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किसान आंदोलन पर सरकार के रूख से नाराज सुप्रीम कोर्ट, कहा कि कृषि कानूनों को टाल दें

देश में कृषि कानूनों के खिलाफ किसान पिछले 46 दिनों से आंदोलनरत है। आंदोलन के 47 वें दिन आज सुप्रीम कोर्ट ने उनकी समस्या को गंभीरता से महसूस करते हुए सरकार से पूछा कि आखिर सरकार को कृषि कानूनों को टालने में दिक्कत क्या है। कोर्ट ने कहा कि वह कुछ दिनों के लिए हम कानूनों के क्रियान्वयन को टालें। दिल्ली और उसकी सीमाओं पर डटे आंदोलनकारी किसानों को हटाने वाली याचिकाओं पर सुनावाई करते हुए चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसानों के मुद्दें पर सरकार का रूख ने उन्हें निराश किया है। कोर्ट ने जानना चाहा कि आखिर सरकार ने किस तरह कंसल्टेशन प्रोसेस का पालन किया। कोर्ट के इस सवाल पर सरकार ने कहा कि एक्सपर्ट कमेटी की सिफारिशों पर कानून बनाए गए थे। कोर्ट में किसानों की तरफ से प्रशांत भूषण और दुष्यत दुबे ने पैरवी की। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जिस तरह से प्रक्रिया चल रही है, उससे हम निराश हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने विरोध कर रहे किसानों को हटाने की याचिका के साथ केंद्र द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए डीएमके सांसद तिरुचि शिवा, राजद सांसद मनोज के झा द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की।

सीजेआई ने कहा कि “हम नहीं जानते कि सरकार और किसान संगठनों के बीच क्या बातचीत चल रही है? क्या कृषि कानूनों पर कुछ समय के लिए रोक लगाई जा सकती है।” कानूनों पर सुनवाई के दौरान सीजेआई ने कहा किसान ठंड में परेशान हो रहे है, कुछ ने आत्महत्या की है, बूढ़े लोग और महिलाएं इस आंदोलन का हिस्सा हैं। यह क्या हो रहा है। हम नहीं चाहते कि कोई हिंसा हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक भी याचिका दायर नहीं की गई है कि जिसमें कहा गया हो कि कृषि कानून अच्छे हैं।

तीन कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान के CJI की बैंच ने कहा कि, अगर कुछ गलत होता है तो हममें से हर एक जिम्मेदार होगा। सीजेआई ने कहा अगर केंद्र कृषि कानूनों के क्रियान्वयन पर रोक नहीं लगाना चाहता है तो हम इस पर रोक लगा देंगे। भारत संघ को इस सबकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। CJI ने कहा, आप (केंद्र) कानून ला रहे हैं और आप इसे बेहतर तरीके से कर सकते हैं। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना है कि अदालत तब तक कानून पर रोक नहीं लगा सकती जब तक कि यह पता न चल जाए कि कानून विधायी क्षमता के बिना पारित हो जाता है और कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। हरियाणा के सीएम के साथ जो हुआ वह नहीं हो सकता। कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान SC के समक्ष एजी केके वेणुगोपाल ने कहा, 26 जनवरी को अपने ट्रैक्टरों के साथ किसान राष्ट्रीय महत्व के एक दिन को नष्ट करने के लिए राजपथ पर मार्च करने की योजना बना रहे हैं।

वहीं किसानों की तरफ से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दुबे ने कहा हमें रामलीला मैदान में जाने की अनुमति दी जानी चाहिए। हमें किसी भी हिंसा में कोई दिलचस्पी नहीं है। हालांकि किसानों और सरकार के बीच कई बार वार्ता हो चुकी है। लेकिन हर बार वार्ता बेनतीजा रही। किसान कृषि कानूनों को वापस करने की जिद्द पर अड़े हुए है। पंरतु वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार कानूनों में सुधार करने को राजी है लेकिन कानूनों को वापस नहीं लेने पर डटी हुई है।

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