थिति के बारे में बताया। फिर भी दोपहर तक तोड़फोड़ जारी रही। इस पूरे घटनाक्रम की आलोचना करते हुए वृंदा करात ने कहा कि अतिक्रमण हटाने की आड़ में एक भेदभावपूर्ण और मनमानी विध्वंस अभियान को ‘सांप्रदायिक राजनीतिक गेम प्लान’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। याचिका में यह भी कहा गया है कि लोगों के मूल अधिकारों, जीने का अधिकार और आश्रय के अधिकार का उल्लंघन किया गया है। न्याय के सिद्धांत की भी अवमानना की गई है। इसलिए विध्वंस के आदेश को रद्द करते हुए अदालत को इन पीड़ितों के लिए मुआवजा भी तय करना चाहिए और सरकार को एक निर्धारित समय सीमा के भीतर मुआवजे का भुगतान करने का आदेश देना चाहिए।

गौरतलब है कि 16 अप्रैल 2022 को हनुमान जयंती के अवसर पर निकाली गई शोभा यात्रा के दौरान जहांगीरपुरी में सांप्रदायिक हिंसा हुई। इस हिंसा के बाद इलाके में अतिक्रमण विरोधी अभियान चलाया गया। इस अभियान के दौरान बुलडोजर से कई ढांचों को गिरा दिया गया। जिस पर राजनीति भी हुई है। इन मामलों को लेकर विपक्ष ने आरोप लगाया कि भारत के संवैधानिक मूल्यों को ध्वस्त किया गया है और इसमें गरीबों तथा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया है। वहीं, भारतीय जनता पार्टी ने जोर देते हुए कहा कि यह एक कानूनी प्रक्रिया है और इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।

यह मामला 20 अप्रैल को तूल पकड़ा
उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत 20 अप्रैल को सुबह एक मस्जिद के पास कुछ अस्थायी ढांचे को गिरा दिया गया। आरोप है कि अभियान के तहत आरोपियों के कथित अवैध निर्माणों को तोड़ा जा रहा था लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञों यह लगता है कि पूरा अभियान राजनीति से प्रेरित है। क्योंकि इस घटनाक्रम से पहले बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने महापौर को चिट्ठी लिखी थी। उसके कुछ घंटां में ही उत्तरी नगर निगम ने इस पूरे कार्रवाई का आदेश दे दिया था। जबकि इस तरह के कोई भी कार्रवाई करने पर पहले नोटिस दिया जाता है। वही दिल्ली को देखे तो पता चलता है कि दिल्ली अवैध निर्माण और अतिक्रमण से भरी हुई है। लेकिन जहां कुछ दिनों पहले हिंसा हुई और लोग अभी उस दर्द से उबरे भी नहीं है, वहां इस तरह अभियान चलाना प्रशासन पर ही सवाल खड़ा कर रहा है। ये कोई अतिक्रमण हटाने का अभियान नहीं बल्कि एक राजनैतिक संदेश देने का प्रयास लगता है।

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