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‘गन्ना किसान’ हाय रे तेरी यही कहानी

देश में राजनीति के बाजार सजे हुए हैं। ये बाजार यूपी में भी ढोल-नगाड़ों संग सौदेबाजी में जुटे हैं। कोई अल्संख्यकों की मजबूरी को खरीदता नजर आ रहा है तो कोई दलितों का बाजार सजाकर बैठा है। कोई देश की युवा पीढ़ी की सौदेबाजी कर रहा है तो कोई ग्रामीणों के भोलेपन की बोली लगा रहा है। कुल मिलाकर माहौल ठीक वैसा ही है जैसे किसी मेले की दुकानों का होता है। इस मेले में यदि कोई ठगा जा रहा है तो वह है यूपी का गन्ना किसान। यूपी में 50 लाख परिवारों का भरण-पोषण गन्ने की खेती पर ही निर्भर है और इन परिवारों से 2 करोड़ वोटर किसी भी दल की किस्मत बदलने की क्षमता रखते हैं लेकिन असंगठित होने के कारण इनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज सरीखी होकर रह गयी है। यह वर्ग किसी भी राजनीतिक दल के एजेण्डे में स्थान नहीं रखता। ऐसा नहीं है कि इस वर्ग की चर्चा नहीं होती। चर्चा भी होती है और सियासी दलों की नौटंकी भी लेकिन चुनाव समाप्त होते ही ये वर्ग फिर से दोराहे पर नजर आता है।
कहना गलत नहीं होगा कि यूपी के गन्ना किसानों की स्थिति सौतेली संतान सरीखी हो गयी है। ऐसा नहीं है कि इनकी संख्या किसी चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता नहीं रखती। जानकारी के अनुसार यूपी में गन्ना किसानों के रूप में वोटरों की संख्या दो करोड़ के आस-पास है। यदि ये अल्पसंख्यकों और दलितों की भांति संगठित हो जाएं तो शायद इनकी आवाज भी राजनीति के बाजारों में सुनी जा सके लेकिन परेशानी इस बात की है कि यूपी का दो करोड़ गन्ना किसान एकजुट नहीं हो पा रहा है। आम चुनावों के दौरान गन्ना किसानों की चर्चा तो होती है और भाषणबाजी से लेकर आरोप-प्रत्यारोप के दौर भी चलते हैं लेकिन किसी भी पार्टियों के एजेंडें में गन्ना किसान नजर नहीं आता।
प्राप्त जानकारी के अनुसार यूपी के दो करोड़ गन्ना किसानों का लगभग 12 हजार करोड़ रुपया चीनी मिलों पर बकाया है। ये रकम उत्तर प्रदेश की चीनी मिलों को देनी है। गन्ना किसानों की बकाया धनराशि का खुलासा हाल ही में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी कर चुकी हैं। यूपी सरकार के जिम्मेदार अफसर भी यही कहते हैं कि यूपी के दो करोड़ गन्ना किसानों का बकाया 10 हजार करोड़ से भी ऊपर हो चुका है। बकाए की यह राशि कब और कैसे दी जायेगी और भविष्य में ऐसी स्थिति कब बनेगी जब चीनी मिलों को गन्ना देने के 14 दिनों के भीतर उनके पैसों का भुगतान हो जाए? इस पर अधिकारी भी जवाब देने की स्थिति में नहीं हैं। हालांकि विभाग के कर्मचारी जरूर कहते हैं कि यदि सरकार चाह ले तो गन्ना किसानों को अपना हक मांगने के लिए हाथ न फैलाना पडे़ लेकिन सरकार गन्ना उत्पादन करने वाले किसानों की अपेक्षा चीनी मिल मालिकों खैरख्वाह बनी हुई है। यह हाल मौजूदा योगी सरकार का ही नहीं बल्कि इससे पूर्व की सरकारों का भी रहा है।
यहां यह जानकर भी हैरत होगी कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी अपने भाषणों में तो जरूर गन्ना किसानों की पैरवी करती नजर आ रही हैं लेकिन हकीकत यह है कि कांग्रेस के एजेण्डे में भी गन्ना किसान के भुगतान की प्रक्रिया कहीं नजर नहीं आता। कहने गुरेज नहीं है कि यदि कांग्रेस आम जनता की पहली पसंद बनी तो भी गन्ना किसान एक बार फिर से दोराहे पर होगा और अपने हक के लिए हाथ पसारता नजर आयेगा।
विगत दिनों बस्ती में गन्ना किसानों ने अपने हक को लेकर आन्दोलन किया। शायद गन्ना किसानों के लिए इससे उपयुक्त अवसर और कोई नहीं हो सकता था। सरकार ने भी भले ही इस आन्दोलन पर अपनी रुचि न दिखायी हो लेकिन इस आन्दोलन पर विरोधियों की राजनीति का रंग खूब चढ़ा। पूर्व कैबिनेट मंत्री राम प्रसाद चैधरी गन्ना किसानों के आन्दोलन में शरीक हुए। श्री चैधरी सपा-बसपा गठबन्धन से बस्ती लोकसभा सीट से प्रत्याशी भी हैं और इनके लिए एक-एक वोट कीमती है भले ही इसके लिए उन्हें गन्ना किसानों को ही मोहरा क्यों न बनाना पडे़। बस्ती जिले के गन्ना किसान वाल्टरगंज स्थित चीनी मिल द्वारा गन्ना किसानों का भुगतान न किए जाने को लेकर आन्दोलित थे। वक्त की नजाकत गन्ना किसानों ने भी भांपी होगी या फिर किसी दल विशेष ने गन्ना किसानों को यह सलाह दी होगी, गन्ना किसान नंगे बदन ‘भुगतान नहीं तो मतदान नहीं’ की तख्तियां गले में लटकाए हुए आन्दोलन कर रहे थे। गन्ना किसानों की जुबानी, ‘समय से भुगतान न होने से बच्चों की शिक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और अगली फसल की तैयारी, सब कुछ चैपट हो जाता है।’ गन्ना किसानों की मुश्किल इस बात की है कि वे साहूकार और बैंकों से कर्ज लेकर गन्ने की फसल तैयार करते हैं। फसल समय पर तैयार होकर चीनी मिल भी पहुंच जाती है लेकिन भुगतान के नाम पर 14 दिनों में भुगतान से सम्बन्धित पर्ची उनके हाथ में थमा दी जाती है। 14 दिन में भुगतान के आदेश सरकार की तरफ से हैं। बताते चलें कि विगत लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने यूपी के दो करोड़ किसानों से वायदा किया था कि यदि उनकी सरकार बनी तो निर्धारित 14 दिनों के भीतर गन्ना किसानों का भुगतान सुनिश्चित किया जायेगा। वर्ष 2017 में जब यूपी में भाजपा की सरकार बनी तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी ऐलान किया था कि यदि चीनी मिलों ने गन्ना किसानों का भुगतान 14 दिनों मंे नहीं किया तो उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करके कार्रवाई की जायेगी।
केन्द्र में भाजपा की सरकार का कार्यकाल पूरा हो चुका है और वह चुनाव तैयारी में भी लग गयी लेकिन इन पांच वर्षों के दौरान न तो गन्ना किसानों का समय पर भुगतान सुनिश्चित हो सका और न ही किसी मिल मालिक के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई। स्पष्ट है कि गन्ना किसान ठगा गया और दोबारा ठगने के लिए तैयार बैठा है। ऐसा इसलिए कि गन्ना किसान संगठित नहीं हो पा रहा है। भारतीय किसान यूनियन भी गन्ना किसानों की समस्याओं को लेकर किसी प्रकार का मजबूत आन्दोलन नहीं चला पायी और न ही इस चुनाव में ही भाकियू ने गन्ना किसानों के लिए कोई आन्दोलन किया। बताते चलें कि यूपी के 15 लोकसभा क्षेत्र गन्ना बेल्ट की परिधि में आते हैं। तकरीबन 50 लाख परिवारों के दो करोड़ गन्ना किसानों की रोजी-रोटी इसी पर टिकी है।
यूपी का लखीमपुर खीरी सर्वाधिक गन्ना उत्पादक क्षेत्र है। एक अनुमान के मुताबिक इस जनपद में 15 लाख किसान सिर्फ गन्ने की खेती करते हैं। इस क्षेत्र में सर्वाधिक 9 चीनी मिलें भी हैं जिसमें बजाज चीनी मिल गन्ना किसानों का सर्वाधिक पैसा दबाने वाली मिल है। जानकारी यूपी सरकार के मंत्री को भी है लेकिन इस मिल के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए सरकार उसे और अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराती आयी है। यहां के किसानों की मानें तो शायद ही कोई किसान ऐसा होगा जिसका बकाया लाखों में न हो। यहां इस बात का अंदाजा लगाया जाना सरल होगा कि जो किसान बैंक और साहूकारों से ब्याज में कर्ज लेकर गन्ना उत्पादन करता आ रहा हो और उसे समय से भुगतान न मिल सके तो उसका मुनाफा घाटे में परिवर्तित हो जाता है। ऐसे में वह किस प्रकार अपने परिवार का पेट पाल रहा होगा? सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है।
यह स्थिति तब है जब यूपी के 40 लोकसभा क्षेत्रों में गन्ने का उत्पादन वृहद स्तर पर किया जाता है। इन क्षेत्रों को गन्ना बेल्ट भी कहा जाता है।
मौजूदा स्थिति यह है कि यूपी के 50 लाख परिवार जो गन्ने की खेती पर ही निर्भर हैं, सरकारों की उदासीनता के चलते बदहाली के कगार पर हैं। कहा तो यह जा रहा है कि यदि इन परिवारों के 2 करोड़ वोटर यदि एकजुट हो जाएं तो किसी भी सरकार को झुकने पर विवश भी कर सकते हैं लेकिन विडम्बना इस बात की है कि ये दो करोड़ वोट हर बार सिर्फ और सिर्फ चुनाव प्रचार के दौरान भाषण तक ही अपनी पहचान रख पाते हैं। चुनाव समाप्त होते ही ये दोबारा चीनी मिल मालिकों के समक्ष बेबसी का कटोरा लिए नजर आते हैं।

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